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वेब-रिव्यू: पिद्दी और पिद्दी का शोरबा ‘प्रीतम एंड पैद्रो’

Deepak Dua by Deepak Dua
2026/07/03
in CineYatra, फिल्म/वेब रिव्यू
0
वेब-रिव्यू: पिद्दी और पिद्दी का शोरबा ‘प्रीतम एंड पैद्रो’
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-दीपक दुआ… (This review is featured in IMDb Critics Reviews)

गोआ पुलिस के इंस्पैक्टर पैद्रो (सब उसे और वह खुद को पैद्रो इच बोलता बाबा) को एक मंत्री की नाराजगी ने क्राइम ब्रांच से साइबर सेल में भेज दिया। पैद्रो को क्राइम में मज़ा आता, क्राइम का खुशबू उसको पसंद आता, साइबर की एबीसी उसको बिल्कुल इच नईं पता। तभी उस मंत्री का बेटा किडनैप हो गया। पैद्रो एक साइबर एक्सपर्ट पीटर की मदद ले रहा ताकि केस सुलझे और वह अपनी ट्रांस्फर वापस क्राइम में करवा सके। लेकिन यह सब इतना आसान होता क्या? वह बच्चा किसने किडनैप किया, काय कू किडनैप किया, उसको कैसे वापस लाना मांगता, इसके अलावा और भी बोत सारी मचमच है इस वेब-सीरिज़ ‘प्रीतम और पैद्रो’ (Pritam And Pedro) में जो जियो हॉटस्टार पर रिलीज हुई है।

भारत के प्रख्यात साइबर क्राइम एक्सपर्ट अमित दुबे की लिखी दो किताबों ‘हिडन फाइल्स’ और ‘रिटर्न ऑफ द ट्रोजन हॉर्स’ में दी क्राइम स्टोरीज़ को आधार बना कर राजकुमार हिरानी की टीम के नामी लेखकों ने इस सीरिज़ की पटकथा बुनी है। राजू हिरानी के यहां से कुछ बन कर आए तो वैसे ही उम्मीदें पहाड़ हो जाती हैं। लेकिन ‘प्रीतम और पैद्रो’ (Pritam And Pedro) के इस पहाड़ को खोदने पर चूहा तो खैर नहीं निकलता लेकिन कोई बड़ा खज़ाना भी हाथ नहीं लगता है।

दिक्कत कहानी के साथ नहीं बल्कि स्क्रिप्ट के साथ है। जब क्राइम की बात आए तो आप लॉजिक के साथ खिलवाड़ नहीं कर सकते। और जब क्राइम में साइबर घुस जाए तो समझिए कि आपको एक-एक सांस छान कर लेनी होगी। लेकिन यहां ऐसा नहीं हुआ है और इसका सबसे बड़ा कारण इस सीरिज़ (Pritam And Pedro) को लिखने-बनाने वालों के मन की वह कन्फ्यूज़न है जो उन्हें यह नहीं तय करने देती कि इसे उन्होंने क्राइम स्टोरी बनाना है या इससे कॉमेडी क्रिएट करनी है या दर्शकों को ड्रामा दिखाना है। सो, उन्होंने मुख्य प्लॉट पर एक बड़ी बिल्डिंग खड़ी करने के साथ-साथ तीन-चार अलग-अलग कोठरियां भी बना दीं ताकि जिसे जो पसंद आए, ले ले। क्राइम की सीरियस बातों के बीच अचानक कोई झल्लाने वाली कॉमेडी कर देता है। साइबर की तकनीकी बातों के बीच अचानक कोई बेवकूफाना कमेंट आ जाता है। कुछ ड्रामा खड़ा हो उससे पहले ही गाड़ी पटरी बदल कर कहीं और निकल लेती है।

अपने सिनेमा में साइबर एक्सपर्ट लोग जिस तरह से मिनटों में केस सुलझा लेते हैं (शायद वह सच होता भी हो), उसे देख कर लगता है कि यदि सारे पुलिस वालों को साइबर का काम सिखा दिया जाए और सारे के सारे क्राइम पहले साइबर की नज़रों से सुलझाए जाएं तो देश में किसी मंदिर के बाहर से चप्पल तक न चोरी हो। असल में ऐसा क्यों नहीं होता है? और यह सवाल तो लोग अक्सर पूछते हैं कि जब हर देशवासी का आधार बनाते समय उसकी उंगलियों के निशान, आंखों की स्कैनिंग कर ली थी तो हर क्राइम सीन से फिंगर प्रिंट लेकर फटाफट उसे पकड़ते क्यों नहीं हो?

छह एपिसोड की इस सीरज़ (Pritam And Pedro) में संजो कर रखने लायक कायदे के दो-चार सीन भी नहीं हैं। ‘मेरे मां-बाप एक प्लेन क्रैश में मारे गए थे’ वाला संवाद जितना हिन्दी सिनेमा में इस्तेमाल हुआ है, उतने तो प्लेन पूरी दुनिया में क्रैश नहीं हुए होंगे। यादगार संवाद एकदम लापता हैं इस सीरिज़ से। किरदार भी अनगढ़ हैं। सीरिज़ का फ्लेवर तय न कर पाने की कन्फ्यूज़न इसके किरदारों को भी झेलनी पड़ी। खुद को बार-बार धाकड़ क्राइम इंस्पैक्टर कहने वाला पैद्रो बार-बार कॉमेडी करने लगता है। साइबर का महारथी प्रीतम कभी-कभी बिल्कुल पैदल हो जाता है। मंत्री का पी.ए. पुलिस के हर सुझाव का विरोध क्यों करता रहता है? मंत्री बच्चों की तरह बार-बार मूड क्यों बदल लेता है? गोआ पुलिस का डी.आई.जी. जैसा वरिष्ठ अफसर तो कत्तई भोला दिखाया है। मंत्री के घर में तैनात कांस्टेबल हर समय ठूंसता ही रहता है और अपने इंस्पैक्टर की ही वाट लगा देता है। इतनी हिम्मत अपने पुलिस सिस्टम में किसी सिपाही में सिर्फ कॉमेडी करते समय ही हो सकती है। इंस्पैक्टर की टीम में उससे नीचे सीधे हवलदार और सिपाही हैं। लगता है लिखने वालों को ए.एस.आई. और एस.आई. के रैंक के बारे में पता ही नहीं है। हर पुलिस वाले की निजी ज़िंदगी गड़बड़ ही क्यों है? और अंत में बच्चे की किडनैपिंग का राज़ जिस तरह से खुलता है, सचमुच पहाड़ में से चूहा ही निकलता दिखाई देता है। निर्देशक अविनाश अरुण हमें ‘पाताल लोक’ और ‘थ्री ऑफ अस’ जैसी शानदार चीज़ें दे चुके हैं। उनसे इस हल्केपन की उम्मीद नहीं थी।

हालांकि कामचलाऊ मनोरंजन और टाइमपास के लिए यह सीरिज़ (Pritam And Pedro) बुरी नहीं है। यह बताती है कि अपने बच्चों पर नज़र रखिए, उन्हें मोबाइल और ऑनलाइन गेम्स के पीछे पागल मत बनने दीजिए, दूसरों को और खुद को माफ करते रहिए। लेकिन यह सब बहुत सुस्त रफ्तार और हल्केपन के साथ बताया गया है। अरशद वारसी का किरदार संजीदा होता तो उन्हें देखने में ज़्यादा मज़ा आता। राजू हिरानी की फिल्म ‘मुन्नाभाई एम.बी.बी.एस.’ के अंत में सर्किट बने अरशद के नन्हें बच्चे शॉर्ट सर्किट के तौर पर दिखे राजू हिरानी के बेटे वीर हिरानी ने प्रीतम के किरदार में अपनी एक्टिंग के हल्के पक्ष से परिचित करवाया है। अभी उन्हें काफी निखरना हैं। खासतौर से संवाद अदायगी पर उन्हें खासी मेहनत करनी होगी। विक्रांत मैसी खूब जमे। श्रुति मराठे, मोना सिंह, बोमन ईरानी, विनोद नागपाल व अन्य सभी ठीकठाक रहे। गोआ का बैकग्राउंड लुभावना रहा और कैमरा उसे सलीके से कैप्चर करता रहा।

जब कहानी साढ़े तीन एपिसोड के बाद पटरी पर आए और उसके बाद भी उसकी रफ्तार औसत ही रहे, अंत पिलपिला निकले और सबसे बड़ी बात यह कि जब लिखने-बनाने वालों के पास अपनी रचना के लिए कोई कायदे का नाम तक न हो और वे दोनों मुख्य किरदारों के नाम पर सीरिज़ का नाम ‘प्रीतम एंड पैद्रो’ (Pritam And Pedro) रख दें तो समझिए कि मामला असल में पिद्दी और पिद्दी के शोरबे सरीखा ही है।

(रेटिंग की ज़रूरत ही क्या है? रिव्यू पढ़िए और फैसला कीजिए कि यह कितनी अच्छी या खराब है। और हां, इस पोस्ट के नीचे कमेंट कर के इस रिव्यू पर अपने विचार ज़रूर बताएं।)

Release Date-03 July, 2026 on Jio Hotstar

(दीपक दुआ राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त फिल्म समीक्षक हैं। 1993 से फिल्म–पत्रकारिता में सक्रिय। ‘सिनेयात्रा डॉट कॉम’ (www.cineyatra.com) के साथ–साथ विभिन्न समाचार पत्रों, पत्रिकाओं, वेब–पोर्टल, रेडियो, टी.वी. आदि पर सक्रिय दीपक ‘फिल्म क्रिटिक्स गिल्ड’ के सदस्य भी हैं।)

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