-दीपक दुआ… (This review is featured in IMDb Critics Reviews)
2007 में आई पहली वाली ‘धमाल’ (Dhamaal) में गोआ के एक पार्क में ‘डब्ल्यू’ आकार में खड़े पेड़ों के नीचे खज़ाना दबा था। इस बार एक वीरान टापू में ‘एम’ आकार में खड़ी पहाड़ियों के नीचे खज़ाना है। खज़ाना भी किसका, सौ साल पहले एक डाकू शैतान सिंह का जो वह अंग्रेज़ों से लूटा करता था। अब इस खज़ाने को खोजने निकली हैं तीन टीमें-गुड्डू और जॉनी, आदि और मानव व आदि की पत्नी, लल्लन और उसकी पत्नी। साथ ही इनके पीछे पड़े हैं डाकू अधूरा और उसके साथी। इस सफर में हैं ढेरों मुसीबतें, उनसे बचने की कसरतें और इन सब की लल्लुआना हरकतें। ज़ाहिर है मकसद आपको हंसाना है, ठहाके लगवाना है।
‘धमाल’ (Dhamaal) सीरिज़ की फिल्में दर्शकों को किसी वीडियोगेम या कार्टून कॉमिक्स के भीतर ले जाती रही हैं। एक ऐसा संसार जहां फिज़िक्स-कैमिस्ट्री के नियमों की धज्जियां उड़ा कर उनसे हास्य उपजाया जाता है। किसी ने घर की घंटी बजाई और उससे आने वाले करंट ने बंदे का तंदूरी मुर्गा बना दिया या किसी के बम में चाकू घुसने के बावजूद खून न निकलना जैसे ये सीन हमें डोनाल्ड डक, मिकी माउस या टॉम एंड जैरी की दुनिया में ले जाते हैं। उनमें जो होता है वह कहीं से भी तार्किक नहीं लगता, लेकिन उसे देख कर आप हंसते हैं, ठहाके लगाते हैं, आपको मज़ा आता है और आपका दिल-दिमाग हल्का होता है। यह फिल्म भी आपको वही मज़ा देती है। बस, बच्चे बन जाइएगा इसे देखते हुए।
हम जानते हैं कि पहली वाली ‘धमाल’ (Dhamaal) सचमुच कमाल थी। आज तक भी हम उसे, उसके दृश्यों को बार-बार देखना पसंद करते हैं। दूसरी वाली ‘डबल धमाल’ (Double Dhamaal) उससे हल्की होने के बावजूद बढ़िया थी। तीसरी वाली ‘टोटल धमाल’ (Total Dhamaal) बहुत थकी हुई थी और अब यह वाली ‘धमाल 4’ (Dhamaal 4) दूसरी वाली से हल्की तो है लेकिन यह निराश नहीं करती है। एक तो इसमें फूहड़ता नहीं है, गंदी बातें नहीं हैं, ऐसे सीन और संवाद नहीं हैं जिन्हें आप फैमिली के साथ न देख सकें। इधर हिन्दी फिल्मों में कॉमेडी के परोसने के नाम पर जो दर्शकों को दिमागहीन समझने का मिशन चल रहा है, यह उससे अलग है। निर्देशक इंद्र कुमार इस फिल्म से आपको किसी कॉमिक्स या वीडियो गेम की दुनिया में ले जाते हैं और यदि आपको यह दुनिया पसंद है तो काफी सारी बातों के दोहराव व लंबे-लंबे सीक्वेंस के भटकाव के बावजूद इसे देखते हुए आप कई जगह खुल कर हंसेंगे। खुद को बुद्धिजीवी समझने वाले लोग तो वैसे भी इस किस्म की फिल्मों से खार खाते आए हैं, सो उनकी मत सुनिएगा।
ऐसी फिल्मों में एक्टिंग की बात नहीं होती क्योंकि हर कोई लाउड काम कर रहा होता है। ढेर सारे कलाकारों की इस भीड़ में आदि-मानव यानी अरशद वारसी और जावेद जाफरी की जोड़ी हमेशा की तरह जंची। संजय मिश्रा ने कमाल का काम किया ब्रो। एशा गुप्ता को लंबे समय के बाद कोई फिल्म और उसमें कायदे का किरदार मिला जिसे उन्होंने सलीके से निभाया भी। बृजेंद्र काला और विजय पाटकर को देखना भी दिलचस्प रहा। गीत-संगीत साधारण रहा। संजू राठौड़ के मशहूर मराठी गाने ‘गुलाबी साड़ी अणि लाली लाल लाल…’ को नए स्टाइल में देखना-सुनना अच्छा लगा। बैकग्राउंड म्यूज़िक के नाम शोर ज़्यादा मचाया गया। वीएफएक्स बेहद घटिया किस्म का रहा।
‘धमाल’ सीरिज़ की फिल्मों का अपना अलग ही हाल, अलग ही चाल होती है। ऊटपटांग जोकरनुमा किरदार, अजीबोगरीब हालात, कोई एक मिशन, कदम-कदम पर आती टेढ़ी-मेढ़ी मुसीबतों के बीच बेवकूफाना हरकतों से उपजती कॉमेडी। इस जॉनर की फिल्में पसंद करने वाले इससे ज़्यादा चाहते भी नहीं हैं। इस फिल्म (Dhamaal 4) में भी यही सब है और इतना तो है कि एक आम दर्शक इन्हें मन भर एन्जॉय कर सके। क्या हुआ जो इसमें दोहराव है, थोड़ा-सा भटकाव है, हंसी-ठट्ठे का बहाव तो है न। इतना काफी है अच्छे टाइमपास के लिए।
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Release Date-10 July, 2026 in theaters
(दीपक दुआ राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त फिल्म समीक्षक हैं। 1993 से फिल्म–पत्रकारिता में सक्रिय। ‘सिनेयात्रा डॉट कॉम’ (www.cineyatra.com) के साथ–साथ विभिन्न समाचार पत्रों, पत्रिकाओं, वेब–पोर्टल, रेडियो, टी.वी. आदि पर सक्रिय दीपक ‘फिल्म क्रिटिक्स गिल्ड’ के सदस्य भी हैं।)

