-दीपक दुआ… (This review is featured in IMDb Critics Reviews)
मंगल पुर रेलवे स्टेशन पर ट्रेन के इंतज़ार में बैठे चार युवकों को एक बाबा कहानी सुना रहा है कि कुछ साल पहले यहां शादियां नहीं हुआ करती थीं क्योंकि वधूसुर नामक राक्षस वधुओं को उठा लेता था। फ्लैश बैक में कहानी दिखने लगती है जिसमें लंदन में रहने वाला (अक्षय कुमार) अपने दादा की वसीयत से मिले महल में मंगलपुर आया है ताकि अपनी बहन की शादी यहां कर सके। इसके लिए वेडिंग प्लानर (परेश रावल), उसके सहयोगी, महल का मैनेजर (असरानी), नौकर-चाकर भी यहां हैं। एक राक्षस भी है, उससे भिड़ने के लिए गुरु जी और उनका चेला है। हीरो की बहन आती है, उसके ससुराल वाले, ज्योतिषी, और भी कई सारे लोग। एक हीरोइन भी बीच-बीच में आती-जाती रहती है। ज़ाहिर है कि इस भीड़भाड़ में कॉमेडी, डर, रोमांच, रोमांस जैसे रस निकलते-बहते रहते हैं।
प्रियदर्शन की पुरानी फिल्मों का एक तय ढर्रा रहा है जिनमें ढेरों किरदार, उनकी उलटी-पुलटी हरकतें, भगदड मची रहती है और अंत में सब सही हो जाता है। इस फिल्म ‘भूत बंगला’ (Bhooth Bangla) में भी ऐसा ही हुआ है। लेकिन क्या इससे यह फिल्म प्रियदर्शन की उन फिल्मों जैसी सधी हुई बन पाई…? जवाब है-नहीं, नहीं, बिल्कुल नहीं।
‘हेरा फेरी’, ‘हंगामा’, ‘भागमभाग’, ‘मालामाल वीकली’, ‘चुप चुप के’, ‘भूल भुलैया’ जैसी फिल्मों से प्रियदर्शन ने तेज़ रफ्तार दृश्यों, हाज़िरजवाब संवादों और किरदारों की ऊल-जलूल शारीरिक भंगिमाओं वाली जो फिज़िकल कॉमेडी दर्शकों को परोसी, उसे दर्शकों ने खूब एन्जॉय किया। यह फिल्म ‘भूत बंगला’ (Bhooth Bangla) भी यही काम करती है। लेकिन प्रियन सर यह भूल गए कि उन फिल्मों की कहानी, कंटैंट दमदार था जबकि यहां पर कहानी बासी और कंटैट खोखला है। इसीलिए यह फिल्म टुकड़ों-टुकड़ों में अच्छी लगती है। या यह कहना सही होगा कि इस फिल्म के कुछ टुकड़े हैं जो हंसा पाते हैं, डरा पाते हैं, दहला पाते हैं। बेहतर होगा कि इसके उन रोचक टुकड़ों की रीलें बना कर सोशल मीडिया, यू-ट्यूब पर डाल दी जाएं ताकि दर्शक पूरी फिल्म झेलने से बच सकें और निर्माता अक्षय कुमार और एकता कपूर मुनाफा बटोर पाएं।
‘भूत बंगला’ (Bhooth Bangla) अपनी शुरुआत के कुछ ही मिनटों में बता देती है कि यह निर्देशक प्रियदर्शन की नहीं बल्कि निर्माता अक्षय कुमार की फिल्म है जिसे हीरो अक्षय कुमार को जबरन हर फ्रेम में रखने के लिए बनाया गया है। कहानी की उलझन का अंदाज़ा इस बात से लगा सकते हैं कि पहले से फ्लैश बैक में चल रही कहानी में और तीन-चार फ्लैश बैक आते हैं। महल का मैनेजर (असरानी) जब वधूसुर और वृक्षिणी वाली कहानी सुनाता है तो सुनाता ही चला जाता है। आप चाहें तो इस दौरान एक झपकी ले सकते हैं या बाहर जाकर सू-सू, समोसा टाइप कुछ कर सकते हैं। करीब तीन घंटे लंबी यह फिल्म इंटरवल के बाद फैल कर फव्वारा हो जाती है। लंबे-लंबे बेमतलब के सीन, फालतू के संवाद और अतीत की कहानियों व पात्रों का ऐसा उलझाव कि आप चाहें तो मोबाइल पर दो-चार ज़रूरी काम निबटा सकते हैं।
वैसे कहानी के नाम पर इस फिल्म (Bhooth Bangla) में है क्या? यूं समझिए कि ‘स्त्री’ का ‘जानी दुश्मन’ ‘सामरी’ वधुओं को उठा कर ‘वीराना में बनी ‘पुरानी हवेली’ के ‘भूल भुलैया’ में ले जाता है जिसका ‘बंद दरवाजा’ ‘बीस साल बाद’ खुला है तो कई सारे ‘राज़’ उगल रहा है। यानी कहीं की ईंट और कहीं के रोड़े से प्रियदर्शन साहब ने एक इमारत खड़ी कर दी है। और इमारत भी कैसी, जिसे देख कर लगता है कि प्रियन सर बीस साल पीछे चल रहे हैं। पुराने ढर्रे के सीन, थके हुए पंचेस, अतार्किक स्क्रिप्ट। लिखने वालों ने जो लिखा है उसे देख कर साफ लगता है कि उन बेचारों पर कितना दबाव रहा होगा। संवाद सिरे से पैदल हैं। प्रियदर्शन की फिल्म में जब टॉयलेट ह्यूमर घुसा चला आ रहा हो तो समझिए कि कॉमेडी का स्तर कैसा होगा। बातचीत ऐसी कि एक ही वाक्य में तू, तुम और आप का इस्तेमाल हो रहा है। दादा की उम्र के असरानी और पिता की उम्र के परेश रावल के साथ अक्षय कुमार की तू-तड़ाक वाली बदतमीज़ी से भरी भाषा आखिर कैसा हास्य उपजा रही है? और हां, ज्योतिषी को दक्षिणा दी जाती है, फीस दी जाती है, ‘बख्शीश’ नहीं, मां के लेखकों।
किरदारों की भीड़ में कोई भी तो ढंग से खड़ा नहीं हो पाया। परेश रावल शेव-वेव कर लेते तो ज़्यादा जंचते। असरानी साहब जाते-जाते बढ़िया काम कर गए। राजपाल यादव अचानक इतने बूढ़े क्यों लगने लगे हैं? बूढ़े तो अक्षय कुमार भी कई सीन में लगे हैं, यह उन्हें स्वीकार कर लेना चाहिए। वामिका गब्बी के रोल को क्या अगले पार्ट में विस्तार देंगे? मिथिला पालकर अच्छी लगीं। मनोज जोशी, राजेश शर्मा, तब्बू, ज़ाकिर हुसैन आदि को कुछ खास करने को ही नहीं मिला। और यह जिशु सेनगुप्ता किस एंगल से अक्षय के पापा लगते हैं? मेकअप तो ठीक से करवा लेते इनका। काले बालों पर चंद सफेद लटें तो चालीस-पचास साल पहले हुआ करती थीं। प्रियदर्शन जी, बेहतर होगा कि आप अपनी मलयालम फिल्मों के रीमेक ही लाया करें, हिन्दी में कुछ ‘ओरिजनल’ करना आपको ‘अप्रियदर्शन’ साबित कर सकता है।
और हां, फिल्म (Bhooth Bangla) खत्म होने के बाद अगर कोई आपसे यह पूछे कि फिल्म में कितनी इंसानी शक्लें थीं और कितनी भूतिया, तो यह मत सोचिएगा कि फिल्म बनाने वालों ने आपको बना दिया है चू… रण। राइमिंग नहीं मिली न? छोड़िए राइमिंग को, अपनी टाइमिंग बचाइए।
(रेटिंग की ज़रूरत ही क्या है? रिव्यू पढ़िए और फैसला कीजिए कि यह कितनी अच्छी या खराब है। और हां, इस पोस्ट के नीचे कमेंट कर के इस रिव्यू पर अपने विचार ज़रूर बताएं।)
Release Date-17 April, 2026 in theaters
(दीपक दुआ राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त फिल्म समीक्षक हैं। 1993 से फिल्म–पत्रकारिता में सक्रिय। ‘सिनेयात्रा डॉट कॉम’ (www.cineyatra.com) के साथ–साथ विभिन्न समाचार पत्रों, पत्रिकाओं, वेब–पोर्टल, रेडियो, टी.वी. आदि पर सक्रिय दीपक ‘फिल्म क्रिटिक्स गिल्ड’ के सदस्य भी हैं।)
