-दीपक दुआ… (This review is featured in IMDb Critics Reviews)
एक ऐसा शहर या कस्बा जहां किसी गुंडे या बाहुबली का आतंक है। तमाम लोग उससे डरते हैं-इतना कि वह जो चाहे कर ले, कोई उसके खिलाफ आवाज तो क्या, आंख तक उठाने की भी हिम्मत नहीं करता। एक दिन वहां आता है एक जांबाज़, निडर पुलिस अफसर जो उस बाहुबली का खात्मा कर देता है। इस दौरान उस पुलिस अफसर को भी कई दिक्कतें झेलनी पड़ती हैं लेकिन अंत में जीत उसी की होती है।
कहिए, आ गई न बेशुमार हिन्दी फिल्मों की याद? ज़्यादा पीछे न जाएं तो भी ‘सिंहम’, ‘वांटेड’, ‘दबंग’, ‘गंगाजल’, ‘शूल’ जैसी कई फिल्मों में हम ऐसी कहानियां देख चुके हैं। सवाल उठ सकता है कि फिर इस फिल्म में नया क्या है? जवाब है-कुछ नहीं। सिवाय इसके कि इसमें डबल रोल का एक ऐसा एंगल है जो थोड़ा चौंकाता है और जिसके बारे में विस्तार से बताया तो आप पाठकों का मज़ा किरकिरा हो सकता है। एक सवाल और उठ सकता है कि यह फिल्म देखी ही क्यों जाए? जवाब है-इस फिल्म में वे तमाम मसाले हैं जिनकी चाह में कोई दर्शक थिएटरों की चौखट तक जाता है। इसमें एक्शन है, इमोशन है, रोमांस है, आइटम डांस है, बढ़िया गाने हैं, कॉमेडी है, स्टाइल है और यह सब कुछ बहुत ही सधे हुए अंदाज़ में है। अब और भी कुछ चाहिए क्या?
अगर आलोचना करने बैठें तो ऐसा बहुत है इस फिल्म में जिसे हल्का बताया जा सकता है। मसलन इसकी कहानी न तो नई है और न ही दमदार। इसकी स्क्रिप्ट साधारण है। कई सारे कलाकार ऐसे हैं जिनके किरदारों को न तो विस्तार दिया गया और न ही गहराई। फिल्म में रोमांस की उष्मा भी कुछ खास नहीं है। फिल्म में अतार्किक बातें भी बहुत हैं जो गले से नहीं उतर पाती हैं। फिल्म का क्लाईमैक्स भी उतना दमदार नहीं है, जितना इस तरह की फिल्मों में होता है। लेकिन इन सबके बावजूद इस फिल्म में मनोरंजन है-चटपटा, मसालेदार, तीखा मनोरंजन जो आपको आनंद देता है। साथ ही फिल्म की रफ्तार तेज़ है जो न तो आपको बोर होने देती है और न ही आपका ध्यान भटकने देती है। एक निर्देशक के तौर पर प्रभुदेवा की पिछली फिल्म ‘वांटेड’ से कमज़ोर होने के बावजूद वह इस औसत कथा को भी ऐसे स्टाइल और स्पीड के साथ परोसते हैं जो दर्शकों का भरपूर मनोरंजन करती है। और जब सामने मनोरंजन बरस रहा हो तो बाकी चीज़ों पर भला किसी का ध्यान जाए भी तो क्यों?
इस फिल्म से अक्षय कुमार की ‘खिलाड़ी’ वाली एक्शन-कॉमेडी इमेज की वापसी हुई है। उनकी अदाओं में असर है और एक्शन में दम। फिल्म के एक्शन-सीक्वेंस सचमुच बहुत जानदार है और बड़ी बात यह है कि इसे आप बच्चों के साथ भी देख सकते हैं। शुरुआती हिस्से में कॉमेडी की भी अच्छी खुराक परोसी गई है। सोनाक्षी सिन्हा न सिर्फ खूबसूरत और आकर्षक लगी हैं बल्कि उनका काम बताता है कि वह यहां लंबे समय तक टिकने वाली हैं। उनकी संुदरता में एक ‘देसी’ किस्म की अपील है जो लुभाती है। अक्षय के साथी टू जी के रोल में परेश गणात्रा जंचे हैं। यशपाल शर्मा को कोई खास रोल ही नहीं मिला। बापजी बने नासर खूब जंचे। राज अर्जुन का काम भी सराहनीय रहा। गाने चटकीले, चमकदार रहे जो सुनने से अधिक ‘देखने’ में मज़ा देंगे।
यह फिल्म हालांकि अपने मूड से बार-बार यह चुगली खाती है कि यह एक दक्षिण भारतीय फिल्म का रीमेक है लेकिन इसका चटपटा, मसालेदार स्वाद कुछ और सोचने का मौका नहीं देता। एन्जॉय कीजिए इसे!
अपनी रेटिंग-साढ़े तीन (3.5) स्टार
Release Date-01 June, 2012
(नोट-इस फिल्म की रिलीज़ के समय मेरा यह रिव्यू किसी अन्य पोर्टल पर प्रकाशित हुआ था।)
(दीपक दुआ राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त फिल्म समीक्षक हैं। 1993 से फिल्म–पत्रकारिता में सक्रिय। ‘सिनेयात्रा डॉट कॉम’ (www.cineyatra.com) के साथ–साथ विभिन्न समाचार पत्रों, पत्रिकाओं, वेब–पोर्टल, रेडियो, टी.वी. आदि पर सक्रिय दीपक ‘फिल्म क्रिटिक्स गिल्ड’ के सदस्य भी हैं।)

