-दीपक दुआ… (This review is featured in IMDb Critics Reviews)
पहले तो हम-आप इस बात पर हैरान हो सकते हैं कि इस फिल्म के नाम में ‘छत्रपति’ शब्द क्यों नहीं है। शिवाजी महाराज के बारे में हमें (महाराष्ट्र से बाहर वालों को) जितना और जैसा पढ़ाया गया है, उसके मुताबिक वह हमारे लिए ‘छत्रपति शिवाजी’ हैं जिन्होंने कम उम्र में ही तलवार उठा ली और ‘हिन्दवी स्वराज्य’ की स्थापना करते हुए इतने किले जीते कि उन्हें ‘छत्रपति’ की पदवी दी गई। शिवाजी की शौर्य गाथाएं भले ही हमने अधिक न पढ़ी हों, हम भारतीयों के लिए वह हमारे इतिहास के गौरवशाली नायक थे और हमेशा रहेंगे। फिर उन्हीं शिवाजी राजे की कहानी का नाम यूं सूखा-सा ‘राजा शिवाजी’ (Raja Shivaji) क्यों…?
दरअसल 1630 में जन्मे और 1680 में स्वर्ग सिधारे शिवाजी महाराज के पिता शाहजी राजे भोंसले एक मराठा जागीरदार थे जो कभी मुगलों, कभी निज़ामों तो कभी आदिलशाह के वफादार रहे। इस फिल्म में बालक शिवा पूछता भी है कि हम अपने झंडे के नीचे क्यों नहीं लड़ते? जवाब मिलता है-उसके लिए स्वराज्य चाहिए। 15-16 की उम्र से ही उस ‘स्वराज्य’ को पाने के लिए निकल पड़े शिवाजी ने बहुत सारे युद्ध लड़े, उनमें से कुछ युद्ध उन्होंने जीते तो कुछ हारे भी। अपने बाहुबल और कूटनीति से शिवाजी ने राजाओं को संगठित किया और आखिर 1674 में उनका राज्याभिषेक हुआ। इस फिल्म के शुरू में ही बता दिया जाता है कि यह उनके छत्रपति बनने से पहले की कथा दिखाती है। फिल्म को लेकर कुछ कोर्ट-कचहरी भी हुई थी जिसके बाद ‘छत्रपति’ शब्द हटाया गया और फिल्म (Raja Shivaji) से पहले इसके ‘काल्पनिक’ होने का एक लंबा डिस्क्लेमर भी दिया गया। लेकिन क्या यह शिवाजी के छत्रपति बनने तक की कथा को भी गहराई से दिखा पाई…?
शिवाजी महाराज का जीवन भले ही 50 बरस का रहा हो लेकिन उस अवधि में इतनी सारी घटनाएं, युद्ध, उतार-चढ़ाव हैं कि उन्हें तीन घंटे की किसी फिल्म में समेट पाना नामुमकिन है। इसलिए बनाने वालों ने उनके जीवन के चंद अध्यायों को उठा कर इस फिल्म में परोसा है। ऐसा करते समय उन्होंने यह सोच लिया कि देखने वाले को शिवाजी के बारे में सब मालूम है और जो हम दिखा रहे हैं, वे उन्हें आसानी से समझ भी जाएंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ है। जिन्होंने शिवाजी के बारे में गहराई से नहीं पढ़ा है उनके लिए तो यह फिल्म काफी समय तक अबूझ बनी ही रहती है, जिन्होंने पढ़ा है वे भी काफी बातें न होने की शिकायत करेंगे। पर्दे पर जो दिखाया गया है उसमें रोचकता व स्पष्टता का भाव कम होने से मामला उलझ कर रह गया है। इस फिल्म (Raja Shivaji) को अन्य कई लोगों के साथ मिल कर रितेश देशमुख ने भी लिखा है। सो, पहला दोष लेखक मंडली को दिया जाना चाहिए कि ये लोग शिवाजी राजे की कथा को पटकथा में बदलते समय बहुत गहराई क्यों नहीं दे पाए। इसे देखते हुए ‘तान्हा जी’ (Tanhaji) और ‘छावा’ (Chhaava) की याद भी आती है। लेकिन क्या यह फिल्म उन फिल्मों के करीब पहुंच सकी…?
इस फिल्म (Raja Shivaji) के लेखन में कई कमियां हैं। एक बड़ी कमी यह है कि यह माता जीजा बाई के किरदार को विस्तार नहीं दे पाती है। शिवाजी को लेकर इतिहासकारों में अनेक मतभेद रहे। लेकिन उनकी माता जीजा बाई को सब ने एक मत से वीरांगना बताया है जो स्वयं युद्ध कौशल में पारंगत थीं और उन्हीं के दिए संस्कारों ने शिवा को छत्रपति शिवाजी राजे भोंसले बनाया। मगर यह फिल्म जीजा बाई का किरदार उस तरह से नहीं दिखा पाती है। शिवाजी का पहला विवाह सई बाई से 1640 में हुआ जो 1659 तक जीवित रहीं। इस बीच उनके अन्य विवाह भी हुए। यह फिल्म उनका ज़िक्र तक नहीं करती है। फिल्म भले ही उनके छत्रपति बनने तक की कथा कहने की बात करती हो लेकिन यह 1659 में आदिलशाही सरदार अफज़ल खान के मरने के साथ ही खत्म हो जाती है। यहां से लेकर 1674 तक की कहानी भी बाकी रह गई है। शिवाजी जिस छापामार गोरिल्ला युद्ध के लिए चर्चित हुए उसकी तो हवा तक नहीं है फिल्म में। और भी ढेरों बातें हैं, छोड़िए उन्हें और जो दिखाया गया है उस पर आएं। फिल्म का स्क्रीनप्ले कहीं अचानक से ऊंचा होकर अगले पल बेहद कमज़ोर और सुस्त हो जाता है। कई सीन इतने लंबे, खिंचे हुए लगते हैं कि बोर करने लगते हैं। बहुत सारे संवादों, दृश्यों की ज़रूरत महसूस नहीं होती। बार-बार लगता है कि फिल्म को और कस कर लिखा, संपादित किया जाता तो यह ढाई घंटे में दर्शकों को बांध सकती थी। जो नहीं दिखाया गया उसके लिए सीक्वेल की ज़रूरत तो महसूस हो ही रही है। एक ख्याल यह भी आता है कि इसे और अधिक विस्तार देकर एक लंबी वेब-सीरिज़ में तब्दील किया जाता तो बेहतर हो सकता था। फिल्म के संवाद कुछ एक जगह ही जमते हैं। इतिहास के कुछ कम सुने अध्याय सामने आते हैं तो हूक-सी उठती है लेकिन अधिकांश जगहों पर लेखन का स्तर औसत किस्म का रहा है। कई जगह उच्चारण की कमियां भी हैं। ‘शिवा’ अचानक से ‘सिवा’ हो रहा है।
2022 में एक मराठी फिल्म निर्देशित कर चुके रितेश देशमुख की हिन्दी में बतौर निर्देशक यह पहली फिल्म है। इस किस्म के विशाल विषय पर बनने वाली फिल्म का कैनवास भव्य होना ही चाहिए। इसके लिए रितेश ने वी.एफ.एक्स. का सहारा लिया है। लेकिन यह वी.एफ.एक्स. बहुत नकली लगा है और जो सैट तैयार किए गए हैं वे काफी बनावटी। कई दृश्य तो किसी बी-ग्रेड की कम बजट वाली फिल्म सरीखे खोखले लगे हैं। जियो वाले अंबानी का पैसा क्या स्टार्स की फीस में ही बंट गया? रितेश के बनाए कई सीन कच्चे-कच्चे रहे हैं। निर्देशन में पैनेपन की कमी बार-बार खलती है। दरअसल इस किस्म के विशालाकार विषयों को सधे हुए हाथों में ही सौंपा जाना चाहिए। पहले भी कई उम्दा ऐतिहासिक विषयों वाली फिल्में नौसिखिए निर्देशकों की अतिमहत्वाकांक्षा का शिकार होकर खराब हुए हैं। फिल्म (Raja Shivaji) को ‘धुरंधर’ (Dhurandhar) की तरह चैप्टर्स में बांटा गया है लेकिन जब उन चैप्टर्स के नाम The Nemesis, King’s Gambit, Apocalypse आदि रखे जाएं तो भला किसे समझ आएंगे…?
पर्दे पर शिवाजी बने रितेश ने अपने काम में कमी नहीं आने दी है। सई बाई बनीं जेनेलिया देशमुख बहुत प्यारी लगीं। जीजा बाई के किरदार में भाग्यश्री, शाहजी बने सचिन खेडेकर, शिवाजी के बड़े भाई बने अभिषेक बच्चन, आदिल शाह बने अमोल गुप्ते, उनकी बेगम बनीं विद्या बालन, बाल शिवाजी बने रितेश के पुत्र राहिल देशमुख, सभी ने बढ़िया काम किया। फरदीन खान, संजय दत्त, महेश मांजरेकर, बोमन ईरानी, अशोक समर्थ आदि अन्य सभी कलाकार भी खूब जंचे। कलाकारों से काम निकलवाने के मोर्चे पर रितेश विजयी रहे हैं। हां, किरदारों में गहराई और विस्तार की कमी महसूस होती है। लगता है कि हर किसी को एक-एक धाकड़ सीन मिला होता तो मज़ा आ जाता।
सभी किरदारों की लुक शानदार है। फिल्म (Raja Shivaji) के एक्शन दृश्यों का कच्चापन बार-बार दिखता है। अजय-अतुल का संगीत अच्छा होते हुए भी यादगार गीत नहीं दे पाया है। बैकग्राउंड म्यूज़िक दृश्यों पर हावी रहा है। बार-बार ‘हम्म्ममम…’ और ‘राजेएएएए…’ की तान के साथ आए दृश्य भव्य लगते तो हैं, असल में बन नहीं पाए हैं। कैमरावर्क कहीं बेहतर रहा, कहीं औसत।
एक इतिहास पुरुष की महागाथा को पर्दे पर जिस स्तर की भव्यता, कसावट, गहराई और सधापन चाहिए होता है, यह फिल्म (Raja Shivaji) वैसी नहीं बन पाई है। इसकी लंबाई बार-बार इसकी रोचकता के आड़े आई है। इसे देखते हुए बाजुओं में फड़कन नहीं होती, दिल की धड़कनें नहीं बढ़तीं, आंखों में नमी नहीं आती। शिवाजी राजे की कहानी सामने हो और उसे देख कर यह सब न हो तो दिल में कसक रह ही जाती है।
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Release Date-01 May, 2026 in theaters
(दीपक दुआ राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त फिल्म समीक्षक हैं। 1993 से फिल्म-पत्रकारिता में सक्रिय। ‘सिनेयात्रा डॉट कॉम’ (www.cineyatra.com) के साथ-साथ विभिन्न समाचार पत्रों, पत्रिकाओं, वेब-पोर्टल, रेडियो, टी.वी. आदि पर सक्रिय दीपक ‘फिल्म क्रिटिक्स गिल्ड’ के सदस्य भी हैं।)
