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Home फिल्म/वेब रिव्यू

रिव्यू-यह ‘इक्का’ तो हल्का निकला

Deepak Dua by Deepak Dua
2026/07/10
in फिल्म/वेब रिव्यू
2
रिव्यू-यह ‘इक्का’ तो हल्का निकला
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-दीपक दुआ… (This review is featured in IMDb Critics Reviews)

‘इक्का’ समझते हैं न आप? ताश के खेल में सबसे अव्वल माना जाता है इसे। वकील अर्जुन मेहरा को लोग इक्का कहते हैं क्योंकि वह आज तक कोई केस नहीं हारा। और यह तब है जब वह हमेशा मासूमों के पक्ष में हक के लिए लड़ता है। लेकिन इस बार मामला अलग है। उद्योगपति नेता का बिगड़ैल बेटा शौर्यमन एक लड़की के मर्डर के मामले में फंसा है। अर्जुन को किसी मजबूरी के चलते यह केस लेना पड़ता है। आखिर क्या थी उसकी मजबूरी? और क्या अर्जुन इस बार गलत आदमी का साथ दे रहा है? क्या वह यह केस हारेगा या जीत कर इक्का बना रहेगा?

देखने-सुनने में यह फिल्म (Ikka) एक थ्रिलरनुमा कोर्टरूम ड्रामा लग रही है। ऐसी फिल्मों में कहानी बताई नहीं, छुपाई जाती है। इसका ट्रेलर भी कुछ खास परतें नहीं खोल रहा है। खासतौर से अर्जुन की उस मजबूरी का ज़िक्र कहीं नहीं है जिसके चलते वह शौर्यमन गौड़ का केस लेता है। (फिल्म में सरनेम ‘गौर’ व ‘गौड़’ बोला गया है। भई ऐसा सरनेम रखते ही क्यों हो जिसे रोमन में पढ़ कर एक्टर ठीक से बोल ही न पाएं?) इस फिल्म को देखते समय लगता है कि स्क्रीन पर सब ठीक-ठाक चल रहा है। लेकिन बहुत जल्दी इस ठीक-ठाक के नीचे दबी कहानी का पिलपिलापन महसूस होने लगता है। फिल्म खत्म होते-होते काफी कुछ अधूरा-सा, बनावटी-सा, जबरन-सा महसूस होने लगता है। जब आप खुद से सवाल पूछते हैं कि यह जो देखा, इसमें गहराई कितनी थी तो अंदर से कोई ढंग का जवाब नहीं आता।

असल में इस फिल्म (Ikka) की कहानी तो जो है, सो है ही, उस पर खड़ा किया गया ढांचा भी बे-सलीका है। पहली बात-इक्का को लोग इक्का कहते हैं, यह बताया गया है, दिखाया नहीं गया है। कोई तगड़े-से केस में उसे जीतते हुए दिखाते तो यह स्थापित हो सकता था। और उसे इक्का ही क्यों कहते हैं? वकालत के पेशे में ताश से जुड़ा नाम? सोचिए, वकालत की दुनिया में ऐसा नाम कैसे और क्यों उछला होगा? ज़ाहिर है कि यह एक ‘फिल्मी’ नाम है जो इस फिल्म के लिए गढ़ा गया है। इक्का के नाम का हौवा बना रखा है कि वह कमाल का वकील है, कभी कोई केस नहीं हारा वगैरह-वगैरह, जबकि बाद में कोर्ट में बहस करते या केस लड़ते समय वह कोई तोप नहीं चला पाता। उसका स्टाइल, उसका आभामंडल कुछ अलग-सा दिखाते तो बात बन सकती थी। इक्का और शौर्यमन के बीच की अदावत का जो तार जोड़ा गया है वह बेहद हल्का और ज़बर्दस्ती घुसेड़ा गया लगता है। उसकी जो मजबूरी दिखाई गई है, वह भी विश्वसनीय नहीं लगती।

दरअसल इस किस्म की स्क्रिप्ट को लिखने वाले तर्क या दर्शकों की अपेक्षा के आधार पर नहीं बल्कि अपनी सुविधा के हिसाब से लिखते हैं। इसीलिए पर्दे पर आकर्षक दिखने वाली बातें ज़रा-सा दिमाग लगाते ही खोखली लगने लगती हैं। इस फिल्म (Ikka) के साथ भी यही हुआ है। केस की तफ्तीश भी एकदम पिलपिले अंदाज़ में की गई है। बाकी सब बातों पर गौर हो रहा है लेकिन मुंबई की सड़कों पर लगे कैमरों का ज़िक्र तक नहीं है। और हां, हमारी फिल्मों में किसी राजनेता के बेटे का केस होने पर ‘इलैक्शन सिर पर है’ का संवाद कितनी बार इस्तेमाल होगा? और सिर्फ बोला ही है उन्होंने, इलैक्शन की कुछ हलचल भी तो दिखा देते।

‘वी आर फैमिली’, ‘हिचकी’ और ‘महाराज’ बना चुके निर्देशक सिद्धार्थ पी. मल्होत्रा का काम औसत रहा है। कहानी में जबरन के ट्विस्ट साफ दिखते हैं तो वहीं सीन भी प्रभावी ढंग से नहीं उभर पाए हैं। सीनियर दबंग वकील और जूनियर वकील की भिड़ंत के किस्से फिल्मों में घिस चुके हैं। एक बड़ी चूक कास्टिंग को लेकर भी हुई है। सनी देओल उनकी एक्शन इमेज से बाहर का रोल देना अब दुस्साहस नहीं गलती ही माना जाना चाहिए। और चलिए, दे भी रहे हैं तो फिर लिखिए न ‘दामिनी’ जैसा किरदार। यहां किरदार तो सारे हल्के हैं और एक्टर उनमें जबरन जान फूंकने में लगे हुए हैं। ऐसे में मामला दिखता भले ही भारी हो, होता नहीं है।

सनी देओल को सहज, सरल देखना अजीब-सा लगता है। अक्षय खन्ना का होंठ घुमा कर, टेढ़े कर के, ऊपर चढ़ा कर संवाद बोलने का स्टाइल अब पिट चुका है। दीया मिर्ज़ा, संजीदा शेख, शिशिर शर्मा, विजय विक्रम सिंह आदि साधारण रहे। सनी की बेटी बनी दरिया बेदी प्यारी लगीं। रिपोर्टर बने महेश शर्मा जंचे। एक तिलोत्तमा शोम ही असर छोड़ पाईं। गाने-वाने हल्के रहे। हल्की तो खैर नेटफ्लिक्स पर आई यह पूरी फिल्म (Ikka) ही है। फालतू समय हो तो देख लीजिए। छोड़ भी देंगे तो कोई फर्क नहीं पड़ेगा। वैसे भी, जिस कहानी के लिए फिल्म बनाने वालों को ढंग का नाम तक न मिल रहा हो, उसमें गहराई नहीं तलाशनी चाहिए।

(रेटिंग की ज़रूरत ही क्या है? रिव्यू पढ़िए और फैसला कीजिए कि यह कितनी अच्छी या खराब है। और हां, इस पोस्ट के नीचे कमेंट कर के इस रिव्यू पर अपने विचार ज़रूर बताएं।)

Release Date-10 July, 2026 on Netflix

(दीपक दुआ राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त फिल्म समीक्षक हैं। 1993 से फिल्म–पत्रकारिता में सक्रिय। ‘सिनेयात्रा डॉट कॉम’ (www.cineyatra.com) के साथ–साथ विभिन्न समाचार पत्रों, पत्रिकाओं, वेब–पोर्टल, रेडियो, टी.वी. आदि पर सक्रिय दीपक ‘फिल्म क्रिटिक्स गिल्ड’ के सदस्य भी हैं।)

Tags: akshaye khannadariya bedidia mirzaikkamahesh sharmaNetflixsanjeeda sheikhshishir sharmasiddharth p malhotrasunny deoltillotama shomevijay vikram singh
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Comments 2

  1. B S BHARDWAJ says:
    1 month ago

    बहुत बढ़िया समीक्षा दीपक जी 👏🏻👏🏻👏🏻👏🏻

    Reply
    • CineYatra says:
      1 month ago

      धन्यवाद भाई साहब

      Reply

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