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रिव्यू-‘एक दिन’ का सदमा

Deepak Dua by Deepak Dua
2026/05/01
in CineYatra, फिल्म/वेब रिव्यू
1
रिव्यू-‘एक दिन’ का सदमा
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-दीपक दुआ… (This review is featured in IMDb Critics Reviews)

ऑफिस के सब लोग घूमने के लिए जापान गए हैं। साथ काम करने वाली मीरा को चुप-चुप के देखने वाला दब्बू दिनेश वहां विश मांगता है कि मीरा उसकी हो जाए, एक दिन के लिए सही। और ऐसा हो भी जाता है। एक हादसे में मीरा को टी.जी.ए. हो जाता है, यानी उसकी याददाश्त चली जाती है, सिर्फ एक दिन के लिए। यह एक दिन मीरा और दिनेश एक साथ बिताते हैं। अगले दिन मीरा की मैमोरी वापस आ जाती है लेकिन वह दिनेश के साथ बिताए इस एक दिन को भूल जाती है। जाहिर है कि दिनेश को सदमा तो लगेगा ही, मगर फिर एक ट्विस्ट आता है…!

1983 में आई कमल हासन-श्रीदेवी वाली फिल्म ‘सदमा’ में याद्दाश्त खो चुकी श्रीदेवी की महीनों तक देखभाल करने वाले कमल को तब गहरा सदमा लगता है जब याद्दाश्त वापस आने के बाद श्रीदेवी उसे पहचानने से इंकार कर देती है। कुछ वही बात इस फिल्म (Ek Din) में भी है, लेकिन कुछ अलग अंदाज में, एक अलग ट्विस्ट के साथ। वह ट्विस्ट ही इस फिल्म में नया है वरना दो घंटे की इस फिल्म का पूरा निचोड़ तो इसके दो मिनट के ट्रेलर में दिख ही चुका है।

2016 में आई थाईलैंड की फिल्म ‘वन डे’ के इस रीमेक (Ek Din) में टी.जी.ए. (कुछ समय के लिए याद्दाश्त गुम होने वाली बीमारी) और अंत में आने वाले हल्के-से ट्विस्ट को छोड़ दिया जाए तो ऐसा कुछ नहीं है कि कोई इसके लिए बावला हो। आमतौर पर लव-स्टोरियों में जिस तरह की कसक, तड़प, विरह, वेदना, गहराई, ऊंचाई टाइप चीजें होती हैं, वैसी इस फिल्म में बिल्कुल नहीं हैं। यही कारण है कि इस फिल्म की ऊपर-नीचे जाती दिखती कहानी असल में सपाट है जिसमें से न तो कोई रस टपकता दिखता है न कोई खुशबू उड़ती आती है। इसका यह ‘रूखापन’ तब और ज़्यादा महसूस होता है जब पर्दे पर रोमांस चल रहा हो और आप लक्कड़ बने बैठे रहें, जब किरदार रुआंसे हो रहे हों और आप उबासियां लेने लगें, जब कोई हंसने-हंसाने वाली बात हो और आप सू-सू करने चल दें।

दो घंटे की फिल्म (Ek Din) में से 23-24 मिनट के गाने निकालने के बाद जो बचता है, वह भी अगर दिल तक न पहुंच पा रहा हो तो पहली कमी स्नेहा देसाई और स्पंदन देसाई की उस लिखाई में ही है जो कस कर बांधे रखने वाले सीन न रच सकी। दो-एक संवादों को छोड़ कर कहीं कुछ छू ही न सका। मीरा अपने ऑफिस की ड्रीम गर्ल क्यों है, बॉस झूठा क्यों है, दिनेश दब्बू क्यों है, बाकी सब सुप्त अवस्था में क्यों हैं, कुछ तो बताओ देसाइयों!

सुनील पांडेय के डायरेक्शन में भी कुछ नया या अनोखापन नहीं दिखा। यह तो जापान की लोकेशंस लुभाती रहीं वरना उन्होंने जिस किस्म का ठंडा काम किया है, उसे देख कर प्यार की आंच खुद ही बुझ जाए। दरअसल बनाने वालों ने रीमेक में फिल्म का शरीर तो बदल दिया लेकिन आत्मा को ये लोग छू न सके। यही कारण है कि कहीं-कहीं, हौले-से प्यारी लगती यह फिल्म (Ek Din) एक गहरी, रसदार कृति बनने से चूक गई।

फिल्म (Ek Din) के ट्रेलर में इच्छा पूरी करने वाला घंटा दिखाया गया है। लेकिन फिल्म में दिनेश उस घंटे को बजाए बिना ही विश मांगता है और वह पूरी भी हो जाती है। अब बताइए, घंटे पर विश्वास करें? ऐसी कुछ एक और भी चूकें हैं इसमें। हां, काॅरपोरेट कल्चर की कमियों की झलक भी दिखा जाती है यह फिल्म, भले ही उन पर बात न करती हो। यही इस फिल्म की सबसे बड़ी कमी है कि यह जिन चीज़ों को दिखाती है उन पर बतियाती नहीं है और जो बातें ये करती है, इसके सीन उन्हें सप्पोर्ट नहीं करते हैं।

आमिर खान क्यों अपने बेटे जुनैद खान को ठोक-पीट कर हीरो बनाने पर तुले हुए हैं? एक तो जुनैद की कद-काठी, चेहरा ही पर्दे पर नहीं जंचता, ऊपर से उनका काम देख कर लगता है कि उन्हें यह दब्बू किरदार नहीं दिया गया बल्कि उनके लिए खासतौर पर यह दब्बू, शर्मीला किरदार लिखा गया है। सई पल्लवी को हिन्दी वालों ने साऊथ से डब होकर आईं फिल्मों में देखा, पसंद किया है। उनका काम, स्क्रीन प्रेज़ेंस यहां भी अच्छा है लेकिन इस तरह के हल्के किरदार से हिन्दी में अपनी शुरुआत उन्होंने क्यों की होगी? जवाब यही हो सकता है कि-आमिर खान प्रोडक्शन और वहां से मिला पैसा। खैर, हमें क्या। कुणाल कपूर थके हुए लगे और बाकी सब पके हुए।

इस फिल्म (Ek Din) में नायक-नायिका का एक साथ बिताया हुए दिन बेहद ‘सूखा-सा’ है। सच तो यह है कि यह पूरी फिल्म ही ऐसी है-बहुत हल्की, बहुत सूखी। और हां, ‘सदमा’ तो यह कत्तई नहीं है, हो भी नहीं सकती।

(रेटिंग की ज़रूरत ही क्या है? रिव्यू पढ़िए और फैसला कीजिए कि यह कितनी अच्छी या खराब है। और हां, इस पोस्ट के नीचे कमेंट कर के इस रिव्यू पर अपने विचार ज़रूर बताएं।)

Release Date-01 May, 2026 in theaters

(दीपक दुआ राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त फिल्म समीक्षक हैं। 1993 से फिल्म-पत्रकारिता में सक्रिय। ‘सिनेयात्रा डॉट कॉम’ (www.cineyatra.com) के साथ-साथ विभिन्न समाचार पत्रों, पत्रिकाओं, वेब-पोर्टल, रेडियो, टी.वी. आदि पर सक्रिय दीपक ‘फिल्म क्रिटिक्स गिल्ड’ के सदस्य भी हैं।)

Tags: aamir khanek dinek din reviewJunaid Khankavin davekunal kapoorsai pallavisneha desaispandan desaisunil pandey
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Comments 1

  1. Nand Kishor says:
    2 weeks ago

    सदमा गंभीर हो ना हो प्रेम रुखा सूखा स्क्रीन स्टार रेटिंग में 1 स्टार से ज्यादा कैसे जाएगा। साथ ही दीपक जी इस फिल्म की आपकी रिव्यू बताती है कि फिल्म निर्देशन और अभिनय औसत ही है।
    तब ✨ रेटिंग का सवाल 1 से आगे नहीं बढ़ सकता।

    Reply

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