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रिव्यू-गले पड़ा ‘कॉलर बम’

रिव्यू-गले पड़ा ‘कॉलर बम’

हिमाचल प्रदेश के सनावर कस्बे के एक स्कूल में एक आतंकी अपने शरीर पर बम लपेटे घुस आया है। बम का कॉलर उसके गले में लिपटा है। उसके कहने पर वहां मौजूद पुलिस अफसर जिम्मी शेरगिल को अगले तीन घंटे में तीन टास्क पूरे करने हैं तभी इस कॉलर बम को रोका जा सकता है। कौन करवा रहा है यह सब? और जिम्मी से ही क्यों करवा रहा है? आखिर क्या है इस सबके पीछे? और क्या जिम्मी सारे टास्क पूरे कर पाएगा? है न दिलचस्प प्लॉट? लेकिन हर दिलचस्प प्लॉट पर उतनी ही दिलचस्प कहानी, उतनी ही कसी हुई स्क्रिप्ट और उतनी ही सधी हुई फिल्म भी बन जाए, यह ज़रूरी नहीं। यह फिल्म इस बात की एक सशक्त मिसाल है कि एक थ्रिलर कहानी को सोचने और उसे पर्दे पर पहुंचाने का टास्क पूरा कर पाने का माद्दा हर किसी में नहीं होता। इस कहानी में एक साथ बहुत कुछ घुसेड़ देने की जो जबरिया कोशिशें हुई हैं, पहला काम तो उन्होंने बिगाड़ा है। उसके बाद इसकी स्क्रिप्ट के रेशे इस तरह से बुने गए कि न तो लॉजिक का ध्यान रखा गया और न ही रोचकता का। इतने सारे झोल हैं डिज़्नी-हॉटस्टार पर आई इस डेढ़ घंटे वाली फिल्म की स्क्रिप्ट में कि उन झोलों पर अलग से तीन घंटे की एक कॉमेडी फिल्म बनाई जा सकती है। ऊपर से ध्यानेश ज़ोटिंग (अंग्रेज़ी में यह नाम Dnyanesh Zoting लिखा है) के निर्देशन में भी कच्चापन है। उन्हें सीन बनाने आए ही नहीं। फिल्म में कहीं भी वह उस किस्म का तनाव क्रिएट नहीं कर पाए जो आपकी धड़कनें बढ़ा दे। न ही कोई रोचकता है, न इमोशन, न डर, जुगुप्सा, रोमांच जैसे भाव उत्पन्न हुए। तो है क्या फिल्म में? बस ‘डक डक डक डक... धम्म धम्म...’ का बैकग्राउंड म्यूज़िक भर डाल देने से थ्रिलर फिल्में नहीं बना करतीं साहब। जब सब कुछ ढीला हो और किरदार तक हल्के लिखे गए हों तो कलाकार चाह कर भी कुछ दमदार नहीं कर सकते। जिम्मी शेरगिल बुझे-बुझे से लगे हैं। बाकी के तमाम कलाकार भी हल्के रहे। एक आशा नेगी ज़रूर प्रभावी काम करती दिखीं। फिल्म के अंत में एक डायलॉग है-‘हर इंसान की ज़िंदगी में एक टाइम ऐसा आता है जब उसे सब कुछ साफ-साफ दिखाई देने लगता है...।’ जब आप यह फिल्म देख रहे होते हैं तो आपकी ज़िंदगी का यह वाला टाइम आधी फिल्म में ही आ जाता है और आपको साफ-साफ महसूस होने लगता है कि इस फिल्म को देखने का फैसला करके आपने कितनी बड़ी गलती की।

रिव्यू-एक्शन इमोशन की फिल्मी घेराबंदी ‘टैंपल अटैक’ में

रिव्यू-एक्शन इमोशन की फिल्मी घेराबंदी ‘टैंपल अटैक’ में

अहमदाबाद के एक मंदिर में चार आतंकी घुस आए हैं। उन्होंने कइयों को मार दिया है और कइयों को बंधक बना लिया है। उनकी मांग है कि जेल में बंद उनके एक साथी को रिहा किया जाए। एन.एस.जी. कमांडो आकर मोर्चा संभालते हैं और आतंकियों को मार गिराते हैं। 2002 में गुजरात के गांधीनगर के अक्षरधाम मंदिर पर हुए आतंकी हमले से प्रेरित इस कहानी में नया या अनोखा कुछ नहीं है। किसी जगह पर आतंकियों के घुसने, लोगों को बंधक बनाने और कमांडो कार्रवाई के बाद सब सही हो जाने की कहानियां अब फिल्मी पर्दों के लिए पुरानी पड़ चुकी हैं। ओ.टी.टी. के मंच पर भी ऐसा काफी कुछ आ चुका है। इसलिए यह सब अब चौंकाता या दहलाता नहीं है। हां, ललचाता ज़रूर है। मन करता है कि देखें, कमांडो आखिर कैसे सब सही करते हैं। लेकिन ज़ी 5 पर आई यह फिल्म ‘स्टेट ऑफ सीज-टैंपल अटैक’ एक रुटीन फ्लेवर की कहानी को उतने ही रुटीन अंदाज़ में परोसती है और इसीलिए ज़्यादा कस कर नहीं बांध पाती है। कहानी की शुरूआत कश्मीर में मेजर हनुत सिंह (अक्षय खन्ना) की टीम के एक मिशन से होती है जिसमें मेजर एक साथी को खोकर खुद घायल हो गया था। ठीक होने के बाद उसका निशाना चूकने लगा है। तभी उसे गुजरात जाने का मौका मिलता है। वहां मंदिर में फंसे लोगों को बचाने के मिशन के ज़रिए वह खुद पर लगे दाग को भी धो देना चाहता है। इस कहानी में एकरसता तो है ही, इसकी स्क्रिप्ट में भी काफी हल्कापन है जो बार-बार सामने आता रहता है। बस, एक एक्शन ही है जो देखने वालों को बांधे रखता है। लेकिन उसमें भी बेवजह का खून-खराबा दिखाया गया है जो खटकता है। इस किस्म की कहानी के लिए पटकथा में कसावट के साथ-साथ निर्देशन में जो पैनापन होना चाहिए, वह भी यहां कम झलकता है। केन घोष अभी तक अलग तरह की फिल्में बनाते आए हैं। उन्होंने कोशिश तो बहुतेरी की, लेकिन इस विषय को पूरी तरह से साधने में वह चूके हैं। अक्षय खन्ना कहीं-कहीं बहुत प्रभावी तो ज़्यादातर जगहों पर साधारण रहे। उम्र उनके चेहरे पर झलकने लगी है। उन्हें यह भी समझना होगा कि टेढ़े-मेढ़े मुंह बना कर संवाद बोलने से असर नहीं बढ़ता है। बाकी के तमाम कलाकारों (अभिमन्यु सिंह, गौतम रोडे, विवेक दहिया, मंजरी फड़णीस, अक्षय ओबेरॉय, प्रवीण डबास, समीर सोनी, मीर सरवर, चंदन रॉय, रोहन वर्मा आदि) को हल्के और छोटे किरदार मिले, जिन्हें उन्होंने सही तरह से निभा दिया। कैमरागिरी अच्छी है। फिल्म खत्म होती है तो मंदिर के स्वामी जी कहते हैं-‘लोगों को यह समझना होगा कि हिंसा से सौ प्रश्न खड़े तो हो सकते हैं लेकिन हिंसा किसी एक प्रश्न का उत्तर नहीं हो सकती।’ बस, यही इस फिल्म का हासिल है जो दिखाती है कि कैसे कुछ लोग (आतंकवादी) ऊपर वाले के नाम पर हिंसा को जायज समझते हैं और कैसे कुछ लोग (सैनिक) नीचे वालों की रक्षा के लिए जायज हिंसा करते हैं। एक साधारण विषय को भले ही फिल्मी ढंग से उठाती हो यह फिल्म लेकिन इसे देखा जा सकता है। टाइमपास कह लें, या वन टाइम वॉच, आपकी मर्ज़ी।

ओल्ड रिव्यू-न ‘ग्रेट’ न ‘ग्रैंड’, बस हल्की ‘मस्ती’

ओल्ड रिव्यू-न ‘ग्रेट’ न ‘ग्रैंड’, बस हल्की ‘मस्ती’

अगर सैक्स कॉमेडी लोगों को पसंद न आतीं तो रिलीज़ होने से हफ्ता भर पहले लीक हो कर यह फिल्म हर जवां मोबाइल फोन में घूम न रही होती। अगर लोग इस तरह की फिल्मों के दीवाने न होते तो न ये बनतीं और न ही कामयाबी पातीं। अब बात यह कि क्या यह फिल्म वह मस्ती, वह मनोरंजन, वह गुदगुदाहट पैदा कर पाई है जिसके लिए ‘मस्ती’ सीरिज़ की फिल्में जानी जाती हैं? जवाब है-हां, मगर थोड़ा-थोड़ा...! अब ऐसी फिल्मों में क्या कहानी है, कैसी स्क्रिप्ट है, डायरेक्शन कैसा है या एक्टिंग कैसी है, इन बातों से क्या फर्क पड़ता है। गंदी बातें हों, आंखों को गर्माने वाले सीन हों, बस, और क्या चाहिए और यह सब ज़्यादा नहीं लेकिन इतना तो है कि आपको ‘मज़ा’ दे सके। रही रेटिंग की बात, तो जो लोग इस किस्म की फिल्में पसंद ही नहीं करते, उन्हें रेटिंग की चाह नहीं और जो लोग इन्हें देखना चाहते हैं, उन्हें रेटिंग की परवाह नहीं, फिर भी...अपनी रेटिंग-दो स्टार(नोट-मेरा यह रिव्यू इस फिल्म की रिलीज़ के समय किसी पोर्टल पर प्रकाशित हुआ था। अब यह फिल्म ज़ी 5 पर देखी जा सकती है।)

रिव्यू-प्याली में ‘तूफान’

रिव्यू-प्याली में ‘तूफान’

छिछोरे नायक को नायिका की बात दिल पर लगती है तो वह पहलवानी करने लगता है। दोनों शादी भी कर लेते हैं। फिर कुछ ऐसा होता है कि वह पहलवानी छोड़ देता है। कुछ अर्से बाद वह लौटता है तो किसी और को नहीं बल्कि अपने-आप को जीतने के लिए। ओह, सॉरी! यह तो सलमान खान वाली ‘सुल्तान’ की कहानी सुना दी। अब फरहान अख्तर वाली ‘तूफान’ की कहानी सुनिए। छिछोरे नायक को नायिका की बात दिल पर लगती है तो वह बॉक्सिंग करने लगता है। दोनों शादी भी कर लेते हैं। फिर कुछ ऐसा होता है कि वह बॉक्सिंग छोड़ देता है। कुछ अर्से बाद वह लौटता है तो किसी और को नहीं बल्कि अपने-आप को जीतने के लिए। आप पूछेंगे कि दोनों में फर्क क्या है? बिल्कुल है-वहां पहलवानी थी, यहां बॉक्सिंग है। बोलिए, फर्क है कि नहीं...? मुंबई के डोंगरी इलाके में रहने वाला अज़ीज़ अली यानी अज्जू भाई जाफर भाई के लिए वसूली, फोड़ा-फोड़ी वगैरह करता है। एक दिन डाक्टर साहिबा ने लताड़ा तो बंदे ने अपनी ताकत बॉक्सिंग में झोंक दी। जीता, तो लोगों ने नाम दिया-तूफान। किसी वजह से उसे बॉक्सिंग छोड़नी पड़ी, बदनामी हुई सो अलग। इस बीच उसकी शादी हो गई और एक बेटी भी। पांच साल बाद वह लौटा ताकि अपने खोए नाम, खोई इज़्ज़त को पा सके। फरहान अख्तर की सोची यह कहानी साधारण है। अपनी शुरूआत से ही यह एक साधारण किस्म का ट्रैक पकड़ती है और थोड़े-बहुत उतार-चढ़ाव के साथ उसी पर टिकी रहती है। अंजुम रजअबली और विजय मौर्य जैसे लेखकों ने इस कहानी में ज़रूरी दावपेंच दिखाए हैं जिससे यह कहीं-कहीं ढलकने के बावजूद बोर नहीं करती और आने वाले सीक्वेंस का अंदाज़ा होने के बावजूद बांधे भी रखती है। फिर भी लगता है कि कहीं कमी रह गई। भावनाओं के उफान की कमी, एक्शन के तूफान की कमी। संवादों को ज़ोरदार ढंग से लिखे जाने की कमी भी साफ महसूस होती है। हिन्दू लड़की और मुस्लिम लड़के के प्यार में ‘लव जिहाद’ वाले एंगल को खुल कर एक्सप्लोर किया जाना चाहिए था। निर्देशक राकेश ओमप्रकाश मेहरा के निर्देशन की धार हमेशा से उनके हाथ में आई स्क्रिप्ट के वजन पर निर्भर रही है। इसीलिए वह हमें बहुत अच्छी से लेकर बहुत खराब तक फिल्में दे चुके हैं। इस बार उनके हाथ में ठीक-ठाक सी स्क्रिप्ट आई तो फिल्म भी ठीक-ठाक बनी जो न तो महानता की चोटी छूती है और न ही किसी खड्ड में गिरती है। थोड़ी एडिटिंग करके वह इसे और कसते तो यह ज़्यादा पकड़ बना पाती। अमेज़न प्राइम पर आई इस फिल्म का कलेवर ‘गली ब्वॉय’ सरीखा है। वही मुस्लिम अंडरडॉग लड़का, वही स्ट्रगल, उसका आगे बढ़ना, चैंपियन बनना और वही रैप गाने भी। इन रैप गानों ने फिल्म को बिगाड़ा ही है। कायदे के सुरीले, अर्थपूर्ण गाने इस किस्म की फिल्म के लिए फायदेमंद होते। फरहान अख्तर का काम प्रभावी है। अपनी बॉडी पर की गई उनकी मेहनत भी दिखती है। हां, उनकी उम्र ज़्यादा लगती है पर्दे पर। खासतौर से जब-जब वह डॉक्टर अनन्या बनीं मृणाल ठाकुर के साथ दिखे। काम मृणाल का भी अच्छा है। वह प्यारी भी लगती हैं। परेश रावल, मोहन अगाशे, सुप्रिया पाठक कपूर, दर्शन कुमार, विजय राज़ जैसे कलाकारों की मौजूदगी दृश्यों को भारी बनाती है। अज्जू के दोस्त के किरदार में हुसैन दलाल ने अपने किरदार को जम कर पकड़ा। जो लोग राकेश ओमप्रकाश मेहरा और फरहान अख्तर की जोड़ी से एक बार फिर ‘भाग मिल्खा भाग’ वाले चमत्कार की उम्मीद रख रहे थे, यह फिल्म उन्हें निराश कर सकती है। लेकिन इसे एक साधारण मनोरंजन देने वाली साधारण किस्म की फिल्म समझ कर देखें तो यह दगा नहीं देगी, तय है।

रिव्यू-ऑनर बचाते गांठें खोलते ‘14 फेरे’

रिव्यू-ऑनर बचाते गांठें खोलते ‘14 फेरे’

जब ऑनर (मान) ही बच गया तो फिर काहे की किलिंग...?’दूसरी जात के लड़के से शादी कर रही लड़की जब अपने पिता से यह पूछती है तो पिता को कोई जवाब नहीं सूझता। देखा जाए तो यही रास्ता अपना कर हमारा आज का समाज भी दूसरी जात वालों को अपना रहा है। वरना कुछ समय पहले तक जहां अलग-अलग जाति के लड़का-लड़की घर से भाग कर शादी करते थे वहीं आज ऐसी बहुत सारी शादियां दोनों परिवारों की रज़ामंदी से होने लगी हैं ताकि दोनों तरफ का ऑनर बचा रहे। दिल्ली में साथ पढ़े-लिखे, साथ नौकरी कर रहे और एक ही घर में साथ रह रहे बिहार के लड़के और राजस्थान की लड़की को पता है कि जात-बिरादरी को नाक पर रखने वाले उनके घरवाले इस शादी के लिए राज़ी नहीं होंगे। सो, वे दोनों किराए के मां-बाप ले आते हैं। एक बार लड़के के घर में शादी होती है और दूसरी बार लड़की के घर में। हो गए न 7 और 7 यानी 14 फेरे? लेकिन क्या यह सब होना इतना आसान है? और क्या सच कभी सामने नहीं आएगा? मेरे बाबूजी नहीं मानेंगे’ या ‘मेरे पापा तो मुझे मार ही डालेंगे’ किस्म की बातें कहते-सुनते नई पीढ़ी वाले चाहते हैं कि कोई रास्ता निकल आए। पर पुरानी पीढ़ी उस रास्ते को माने तब न। यह फिल्म जो राह दिखाती है वह भले ही ‘फिल्मी’ हो लेकिन गलत नहीं लगती। लड़का-लड़की भागने की बजाय हालात का सामना करते हैं। नकली मां-बाप के ज़रिए फिल्म हमारे समाज की उस सोच पर भी प्रहार करती है जहां असली मां-बाप अपने बच्चों की खुशी से ज़्यादा ‘लोग क्या कहेंगे’ को तवज्जो देने लगते हैं। मनोज कलवानी अपने लेखन से संतुष्ट करते हैं। हां, हास्य की डोज़ थोड़ी और बढ़ा कर वह इस फिल्म को ज़्यादा रोचक बना सकते थे। देवांशु सिंह के निर्देशन में परिपक्वता है। कई जगह उन्होंने बेहतरीन तरीके से सीन संभाले हैं। लोकेशन असरदार हैं और गीत-संगीत फिल्म के माहौल के अनुकूल रहा है। संवाद पैने हैं। भोजपुरी और राजस्थानी बोलियों का इस्तेमाल फिल्म को असरदार बनाता है। एक्टिंग सभी की उम्दा है। विक्रांत मैस्सी तो छंटे हुए अभिनेता हैं ही, कृति खरबंदा भी उनका पूरा साथ निभाती हैं। हीरो की मां के किरदार में यामिनी दास असर छोड़ती हैं। बहू के स्वागत वाले सीन में उनके हावभाव और बैकग्राउंड में रेखा भारद्वाज की आवाज़ में बजता ‘राम सीता संग द्वारे पे खड़े हैं आओ सखी...’ देख कर कानों में शहद घुलता है तो आंखों में समुंदर उमड़ता है। विनीत कुमार, मनोज बक्शी, जमील खान, गौहर खान, प्रियांशु सिंह, गोविंद पांडेय, सुमित सूरी, भूपेश सिंह जैसे कलाकार दम भर साथ निभाते हैं। सही है कि ज़ी-5 पर आई यह फिल्म बहुत पैनी नहीं बन पाई है। कहीं लेखन हल्का रहा तो कहीं निर्देशन। कुछ और कसावट, कुछ और सजावट, कुछ और बुनावट इस फिल्म को उम्दा बना सकती थी। लेकिन यह फिल्म बुरी नहीं है। यह साफ संदेश दे जाती है कि जात-बिरादरी और अपने कथित ‘ऑनर’ के नाम पर अगर पुरानी पीढ़ी लीक पीटेगी तो नई पीढ़ी के पास अपनाने को झूठ का रास्ता ही बचेगा। सामाजिक गांठों को खोलने की ऐसी कोशिशें होती रहनी चाहिएं।

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