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रिव्यू-गले पड़ा ‘कॉलर बम’

रिव्यू-गले पड़ा ‘कॉलर बम’

हिमाचल प्रदेश के सनावर कस्बे के एक स्कूल में एक आतंकी अपने शरीर पर बम लपेटे घुस आया है। बम का कॉलर उसके गले में लिपटा है। उसके कहने पर वहां मौजूद पुलिस अफसर जिम्मी शेरगिल को अगले तीन घंटे में तीन टास्क पूरे करने हैं तभी इस कॉलर बम को रोका जा सकता है। कौन करवा रहा है यह सब? और जिम्मी से ही क्यों करवा रहा है? आखिर क्या है इस सबके पीछे? और क्या जिम्मी सारे टास्क पूरे कर पाएगा? है न दिलचस्प प्लॉट? लेकिन हर दिलचस्प प्लॉट पर उतनी ही दिलचस्प कहानी, उतनी ही कसी हुई स्क्रिप्ट और उतनी ही सधी हुई फिल्म भी बन जाए, यह ज़रूरी नहीं। यह फिल्म इस बात की एक सशक्त मिसाल है कि एक थ्रिलर कहानी को सोचने और उसे पर्दे पर पहुंचाने का टास्क पूरा कर पाने का माद्दा हर किसी में नहीं होता। इस कहानी में एक साथ बहुत कुछ घुसेड़ देने की जो जबरिया कोशिशें हुई हैं, पहला काम तो उन्होंने बिगाड़ा है। उसके बाद इसकी स्क्रिप्ट के रेशे इस तरह से बुने गए कि न तो लॉजिक का ध्यान रखा गया और न ही रोचकता का। इतने सारे झोल हैं डिज़्नी-हॉटस्टार पर आई इस डेढ़ घंटे वाली फिल्म की स्क्रिप्ट में कि उन झोलों पर अलग से तीन घंटे की एक कॉमेडी फिल्म बनाई जा सकती है। ऊपर से ध्यानेश ज़ोटिंग (अंग्रेज़ी में यह नाम Dnyanesh Zoting लिखा है) के निर्देशन में भी कच्चापन है। उन्हें सीन बनाने आए ही नहीं। फिल्म में कहीं भी वह उस किस्म का तनाव क्रिएट नहीं कर पाए जो आपकी धड़कनें बढ़ा दे। न ही कोई रोचकता है, न इमोशन, न डर, जुगुप्सा, रोमांच जैसे भाव उत्पन्न हुए। तो है क्या फिल्म में? बस ‘डक डक डक डक... धम्म धम्म...’ का बैकग्राउंड म्यूज़िक भर डाल देने से थ्रिलर फिल्में नहीं बना करतीं साहब। जब सब कुछ ढीला हो और किरदार तक हल्के लिखे गए हों तो कलाकार चाह कर भी कुछ दमदार नहीं कर सकते। जिम्मी शेरगिल बुझे-बुझे से लगे हैं। बाकी के तमाम कलाकार भी हल्के रहे। एक आशा नेगी ज़रूर प्रभावी काम करती दिखीं। फिल्म के अंत में एक डायलॉग है-‘हर इंसान की ज़िंदगी में एक टाइम ऐसा आता है जब उसे सब कुछ साफ-साफ दिखाई देने लगता है...।’ जब आप यह फिल्म देख रहे होते हैं तो आपकी ज़िंदगी का यह वाला टाइम आधी फिल्म में ही आ जाता है और आपको साफ-साफ महसूस होने लगता है कि इस फिल्म को देखने का फैसला करके आपने कितनी बड़ी गलती की।

रिव्यू-एक्शन इमोशन की फिल्मी घेराबंदी ‘टैंपल अटैक’ में

रिव्यू-एक्शन इमोशन की फिल्मी घेराबंदी ‘टैंपल अटैक’ में

अहमदाबाद के एक मंदिर में चार आतंकी घुस आए हैं। उन्होंने कइयों को मार दिया है और कइयों को बंधक बना लिया है। उनकी मांग है कि जेल में बंद उनके एक साथी को रिहा किया जाए। एन.एस.जी. कमांडो आकर मोर्चा संभालते हैं और आतंकियों को मार गिराते हैं। 2002 में गुजरात के गांधीनगर के अक्षरधाम मंदिर पर हुए आतंकी हमले से प्रेरित इस कहानी में नया या अनोखा कुछ नहीं है। किसी जगह पर आतंकियों के घुसने, लोगों को बंधक बनाने और कमांडो कार्रवाई के बाद सब सही हो जाने की कहानियां अब फिल्मी पर्दों के लिए पुरानी पड़ चुकी हैं। ओ.टी.टी. के मंच पर भी ऐसा काफी कुछ आ चुका है। इसलिए यह सब अब चौंकाता या दहलाता नहीं है। हां, ललचाता ज़रूर है। मन करता है कि देखें, कमांडो आखिर कैसे सब सही करते हैं। लेकिन ज़ी 5 पर आई यह फिल्म ‘स्टेट ऑफ सीज-टैंपल अटैक’ एक रुटीन फ्लेवर की कहानी को उतने ही रुटीन अंदाज़ में परोसती है और इसीलिए ज़्यादा कस कर नहीं बांध पाती है। कहानी की शुरूआत कश्मीर में मेजर हनुत सिंह (अक्षय खन्ना) की टीम के एक मिशन से होती है जिसमें मेजर एक साथी को खोकर खुद घायल हो गया था। ठीक होने के बाद उसका निशाना चूकने लगा है। तभी उसे गुजरात जाने का मौका मिलता है। वहां मंदिर में फंसे लोगों को बचाने के मिशन के ज़रिए वह खुद पर लगे दाग को भी धो देना चाहता है। इस कहानी में एकरसता तो है ही, इसकी स्क्रिप्ट में भी काफी हल्कापन है जो बार-बार सामने आता रहता है। बस, एक एक्शन ही है जो देखने वालों को बांधे रखता है। लेकिन उसमें भी बेवजह का खून-खराबा दिखाया गया है जो खटकता है। इस किस्म की कहानी के लिए पटकथा में कसावट के साथ-साथ निर्देशन में जो पैनापन होना चाहिए, वह भी यहां कम झलकता है। केन घोष अभी तक अलग तरह की फिल्में बनाते आए हैं। उन्होंने कोशिश तो बहुतेरी की, लेकिन इस विषय को पूरी तरह से साधने में वह चूके हैं। अक्षय खन्ना कहीं-कहीं बहुत प्रभावी तो ज़्यादातर जगहों पर साधारण रहे। उम्र उनके चेहरे पर झलकने लगी है। उन्हें यह भी समझना होगा कि टेढ़े-मेढ़े मुंह बना कर संवाद बोलने से असर नहीं बढ़ता है। बाकी के तमाम कलाकारों (अभिमन्यु सिंह, गौतम रोडे, विवेक दहिया, मंजरी फड़णीस, अक्षय ओबेरॉय, प्रवीण डबास, समीर सोनी, मीर सरवर, चंदन रॉय, रोहन वर्मा आदि) को हल्के और छोटे किरदार मिले, जिन्हें उन्होंने सही तरह से निभा दिया। कैमरागिरी अच्छी है। फिल्म खत्म होती है तो मंदिर के स्वामी जी कहते हैं-‘लोगों को यह समझना होगा कि हिंसा से सौ प्रश्न खड़े तो हो सकते हैं लेकिन हिंसा किसी एक प्रश्न का उत्तर नहीं हो सकती।’ बस, यही इस फिल्म का हासिल है जो दिखाती है कि कैसे कुछ लोग (आतंकवादी) ऊपर वाले के नाम पर हिंसा को जायज समझते हैं और कैसे कुछ लोग (सैनिक) नीचे वालों की रक्षा के लिए जायज हिंसा करते हैं। एक साधारण विषय को भले ही फिल्मी ढंग से उठाती हो यह फिल्म लेकिन इसे देखा जा सकता है। टाइमपास कह लें, या वन टाइम वॉच, आपकी मर्ज़ी।

ओल्ड रिव्यू-न ‘ग्रेट’ न ‘ग्रैंड’, बस हल्की ‘मस्ती’

ओल्ड रिव्यू-न ‘ग्रेट’ न ‘ग्रैंड’, बस हल्की ‘मस्ती’

अगर सैक्स कॉमेडी लोगों को पसंद न आतीं तो रिलीज़ होने से हफ्ता भर पहले लीक हो कर यह फिल्म हर जवां मोबाइल फोन में घूम न रही होती। अगर लोग इस तरह की फिल्मों के दीवाने न होते तो न ये बनतीं और न ही कामयाबी पातीं। अब बात यह कि क्या यह फिल्म वह मस्ती, वह मनोरंजन, वह गुदगुदाहट पैदा कर पाई है जिसके लिए ‘मस्ती’ सीरिज़ की फिल्में जानी जाती हैं? जवाब है-हां, मगर थोड़ा-थोड़ा...! अब ऐसी फिल्मों में क्या कहानी है, कैसी स्क्रिप्ट है, डायरेक्शन कैसा है या एक्टिंग कैसी है, इन बातों से क्या फर्क पड़ता है। गंदी बातें हों, आंखों को गर्माने वाले सीन हों, बस, और क्या चाहिए और यह सब ज़्यादा नहीं लेकिन इतना तो है कि आपको ‘मज़ा’ दे सके। रही रेटिंग की बात, तो जो लोग इस किस्म की फिल्में पसंद ही नहीं करते, उन्हें रेटिंग की चाह नहीं और जो लोग इन्हें देखना चाहते हैं, उन्हें रेटिंग की परवाह नहीं, फिर भी...अपनी रेटिंग-दो स्टार(नोट-मेरा यह रिव्यू इस फिल्म की रिलीज़ के समय किसी पोर्टल पर प्रकाशित हुआ था। अब यह फिल्म ज़ी 5 पर देखी जा सकती है।)

रिव्यू-प्याली में ‘तूफान’

रिव्यू-प्याली में ‘तूफान’

छिछोरे नायक को नायिका की बात दिल पर लगती है तो वह पहलवानी करने लगता है। दोनों शादी भी कर लेते हैं। फिर कुछ ऐसा होता है कि वह पहलवानी छोड़ देता है। कुछ अर्से बाद वह लौटता है तो किसी और को नहीं बल्कि अपने-आप को जीतने के लिए। ओह, सॉरी! यह तो सलमान खान वाली ‘सुल्तान’ की कहानी सुना दी। अब फरहान अख्तर वाली ‘तूफान’ की कहानी सुनिए। छिछोरे नायक को नायिका की बात दिल पर लगती है तो वह बॉक्सिंग करने लगता है। दोनों शादी भी कर लेते हैं। फिर कुछ ऐसा होता है कि वह बॉक्सिंग छोड़ देता है। कुछ अर्से बाद वह लौटता है तो किसी और को नहीं बल्कि अपने-आप को जीतने के लिए। आप पूछेंगे कि दोनों में फर्क क्या है? बिल्कुल है-वहां पहलवानी थी, यहां बॉक्सिंग है। बोलिए, फर्क है कि नहीं...? मुंबई के डोंगरी इलाके में रहने वाला अज़ीज़ अली यानी अज्जू भाई जाफर भाई के लिए वसूली, फोड़ा-फोड़ी वगैरह करता है। एक दिन डाक्टर साहिबा ने लताड़ा तो बंदे ने अपनी ताकत बॉक्सिंग में झोंक दी। जीता, तो लोगों ने नाम दिया-तूफान। किसी वजह से उसे बॉक्सिंग छोड़नी पड़ी, बदनामी हुई सो अलग। इस बीच उसकी शादी हो गई और एक बेटी भी। पांच साल बाद वह लौटा ताकि अपने खोए नाम, खोई इज़्ज़त को पा सके। फरहान अख्तर की सोची यह कहानी साधारण है। अपनी शुरूआत से ही यह एक साधारण किस्म का ट्रैक पकड़ती है और थोड़े-बहुत उतार-चढ़ाव के साथ उसी पर टिकी रहती है। अंजुम रजअबली और विजय मौर्य जैसे लेखकों ने इस कहानी में ज़रूरी दावपेंच दिखाए हैं जिससे यह कहीं-कहीं ढलकने के बावजूद बोर नहीं करती और आने वाले सीक्वेंस का अंदाज़ा होने के बावजूद बांधे भी रखती है। फिर भी लगता है कि कहीं कमी रह गई। भावनाओं के उफान की कमी, एक्शन के तूफान की कमी। संवादों को ज़ोरदार ढंग से लिखे जाने की कमी भी साफ महसूस होती है। हिन्दू लड़की और मुस्लिम लड़के के प्यार में ‘लव जिहाद’ वाले एंगल को खुल कर एक्सप्लोर किया जाना चाहिए था। निर्देशक राकेश ओमप्रकाश मेहरा के निर्देशन की धार हमेशा से उनके हाथ में आई स्क्रिप्ट के वजन पर निर्भर रही है। इसीलिए वह हमें बहुत अच्छी से लेकर बहुत खराब तक फिल्में दे चुके हैं। इस बार उनके हाथ में ठीक-ठाक सी स्क्रिप्ट आई तो फिल्म भी ठीक-ठाक बनी जो न तो महानता की चोटी छूती है और न ही किसी खड्ड में गिरती है। थोड़ी एडिटिंग करके वह इसे और कसते तो यह ज़्यादा पकड़ बना पाती। अमेज़न प्राइम पर आई इस फिल्म का कलेवर ‘गली ब्वॉय’ सरीखा है। वही मुस्लिम अंडरडॉग लड़का, वही स्ट्रगल, उसका आगे बढ़ना, चैंपियन बनना और वही रैप गाने भी। इन रैप गानों ने फिल्म को बिगाड़ा ही है। कायदे के सुरीले, अर्थपूर्ण गाने इस किस्म की फिल्म के लिए फायदेमंद होते। फरहान अख्तर का काम प्रभावी है। अपनी बॉडी पर की गई उनकी मेहनत भी दिखती है। हां, उनकी उम्र ज़्यादा लगती है पर्दे पर। खासतौर से जब-जब वह डॉक्टर अनन्या बनीं मृणाल ठाकुर के साथ दिखे। काम मृणाल का भी अच्छा है। वह प्यारी भी लगती हैं। परेश रावल, मोहन अगाशे, सुप्रिया पाठक कपूर, दर्शन कुमार, विजय राज़ जैसे कलाकारों की मौजूदगी दृश्यों को भारी बनाती है। अज्जू के दोस्त के किरदार में हुसैन दलाल ने अपने किरदार को जम कर पकड़ा। जो लोग राकेश ओमप्रकाश मेहरा और फरहान अख्तर की जोड़ी से एक बार फिर ‘भाग मिल्खा भाग’ वाले चमत्कार की उम्मीद रख रहे थे, यह फिल्म उन्हें निराश कर सकती है। लेकिन इसे एक साधारण मनोरंजन देने वाली साधारण किस्म की फिल्म समझ कर देखें तो यह दगा नहीं देगी, तय है।

रिव्यू-ऑनर बचाते गांठें खोलते ‘14 फेरे’

रिव्यू-ऑनर बचाते गांठें खोलते ‘14 फेरे’

जब ऑनर (मान) ही बच गया तो फिर काहे की किलिंग...?’दूसरी जात के लड़के से शादी कर रही लड़की जब अपने पिता से यह पूछती है तो पिता को कोई जवाब नहीं सूझता। देखा जाए तो यही रास्ता अपना कर हमारा आज का समाज भी दूसरी जात वालों को अपना रहा है। वरना कुछ समय पहले तक जहां अलग-अलग जाति के लड़का-लड़की घर से भाग कर शादी करते थे वहीं आज ऐसी बहुत सारी शादियां दोनों परिवारों की रज़ामंदी से होने लगी हैं ताकि दोनों तरफ का ऑनर बचा रहे। दिल्ली में साथ पढ़े-लिखे, साथ नौकरी कर रहे और एक ही घर में साथ रह रहे बिहार के लड़के और राजस्थान की लड़की को पता है कि जात-बिरादरी को नाक पर रखने वाले उनके घरवाले इस शादी के लिए राज़ी नहीं होंगे। सो, वे दोनों किराए के मां-बाप ले आते हैं। एक बार लड़के के घर में शादी होती है और दूसरी बार लड़की के घर में। हो गए न 7 और 7 यानी 14 फेरे? लेकिन क्या यह सब होना इतना आसान है? और क्या सच कभी सामने नहीं आएगा? मेरे बाबूजी नहीं मानेंगे’ या ‘मेरे पापा तो मुझे मार ही डालेंगे’ किस्म की बातें कहते-सुनते नई पीढ़ी वाले चाहते हैं कि कोई रास्ता निकल आए। पर पुरानी पीढ़ी उस रास्ते को माने तब न। यह फिल्म जो राह दिखाती है वह भले ही ‘फिल्मी’ हो लेकिन गलत नहीं लगती। लड़का-लड़की भागने की बजाय हालात का सामना करते हैं। नकली मां-बाप के ज़रिए फिल्म हमारे समाज की उस सोच पर भी प्रहार करती है जहां असली मां-बाप अपने बच्चों की खुशी से ज़्यादा ‘लोग क्या कहेंगे’ को तवज्जो देने लगते हैं। मनोज कलवानी अपने लेखन से संतुष्ट करते हैं। हां, हास्य की डोज़ थोड़ी और बढ़ा कर वह इस फिल्म को ज़्यादा रोचक बना सकते थे। देवांशु सिंह के निर्देशन में परिपक्वता है। कई जगह उन्होंने बेहतरीन तरीके से सीन संभाले हैं। लोकेशन असरदार हैं और गीत-संगीत फिल्म के माहौल के अनुकूल रहा है। संवाद पैने हैं। भोजपुरी और राजस्थानी बोलियों का इस्तेमाल फिल्म को असरदार बनाता है। एक्टिंग सभी की उम्दा है। विक्रांत मैस्सी तो छंटे हुए अभिनेता हैं ही, कृति खरबंदा भी उनका पूरा साथ निभाती हैं। हीरो की मां के किरदार में यामिनी दास असर छोड़ती हैं। बहू के स्वागत वाले सीन में उनके हावभाव और बैकग्राउंड में रेखा भारद्वाज की आवाज़ में बजता ‘राम सीता संग द्वारे पे खड़े हैं आओ सखी...’ देख कर कानों में शहद घुलता है तो आंखों में समुंदर उमड़ता है। विनीत कुमार, मनोज बक्शी, जमील खान, गौहर खान, प्रियांशु सिंह, गोविंद पांडेय, सुमित सूरी, भूपेश सिंह जैसे कलाकार दम भर साथ निभाते हैं। सही है कि ज़ी-5 पर आई यह फिल्म बहुत पैनी नहीं बन पाई है। कहीं लेखन हल्का रहा तो कहीं निर्देशन। कुछ और कसावट, कुछ और सजावट, कुछ और बुनावट इस फिल्म को उम्दा बना सकती थी। लेकिन यह फिल्म बुरी नहीं है। यह साफ संदेश दे जाती है कि जात-बिरादरी और अपने कथित ‘ऑनर’ के नाम पर अगर पुरानी पीढ़ी लीक पीटेगी तो नई पीढ़ी के पास अपनाने को झूठ का रास्ता ही बचेगा। सामाजिक गांठों को खोलने की ऐसी कोशिशें होती रहनी चाहिएं।

रिव्यू-‘हंगामा 2’ में है कचरा अनलिमिटेड

रिव्यू-‘हंगामा 2’ में है कचरा अनलिमिटेड

प्रियदर्शन जैसे काबिल निर्देशक, यूनुस सजावल जैसे हिट लेखक, वीनस जैसा बड़ा बैनर, मलयालम की एक सफल फिल्म का रीमेक, ऊपर से ‘हंगामा’ का ब्रांड-सब चंगा ही तो है। अब इस पर ‘हंगामा 2’ नाम से कोई फिल्म बनेगी तो वह भी चंगी ही होगी, लोगों का खूब मनोरंजन करेगी, लोग उस तरह से हंसते-हंसते पागल भी हो सकते हैं जैसे प्रियन सर की ही ‘हेरा फेरी’, ‘भागम भाग’, ‘हंगामा’, ‘हलचल’, ‘चुप चुप के’, ‘दे दना दन’ वगैरह के समय हुए थे। लेकिन क्या सचमुच ऐसा हुआ...? ऐसा है...? ऐसा होगा...? जवाब है-नहीं, नहीं, नहीं...! कपूर के बेटे आकाश की शादी बजाज की लड़की से होने वाली है कि तभी एक लड़की वाणी अपनी बेटी को लेकर आ धमकती है और कहती है कि आकाश उसकी इस बेटी का बाप है। उधर अधेड़ वकील तिवारी को शक है कि उसकी जवान बीवी अंजलि का आकाश के साथ चक्कर है। क्या आकाश-वाणी के बीच कुछ था? या क्या आकाश-अंजलि के बीच कुछ है? कन्फ्यूज़न आखिर है कहां? बहुत सारे टेढ़े-बांके किरदारों को बहुत सारी कन्फ्यूज़न भरी सिचुएशंस में डालना और अंत में सबको एक जगह ले जाकर हंगामा करना प्रियदर्शन का पुराना स्टाइल रहा है और खुद को दोहराने के बावजूद वह हमें बेहिसाब हंसाते भी रहे हैं। लेकिन इस बार वह और उनकी टीम बुरी तरह से चूकी है और अपने ही बिखेरे कचरे पर से फिसलती हुई बोरियत के गड्ढे में जा गिरी है।सबसे पहला कसूर तो उस कहानी का मान सकते हैं जो 27 बरस पहले आई एक मलयालम फिल्म से ली गई। ऐसी कहानियों को सिनेमा में आउटडेटेड कहा जाता है। पता नहीं प्रियन और वीनस वाले इस थकी-मरी कहानी पर राज़ी कैसे हो गए। दूसरा कसूर पटकथा लेखक यूनुस सजावल का रहा है जिन्होंने स्क्रिप्ट के नाम पर इस बार कचरा ही बिखेरा है जबकि यह साहब डेविड धवन और रोहित शैट्टी की फिल्मों में ढेरों ठहाके परोस चुके हैं। इस बार यूनुस न तो कायदे से घटनाएं रच पाए और न ही किरदार। हिमाचल में रह रहे दो पंजाबी परिवार और पंजाबियत की खुशबू तक नहीं? और हां, यूनुस साहब, इस फिल्म में आपके लिखे किरदार जो बातें जिस तरह से बोल रहे हैं न, उसे हम दर्शकों के घरों में बदतमीज़ी और बेहूदगी माना जाता है। रही-सही कसर मनीषा कोरडे और अनुकल्प गोस्वामी नाम के संवाद लेखकों ने पूरी कर दी। जहां सीधे-सीधे बात की जानी चाहिए थी, वहां भी डायलॉग ठूंस दिए। ठूंसो... जब हर कोई कचरा बिखेरने पर आमादा है तो आप लोग भी बतौर निर्देशक प्रियदर्शन को हिन्दी में कुछ ढंग का दिए हुए एक दशक हो चला है। उनका स्टाइल देखकर लगता है कि वह भी पुरानी पीढ़ी के उन निर्देशकों की तरह अब थक चुके हैं जिन्होंने खुद को वक्त के साथ नहीं बदला और जिनकी धार भोथरी होती चली गई। एक काबिल निर्देशक का ऐसा हश्र दुखद है। यह फिल्म देख कर लगता है कि उन्होंने कुछ किया ही नहीं। जिसने जो चाहा, जैसे चाहा, किया, उन्होंने न किसी को रोका, न दखल दिया। यहां तक कि वकील तिवारी ने बार में जब दो व्हिस्की विद् सोडा मांगी और लड़के ने उन्हें नीट व्हिस्की दे दी तब भी प्रियन सर सोते रहे। जी हां, इस फिल्म के कचरेपन का सबसे बड़ा दोष आप ही का है प्रियन सर! और अब एक्टिंग की बात। आकाश बने मीज़ान जाफरी बोलते कम और चिल्लाते-झल्लाते ज़्यादा रहे। भईए, ऐसी ही एक्टिंग करनी है तो कोई और धंधा पकड़ लो, क्यों बाप (जावेद जाफरी) दादा (जगदीप) का नाम खराब कर रहे हो। वाणी के किरदार में आई प्रणिता सुभाष दक्षिण की बड़ी अभिनेत्री हैं। बड़े नाम वालों के झांसे में आकर वह हिन्दी में इस कदर घटिया फिल्म से अपनी शुरूआत करेंगी, यह खुद उन्होंने भी न सोचा होगा। शिल्पा शैट्टी बस ठीक-ठाक ही लगीं। वैसे भी वह कभी उम्दा एक्ट्रैस नहीं मानी गईं। आकाश के भाई के रोल में रमन त्रिखा जैसे नॉन-एक्टर को लंबे समय बाद देख कर फिर से कोफ्त हुई। आकाश की बहन बनी अदाकारा फिल्म में कर क्या रही थी? वैसे, यह वाली बात तो फिल्म के लगभग हर दूसरे किरदार के बारे में कही जा सकती है। खासतौर से उन चार बच्चों के बारे में भी जिन्हें ज़बर्दस्ती फिल्म में डाल कर उनसे बाल-मज़दूरी करवाई गई। और यार, यह आज के ज़माने में चार बच्चे कौन पैदा करता है? आशुतोष राणा, मनोज जोशी, परेश रावल, टिक्कू तल्सानिया, जॉनी लीवर, राजपाल यादव जैसे तजुर्बेकार कलाकारों तक की मौजूदगी जब महसूस न हो तो समझिए कि लेखकों ने मिल कर घास ही खोदी है। फिल्म का गीत-संगीत बुरी तरह से सड़ांध मारता है। इस फिल्म के नाम के साथ ‘कन्फ्यूज़न अनलिमिटेड’ का पुछल्ला बांधा गया था। लेकिन इसे देखते हुए यह असल में ‘कचरा अनलिमिटेड’ लगता है। और हां, डिज़्नी-हॉटस्टार पर आई इस फिल्म में एडिटर की भूमिका लापता है। लगता है उनके हाथ से कैंची छीन कर उन्हीं पर तान कर कहा गया कि जो बना है, उसे जोड़ दो, कुछ काटना मत। सो, ढाई घंटे की यातना बनी है, झेल लीजिए।

रिव्यू-मंज़िल तक पहुंचाती ‘मिमी’

रिव्यू-मंज़िल तक पहुंचाती ‘मिमी’

अमेरिका से आया एक जोड़ा राजस्थान की लड़की मिमी को 20 लाख रुपए में सरोगेट मदर बनने पर राज़ी करता है। यानी अब मिमी इस जोड़े के बच्चे को 9 महीने तक अपनी कोख में रखेगी और बच्चा पैदा करके उन्हें सौंप देगी। लेकिन अचानक यह जोड़ा लापता हो जाता है। अब मिमी अपने घरवालों को, समाज को क्या जवाब देगी...? बच्चा हुआ, मिमी उसे पालने लगी। कुछ साल बाद वे गोरे आ धमके और उससे अपना बच्चा मांगने लगे। अब मिमी क्या करेगी...? किराए की कोख यानी सरोगेसी हमारे आसपास सुनाई-दिखाई भले न पड़ती हो लेकिन मौजूद अवश्य है। विदेशों से आकर भारत में सरोगेसी के ज़रिए बच्चे जनने की एक पूरी इंडस्ट्री चल रही है अपने यहां। सिनेमा ने भी गाहे-बगाहे इस विषय को छुआ है लेकिन हिन्दी में ऐसा कोई उल्लेखनीय प्रयास नहीं हो पाया है। दिक्कत दरअसल ‘टैबू’ समझे जाने वाले इस विषय के साथ ही है। इस पर गंभीरता से फिल्म बनाओ तो वह आर्ट-हाऊस के पाले में जा खड़ी होती है और मसाले में लपेटो तो वह उथली रह जाती है। लेकिन इधर कुछ समय से हिन्दी वालों ने ऐसे विषयों को हास्य और पारिवारिक ड्रामे के साथ परोसना शुरू किया है और यही कारण है कि ‘विकी डोनर’, ‘शुभ मंगल सावधान’ ‘बधाई हो’, ‘लुका छुपी’ जैसी फिल्में बन कर आ सकी हैं। यह फिल्म भी इसी राह पर चलती हैं। 2011 में आई (और राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार पा चुकी) समृद्धि पौड़े की लिखी व बनाई मराठी फिल्म ‘मला आई व्हायचय’ (मुझे मां बनना है) के इस रीमेक में रोहन शंकर और लक्ष्मण उटेकर ने कहानी को 2013 और उसके बाद के राजस्थान में सैट किया है। स्मृद्धि की कहानी तो उम्दा है ही, रोहन व लक्ष्मण ने उसे हिन्दी वालों के मिज़ाज के मुताबिक कायदे से फैलाया है। मूल मराठी फिल्म एक सच्चे वाकये से प्रेरित इमोशनल व कोर्ट रूम ड्रामे वाली गंभीर फिल्म थी।  हिन्दी में इसे हास्य का पुट दिया गया है ताकि अईंया-बईंया किस्म का कचरा खाने के आदी हो चुके हिन्दी के दर्शकों को लुभाया जा सके। लेकिन इस फेर में फिल्म हल्की भी हुई है और कहीं-कहीं कमज़ोर भी। स्क्रिप्ट ने बहुत जगह तर्क और विश्वसनीयता का साथ छोड़ा पर चूंकि कॉमिक फ्लेवर वाली फिल्मों में यह सब चल जाता है, सो यह ज़्यादा अखरता नहीं है। ‘लुका छुपी’ वाले निर्देशक लक्ष्मण उटेकर ने इस फिल्म में भी अपनी पिछली फिल्म का-सा ही रंग-ढंग रखा है। बस फिल्म इस बार मथुरा की बजाय राजस्थान में है। उस फिल्म की तरह इसमें भी कृति सैनन व पंकज त्रिपाठी की लगातार मौजूदगी और वैसे-से ही कॉमिक तेवर साफ चुगली खाते हैं कि लेखक-निर्देशक की जोड़ी के पास नया कुछ देने का अभाव है। फिल्म के लिए एक कायदे का अर्थपूर्ण नाम तक तो तलाश नहीं पाए ये लोगकृति ने जम कर काम किया है, शायद अपने अब तक के कैरियर का सर्वश्रेष्ठ। पंकज त्रिपाठी तो हरा धनिया हो ही चुके हैं। जहां होते हैं, रंगत व स्वाद बढ़ा देते हैं। सई तम्हाणकर, मनोज पाहवा, सुप्रिया पाठक कपूर ने भी इनका खूब साथ निभाया। थोड़ी देर को आए पंकज झा, आत्मजा पांडेय, नूतन सूर्या, अमरदीप झा, शेख इशाक, जया भट्टाचार्य, नरोत्तम बैन, ज्ञान प्रकाश आदि भी जंचे। अमेरिकी जोड़े के रूप में ऐडन व्हायटॉक व एवलिन एडवर्ड्स ने उम्दा काम किया। नेटफ्लिक्स पर आई फिल्म के कुछ संवाद बढ़िया हैं। स्थानीय बोली से रंगत जमती है। अमिताभ भट्टाचार्य के गीतों व ए.आर. रहमान के संगीत ने फिल्म को कसा और निखारा ही है। गीतों की कोरियोग्राफी भी उल्लेखनीय है। आकाश अग्रवाल के कैमरे ने किरदारों के साथ-साथ राजस्थान की रंगत को भी बखूबी पकड़ा। ड्रोन शॉट्स ज़रा कम होते तो बेहतर था। इस किस्म की फिल्में मुख्यधारा के सिनेमा में बन रही हैं, हिन्दी वालों के लिए यही बड़ी बात है। एक वर्जित समझे जाने वाले विषय पर हौले से ही सही, बात तो हुई और चंद ही सही, सवाल तो उठाए गए। और अंत में फिल्म कब इमोशनल कर जाती है, पता ही नहीं चलता। मिमी को अमेरिकी जोड़े से मिलवाने वाले ड्राईवर (पंकज त्रिपाठी) से एक दिन मिमी पूछती है कि वे लोग भाग गए, तू क्यों नहीं भागा? वह जवाब देता है-ड्राईवर हूं न, सवारी को उसकी मंज़िल तक पहुंचाए बिना नहीं भाग सकता। यह फिल्म भी ऐसी ही है। यह न सिर्फ अपनी तय की हुई डगर पर चलती है बल्कि बल्कि दर्शकों को मनोरंजन की सवारी कराते हुए संतुष्टि की मंज़िल तक भी ले जाती है। इसे देखने के लिए इतनी वजह बहुत है।

ओल्ड रिव्यू-‘तीन’ में और तेरह में भी

ओल्ड रिव्यू-‘तीन’ में और तेरह में भी

कोरियाई फिल्में अब हिन्दी वालों को ज्यादा भा रही हैं। 2013 में आई दक्षिण कोरियाई फिल्म ‘मोंटाज’ का रीमेक ‘तीन’ एक सस्पैंस फिल्म है। एक बूढ़ा आठ साल पहले किडनैप हुई और फिर मारी गई अपनी नातिन के किडनैपर की खोज में अभी भी पागलों की तरह लगा हुआ है जबकि पुलिस इस केस से पल्ला झाड़ चुकी है और इस केस को देख रहा अफसर पुलिस की नौकरी छोड़ अब चर्च में पादरी बन चुका है। लेकिन नाना का कहना है कि वह इंसाफ मिलने तक चुप नहीं बैठेगा। अचानक शहर में एक और बच्चा किडनैप होता है। बिल्कुल उसी स्टाइल में और उसके बाद के तमाम वाकये भी वैसे ही घटते हैं जो आठ साल पहले हो रहे थे। आखिर राज़ खुलता है और सच सामने आ ही जाता है एक सस्पैंस फिल्म में आमतौर पर रफ्तार, रोमांच, तेज़ी से बदलती-घटती घटनाओं का बोलबाला होता है। लेकिन यह फिल्म कुछ हटके है। यहां कोलकाता शहर अपनी धीमी गति के साथ मौजूद है। मुख्य पात्र एक सुस्त रफ्तार बूढ़ा है जो अपने खटारा स्कूटर को ज़बर्दस्ती घसीटता रहता है। फिल्म की स्पीड भी धीमी है। बल्कि कई जगह तो इतनी ज़्यादा धीमी है कि उकताहट होने लगती है। खैर, इन सबसे भी आप एडजस्ट करलें मगर सस्पैंस फिल्म में जब रहस्य खुलता है तो एक झटका-सा लगता है। यहां वैसा भी नहीं हो पाया और ‘शॉक-वैल्यू’ की यह कमी इस फिल्म को एक करारा झटका देने के लिए काफी है। पर्दे पर सच सामने आने से पहले ही दर्शक को सच्चाई पता चल जाए तो सस्पैंस फिल्म देखने का सारा मज़ा ही खत्म हो जाता है और यहां यही हुआ है। अमिताभ बच्चन अपने पूरे कद के साथ मौजूद हैं। वह बताते हैं कि उनकी मौजूदगी कैसे दूसरों के लिए अभिनय का सबक बन जाती होगी। नवाजुद्दीन सिद्दिकी और विद्या बालन के किरदार छोटे हैं, कमज़ोर हैं और पुख्ता स्क्रिप्ट के अभाव में ये दोनों ही पूरी मेहनत करने के बावजूद अपेक्षित असर छोड़ पाने में नाकाम रहे हैं। रिभु दासगुप्ता का निर्देशन अच्छा है। कोलकाता को एक किरदार बनाने की उनकी कोशिश रंग लाती है। कहानी को एक अलहदा ढंग से कहने की उनकी शैली भी लुभाती है। लेकिन स्क्रिप्ट की कमज़ोरी और सुस्त गति फिल्म को ऊपर नहीं उठने देती। कई जगह तो ऐसा भी लगता है कि आप विद्या बालन वाली ‘कहानी’ से बच गए माल को एक अलग किस्म के छौंक के साथ देख रहे हैं। कुछ अलग हट कर देखना चाहें, अमिताभ की उम्दा एक्टिंग को सराहना चाहें, तो यह फिल्म देखें।...

वेब रिव्यू-रोमांच की आंच में तप कर निकला ‘फैमिली मैन 2’

वेब रिव्यू-रोमांच की आंच में तप कर निकला ‘फैमिली मैन 2’

एक्शन और रोमांच से भरी एक ऐसी वेब-सीरिज़ जिसका मुख्य नायक एक सीक्रेट एजेंट हो और देश को बचाने के लिए जान हथेली पर लिए घूमता हो, उस सीरिज़ का नाम ‘फैमिली मैन’...? किसने सोचा होगा यह नाम? और क्यों? लेकिन इस सीरिज़ को देख चुके लोग जानते हैं कि श्रीकांत तिवारी नाम का यह नायक असल में कितना मजबूर फैमिली-मैन है जो एक तरफ अपने फर्ज़ और दूसरी तरफ अपनी फैमिली के प्रति ज़िम्मेदारियों के बीच इस कदर फंसा हुआ है कि उस पर तरस आता है। उसकी पत्नी उससे खुश नहीं है, बेटी हाथ से निकली जा रही है, लेकिन वह है कि देश और ड्यूटी के प्रति अपने जुनून में कमी नहीं आने देता। यह सीरिज़ दरअसल ऐसे ही जुनूनियों की कहानी है जो सामने न आकर हर दिन, हर पल देश के लिए कहीं खड़े हैं, किसी न किसी रूप में। एक जगह एजेंट जे.के. कहता भी है-‘करते नेता हैं और मरते हम हैं।’ तो श्रीकांत का जवाब होता है-‘हम किसी नेता के लिए नहीं, उसके पद और उस पद की प्रतिष्ठा के लिए अपनी जान दांव पर लगाते हैं।’ ‘फैमिली मैन’ के पिछले सीज़न में अपने परिवार के उलाहने सुनता रहा श्रीकांत अब एक प्राइवेट नौकरी कर रहा है और अपने से आधी उम्र के बॉस के ताने सुन रहा है। अब उसके पास परिवार को देने के लिए वक्त और पैसा, दोनों हैं लेकिन उसकी फैमिली अब भी उससे खुश नहीं है। खुश तो अंदर से वह भी नहीं है। और एक दिन वह लौट आता है-उसी रोमांच की दुनिया में जहां उसे आनंद मिलता है, संतुष्टि मिलती है। मगर उसे क्या पता था कि उसके इस रोमांच भरे काम की आंच उसके घर के भीतर जा पहुंचेगी। लेकिन देश को दुश्मनों से बचाने का उसका जज़्बा कम नहीं होता और आखिर वह जीतता भी है-अपनी नज़रों में और अपनों की नज़रों में भी। राज, डी.के., सुपर्ण वर्मा, सुमन, मनोज की टीम ने इस सीरिज़ की कहानी, स्क्रिप्ट, संवादों आदि को लिखने और किरदारों को खड़ा करने में जो मेहनत की है, वह पर्दे पर साफ झलकती है। अगर बहुत ज़ोर से दिमाग न झटकें तो आप इसकी कहानी में कोई बड़ी चूक नहीं निकाल सकते। इस किस्म की एडवेंचर्स, थ्रिलर कहानियों में नायकों-खलनायकों के बीच लगातार चूहे-बिल्ली का खेल चलना और अंत में बिल्ली का चूहे पर जीत हासिल करने का जो फार्मूला विकसित हो चुका है, यह कहानी भी उस लीक से नहीं हटती और दो-एक जगह दो-एक पल को सुस्ता कर फिर रफ्तार पकड़ लेती है। कहीं कुछ अटकाव होता भी है तो चैल्लम सर जैसा कोई किरदार आकर उसे संभाल लेता है। लगातार दौड़ती पटकथा के बीच रोमांच, रोमांस, हंसी, बेबसी के संवाद आकर अपना असर छोड़ते जाते हैं। बड़ी बात यह भी कि इस कहानी में किरदार जहां के हैं, वहीं की भाषा में बात कर रहे हैं। सिनेमा को रिएलिस्टिक बनाने की दिशा में यह एक बड़ा और सार्थक कदम है जिसका स्वागत होना चाहिए। दूरियां कम करना भी तो सिनेमा का ही एक काम है। लिखने वालों ने तो जम कर लिखा ही, राज, डी.के और सुपर्ण वर्मा ने इसे कस कर निर्देशित भी किया है। नौ एपिसोड और निर्देशक की पकड़ कहीं भी ढीली न पड़े तो उन्हें सिर्फ बधाई ही नहीं, तारीफें और पुरस्कार भी मिलने चाहिएं। एक सराहनीय काम इस कहानी के लिए किस्म-किस्म के किरदार गढ़ने और उनके लिए उतने ही किस्म के कलाकारों का चयन करने का भी हुआ। मुकेश छाबड़ा ने किरदारों से मेल खाते और वैसी ही पृष्ठभूमि से कलाकारों को चुन कर इस कहानी को जो यथार्थवादी लुक दिया है, उससे यह सीरिज़ अन्य निर्माताओं के लिए एक बड़ी प्रेरणा बनने जा रही है। लोकेशन, कैमरा, गीत-संगीत ने अगर इस कहानी को संवारा है तो सुमित कोटियान की चुस्त एडिटिंग...

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