-दीपक दुआ…
सबसे पहले – ‘मैं सीत्ता पर हाथ रख कर कसम खाता हूं कि इस फिल्म को देखते समय मैं अपने दिमाग में कोई सवाल नहीं आने दूंगा, ‘धुरंधर’ को बिल्कुल याद नहीं करूंगा और इस फिल्म को देखने के बाद मैं थिएटर की दीवारों पर सिर पटक-पटक कर अपनी जान भी नहीं दूंगा।’ चलिए अब आगे बढ़ते हैं।
एक सीन देखिए – सर हमने मकान को चारों तरफ से घेर लिया है। ठीक है, लेकिन सीत्ता को आंच नहीं आणी चाहिए। इसके बाद वे बंदे चारों तरफ से उस लकड़ी के मकान पर सैंकड़ों गोलियां ऐसे बरसाते हैं जैसेकि सर के आदेश के बाद कोई गोली सीत्ता को छू भी न सकेगी। अरे बावलो, कुछ तो दिमाग लगाओ, सीत्ता अगर ऐन वक्त पर नीचे न बैठी होती तो तुम सर को क्या जवाब देते?
हां तो साहेबान, मेहरबान, कद्रदान, बिछ गया है यशराज फिल्म्स का चमकीला दस्तरखान। और इस पर परोस दिया गया है भव्यता, रंगीनियत, चमक-दमक और चटकीलेपन में लिपटा वही पुराना खोखला सामान। ‘बॉलीवुड’ के सभी बड़े निर्माता अब यही तो कर रहे हैं। कंटेंट की जगह अब पैकेजिंग का ज़माना आ चुका है। दर्शकों को मूर्ख बनाना इतना आसान पहले कभी न था।
इस फिल्म (Alpha) का ट्रेलर इसकी कहानी नहीं खोलता है। सिर्फ इतना बताता है कि बॉबी देओल के पास एक बच्ची है जिसकी मां का नाम जाणकी था इसलिए हम इसे सीत्ता बुलावेंगे। वैसे यह बंदा भी अजीब है, इतने साल हो गए आर्मी में, पर अपनी ज़ुबान का टच ही न छोड़ रहा। घणा प्यार करे है अपनी मातरभाषा से। बाद में दो लड़कियां आपस में लड़ती दिखाई देती हैं और सीता बॉबी से भिड़ती। इस किस्म की फिल्मों की कहानी खोली नहीं जाती। यहां भी कुछ ज़्यादा बताना सही नहीं होगा क्योंकि क्या पता आपमें से किसी को अपना पैसा और समय फूंकने की खुजली हो और रिव्यू पढ़ कर वह कहे-ल्ले, कहानी तो बता दी, अब बचा क्या। तो बस यूं समझ लीजिए कि ये लड़कियां लड़ रही हैं, पहले आपस में, फिर दूसरों से, कोई उन्हें बचा रहा है, किसी को वे बचा रही हैं, कोई उन्हें मारना चाहता है, किसी को वे मारना चाहती हैं और इस सारी मारकाट के बीच ऐल्फा नाम का एक ऐसा प्रोग्राम है जिसकी इंडिया ने कद्र नहीं की और अब इंडिया ऐल्फा से डरेगा। वैसे होता तो ‘अल्फा’ है लेकिन फिल्म में लिखा और बोला ‘ऐल्फा’ ही गया है तो हम भला क्यों अपनी मात्राएं टेढ़ी करें।
इस फिल्म (Alpha) की कहानी उन उदय चोपड़ा ने (कोई नहीं हंसेगा) लिखी है जिन्होंने 2010 में आई ‘प्यार इम्पॉसिबल’ की भी कहानी, स्क्रिप्ट आदि लिख कर अपने पापा के पैसे फूंके थे। इस बार स्क्रिप्ट का जिम्मा सौमिल शुक्ला और श्रीधर राघवन ने उठाया है। वैसे इसे ‘उठाया’ की बजाय ‘गिराया’ लिखा जाना चाहिए क्योंकि इन दोनों ने जिस तरह से फिल्म में हिस्ट्री, ज्योग्राफी, फिज़िक्स, कैमिस्ट्री की कमर तोड़ी है, उससे फिल्म का स्तर उठने की बजाय गिरा ही है। मतलब, क्या ही बताएं कि फिल्म में लॉजिक-वॉजिक नाम की चिड़िया की बीट तक नहीं है। और हां, डायलॉग्स तो सारे किरदारों के लिए ऐसे-ऐसे भारी-भरकम लिखे हैं कि सुन कर इनकी हरकतों पर आ रही हंसी और बढ़ जाती है।
इस किस्म की फिल्म आए तो आप चाहें या न चाहें आपको ‘धुरंधर’ का यथार्थ याद आएगा ही आएगा। लेकिन इस फिल्म में ‘धुरंधर’ का धुआं तक नहीं है। हो भी नहीं सकता क्योंकि जब आपका मकसद स्टाइलिश ढंग से कोरियोग्राफ किए गए बेमतलब के एक्शन के ज़रिए लोगों को लुभाना हो, अपनी नायिकाओं की छाती-टांगें दिखा कर उन्हें ललचाना हो, दमदार कहानी की बजाय तेज रफ्तार से बजते म्यूज़िक के साथ ऊल-जलूल माल दिखाना हो तो यकीनन आप सिनेमा नहीं प्रोजक्ट बना रहे हैं। ‘ऐल्फा’ देख कर साफ लगता है कि यशराज ने बस अपने स्पाई यूनिवर्स का दायरा बढ़ाना था, बढ़ा लिया।
‘ऐल्फा’ (Alpha) को नापसंद किए जाने की एक बड़ी वजह इसका राष्ट्रबोध के साथ खिलवाड़ भी है। फिल्म देख कर एक आम दर्शक को अहसास होता है कि दूसरे देश के एक घुसपैठिए ने हमारे यहां घुस कर अपना साम्राज्य खड़ा कर लिया और हम सूंध तक न पाए। हमारा रॉ चीफ दुनिया की नज़रों से बच कर साल में कई बार स्पेन जाता रहा और दुनिया में किसी को पता भी नहीं चला (फिर से, कोई हंसेगा नहीं)। और हां, यह तो पता लगाओ कि पैदा होने के बाद से बिना पासपोर्ट के स्पेन पहुंची और बीस साल से वहां रही लड़की का इंट्रो सॉन्ग पंजाबी में होगा, यह बात यशराज में कौन तय करता होगा?
‘द रेलवे मैन’ जैसी सीरिज़ बना चुके डायरेक्टर शिव रवैल अब यशराज फिल्म्स के नए पेइंग गैस्ट बन चुके हैं। वे तो इसी में खुश होंगे कि इत्ते बड़े सितारों वाली इत्ती बड़ी फिल्म डायरेक्ट करने को मिल रही है, वही काफी है। बदनाम होंगे तो क्या नाम न होगा।
ऐसी फिल्मों में हर किरदार की एक टोन बना दी जाती है और उसे उसी तरह की एक्टिंग करते हुए कभी नीचे तो कभी दीवार को देख कर संवाद बोलने होते हैं। आलिया भट्ट, शरवरी, अनिल कपूर, बॉबी देओल वगैरह ने यही किया है। दिब्येंदु भट्टाचार्य ने बढ़िया काम किया। हृतिक रोशन सिर्फ धागा जोड़ने आए थे। शरवरी ने दर्शकों की आंखों को ‘सुकून’ पहुंचाने का भी काम किया।
इस फिल्म (Alpha) में लगभग सभी सोल्जर-सोल्जर खेल रहे हैं। यहां तक कि आलिया के पालतू चूहे का नाम भी सोल्जर है। लेकिन जिस बचकाने ढंग से यह फिल्म बनाई गई है उससे यह खेल सोल्जर-सोल्जर की बजाय छोल्जर-छोल्जर लग रहा है। तुतलाता हुआ सिनेमा है यह जो ऐसे ही बनता रहा तो जल्द ही लंगड़ाने भी लगेगा।
(रेटिंग की ज़रूरत ही क्या है? रिव्यू पढ़िए और फैसला कीजिए कि यह कितनी अच्छी या खराब है। और हां, इस पोस्ट के नीचे कमेंट कर के इस रिव्यू पर अपने विचार ज़रूर बताएं।)
Release Date-03 July, 2026 in theaters
(दीपक दुआ राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त फिल्म समीक्षक हैं। 1993 से फिल्म–पत्रकारिता में सक्रिय। ‘सिनेयात्रा डॉट कॉम’ (www.cineyatra.com) के साथ–साथ विभिन्न समाचार पत्रों, पत्रिकाओं, वेब–पोर्टल, रेडियो, टी.वी. आदि पर सक्रिय दीपक ‘फिल्म क्रिटिक्स गिल्ड’ के सदस्य भी हैं।)
