-दीपक दुआ…
फिल्में दो तरह की होती हैं। एक तो वे जिन्हें देखने का फैसला आमतौर दर्शक लोग रिव्यू आदि जानने के बाद करते हैं। तारीफें सुन लीं तो चले गए, बुराई सुन ली तो छोड़ दिया। दूसरी तरह की फिल्में वे होती हैं जिन्हें रिव्यू की ज़रूरत ही नहीं होती। लिखने वाले सिर पटकें या छाती पीटें, देखने वाले इन्हें देख ही लेते हैं। ‘वैलकम टू द जंगल’ इसी तरह की फिल्म है।
दर्शक भी दो तरह के होते हैं। एक तो वे जो फिल्मों को देखने का फैसला उनके बारे में जानने के बाद ही करते हैं। कहीं से तारीफें सुनीं तो देख आए, बुराई पता चली तो छोड़ दिया। दूसरी तरह के दर्शक वे होते हैं जिन्हें फर्क ही नहीं पड़ता कि रिव्यू कैसे हैं। ‘वैलकम टू द जंगल’ ऐसे ही दर्शकों के लिए है।
जिस फिल्म को फरहाद सामजी ने लिखा हो और अहमद खान ने बनाया हो उससे किसी किस्म के सयानेपन की उम्मीद लगाने वाले से बड़ा बेवकूफ कोई नहीं हो सकता। ज़रूर इन के पास फिल्म इंडस्ट्री के बड़े-बड़े लोगों के काले कारनामों के वीडियो होंगे, वरना यूं ही हर कोई इन पर मेहरबान नहीं होता। खैर, हमें तो शर्म स्वर्गीय नीरज वोरा जी को याद करके आ रही है जिनकी लिखी कहानी इन हाथों में आ पड़ी।
तो कहानी यूं है कि टैक्स बचाने की हेरा फेरी करने के लिए एक रईस आदमी कुछ आवारा पागल दीवाने लोगों को लेकर दो हज़ार करोड़ रुपए की फिल्म बनवा रहा है ताकि वह पिट जाए। इस फिल्म को बनाने की भागमभाग में ये लोग आज़ाद गंज नाम की एक ऐसी जगह पर जा पहुंचते हैं जहां कुछ आतंकवादियों आकर हंगामा करते रहते हैं। ये लोग वहां ऐसी हलचल मचाते हैं कि गांव वाले इनका वैलकम करते हैं। तभी आतंकवादियों का वैलकम बैक हो जाता है और फिर एक्शन का गरम मसाला फैला कर ये फूल लोग सब कुछ फाइनल कर देते हैं।
कहानी समझ में आई? अगर आ गई तो आप ‘वैलकम टू द जंगल’ देख सकते हैं। दरअसल फिल्म की कहानी खराब नहीं है। बल्कि सब कुछ इतने खराब ढंग से लिखा, बनाया, फिल्माया गया है जैसे यह सब जान-बूझ कर किया गया हो। फिल्म के अंदर जो चल रहा है, ऐसा लगता है कि यह फिल्म भी असल में उसी तरह से बनाई गई है। किसी को भी उठवा लो, किसी से कुछ भी बुलवा लो, ऊल-जलूल हरकतें करवा लो, संवादों के नाम पर सामने वाले की बेइज़्ज़ती लिखवा लो, कुछ-कुछ देर बाद एक्शन डलवा लो, क्रिटिक्स छाती पीटते रहें, तुम अपनी फिल्म चलवा लो।
इस किस्म की फिल्मों को नॉनसेंस या ब्रेनलैस कॉमेडी कहा जाता है। इन्हें देखते हुए आपको खुद को मूरख मानना पड़ता है, अपने दिमाग को पागलपंती वाले मोड में डालना पड़ता है। ऐसा कर सकें तो यह फिल्म आपको पसंद आ सकती है। एक काम कीजिए, इसका ट्रेलर देखिए, अगर पसंद आ जाए तो समझिए कि ‘वैलकम टू द जंगल’ आपके लिए है।
ऐसी फिल्मों में एक्टिंग के स्तर की बात नहीं की जाती, खासतौर से लीड रोल में जिन कलाकारों को लिया जाता है, उनकी तो बिल्कुल भी नहीं। कपिल शर्मा के शो में धमाल करने वाले कृष्णा अभिषेक और कीकू शारदा यहां ठुस्स रहे हैं। यशपाल शर्मा और मुकेश तिवारी जैसे अभिनेता यहां जूनियर कलाकारों से भी बदतर रहे हैं। ट्रेलर में दलेर मेंहदी को डायलॉग बोलते देख कर ही समझ में आ जाता है कि बंदे को कितनी ‘शानदार’ एक्टिंग आती है। मज़ा आता है कहीं पे निगाहें कहीं पे निशाना वाले श्रेयस तलपड़े को बेवकूफाना हरकतें करते हुए देख कर। मज़ा आता है फरीदा जलाल को अनगढ़ ज़ुबान में बोलते देख और किरण कुमार का हर बार ‘बड़ी बी सही कह रही हैं’ बोल कर गाढ़ी उर्दू में उसका तर्जुमा करते देख। उर्दू भाषा का इतना मज़ाक पहले किसी फिल्म में नहीं उड़ाया गया होगा। दिशा पटनी और जैक्लिन फर्नांडीज़ को जिस ‘काम’ के लिए रखा गया, उन्होंने वही किया। रवीना टंडन इन पर भारी रहीं। लारा दत्ता वाला पूरा ट्रैक बेमतलब रहा, उसे छोटा रखते तो फिल्म और कस जाती।
ऐसी फिल्मों में सत्व की बजाय तत्व पर ध्यान दिया जाता है। और इस फिल्म ‘वैलकम टू द जंगल’ में ऐसे तत्व बिखरे पड़े हैं जिन्हें देख कर एक आम दर्शक टाइमपास मनोरंजन हासिल करता है। इस फिल्म के किरदार पालतू के हैं, उनके संवाद फालतू के हैं, एक्शन घिसा हुआ है, रोमांस पिसा हुआ है, हरकतें ऊल-जलूल हैं, कॉमेडी बेफिजूल है, गाने चलताऊ हैं, जैक्लिन की टांगें और दिशा का क्लीवेज दिखाऊ है, अब टाइम पास के लिए बच्चे की जान लेंगे क्या…?
(रेटिंग की ज़रूरत ही क्या है? रिव्यू पढ़िए और फैसला कीजिए कि यह कितनी अच्छी या खराब है। और हां, इस पोस्ट के नीचे कमेंट कर के इस रिव्यू पर अपने विचार ज़रूर बताएं।)
Release Date-26 June, 2026 in theaters
(दीपक दुआ राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त फिल्म समीक्षक हैं। 1993 से फिल्म–पत्रकारिता में सक्रिय। ‘सिनेयात्रा डॉट कॉम’ (www.cineyatra.com) के साथ–साथ विभिन्न समाचार पत्रों, पत्रिकाओं, वेब–पोर्टल, रेडियो, टी.वी. आदि पर सक्रिय दीपक ‘फिल्म क्रिटिक्स गिल्ड’ के सदस्य भी हैं।)
