Thursday, 8 April 2021

रिव्यू-मनोरंजन का सन्नाटा है ‘साइलेंस’ में

 -दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
ट्रैकिंग के लिए गए चार लड़कों को एक लड़की की लाश मिलती है। लड़की जस्टिस चौधरी की बेटी है। चौधरी के कहने पर ए.सी.पी. अविनाश को इस केस में लगाया जाता है। अविनाश और उसकी टीम के लोग काफी छानबीन करके एक दिन केस क्लोज़ कर ही देते हैं। लेकिन
, केस क्लोज़ होने और केस सॉल्व होने में फर्क होता है, है न...?

Sunday, 4 April 2021

रिव्यू-सुकून से देखो ‘घर पे बताओ’

-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
.टी.टी. ने सचमुच सिनेमा का बहुत भला किया है। खासतौर से उन कहानीकारो, फिल्मकारों का जिनके रचे को सिनेमाई गणित के जोड़-तोड़ में थिएटरों में जगह नहीं मिल पाती थी। उन दर्शकों का भी जो कुछ अलग-सा देखना चाहते थे लेकिनकहां और कैसे देखेंकी ऊहापोह में उलझ कर रह जाते थे। यह फिल्म ऐसी ही है जिसे बनाने वालों और देखने वालों को .टी.टी. का शुक्रगुजार हो लेना चाहिए।
 

रजनीकांत-एक आभामंडल का पुरस्कृत होना...

-दीपक दुआ...
मुबारक हो, दादा साहब फाल्के को रजनीकांत पुरस्कार मिला है।
 
यह आलेख 4 अप्रैल केप्रभात खबरमें आया है
अभिनेता रजनीकांत को दादा साहब फाल्के पुरस्कार दिए जाने की घोषणा के साथ ही उनके बारे में प्रचलित अविश्वसनीयचुटकुलोंकी भीड़ में एक और चुटकुला जुड़ गया। जहां आम सिने-प्रेमियों के लिए सुपरस्टार रजनीकांत को दिया जाने वाला भारतीय फिल्मोद्योग का यह सर्वोच्च पुरस्कार एक सुखद खबर है वहीं रजनी के चाहने वालों के लिए उनकेथलाईवाको मिला यह पुरस्कार असल में इस पुरस्कार का ही सम्मान है। हिन्दी-मराठी के दर्शक-पाठक इस बात पर हैरान हो सकते हैं और चाहें तो क्रोधित भी, लेकिन जिन्हें रजनी सर के प्रशंसकों के बीच उनकी लोकप्रियता का अंदाजा है वे भली भांति जानते हैं कि रजनी के चाहने वालों के लिए रजनी से बढ़ कर कुछ भी नहीं है-फाल्के पुरस्कार तो छोड़िए, स्वयं भगवान भी नहीं। 

Tuesday, 30 March 2021

रिव्यू-थोड़ी हाई थोड़ी फ्लैट ‘पगलैट’

 -दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
लखनऊ की संध्या का पति आस्तिक शादी के पांच महीने में ही मर गया। कल ही उसकी अंत्येष्टि हुई है। लेकिन संध्या को तो रोना रहा है और भूख भी जम कर लग रही है। उसे चाय नहीं पेप्सी पीनी है, गोलगप्पे खाने है। अगले 13 दिन तक घर में जमा किस्म-किस्म के लोगों की सोच और नज़रों से निबटना है। कुछ पुराने हिसाब चुकता करने है। कुछ नए फैसले लेने है। कुछ चीज़ों पर मिट्टी डालनी है तो कुछ नए बीज भी बोने हैं।
 

Saturday, 27 March 2021

रिव्यू-‘मुंबई सागा’ वास्तव में है क्या...?

 -दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
एक शरीफ आदमी ने मजबूरी में एक गुंडे को मारा। गुंडे का बॉस उस शरीफ आदमी के पीछे पड़ गया। बॉस के विरोधी गुट वाले नेता ने उस शरीफ आदमी को अपनी छत्रछाया में ले लिया। शरीफ आदमी अब गुंडा बन गया, अपना गैंग बना लिया। पर जब उसके आका को उससे खतरा महसूस हुआ तो उसने उसे हटाने के लिए दूसरे लोग आगे कर दिए।