-दीपक दुआ…
लड़के ने लड़की को सरे-स्टेज शादी के लिए प्रपोज़ किया। लड़की भीड़ में तो कुछ कह नहीं पाई लेकिन दो मिनट बाद कमरे में उसने साफ इंकार कर दिया, अंगूठी उतार फेंकी। लड़का बोला-मैं मर जाऊंगा। लड़की बोली-मेरी बला से। लड़का झूल गया। सब लोग लड़की के पीछे पड़ गए-दोस्त, पड़ोसी, मीडिया, समाज और कानून भी, कि उसी ने लड़के को आत्महत्या के लिए उकसाया था। अब बताइए, कौन सही है कौन गलत…?
(रिव्यू-यह ‘पिंक’ गुलाबी नहीं है)
बरसों पहले ‘पिंक’ (Pink) के रिव्यू में मैंने लिखा था, ‘छोटे कपड़े पहनने वाली लड़कियां। दोस्तों के साथ शराब पीने और नॉन-वैज चुटकुले सुनने-सुनाने वाली लड़कियां। रात को पार्टियों में जाने वाली लड़कियां। पर क्या ये होती हैं ‘खराब’ लड़कियां? आसानी से बिस्तर पर जाने को तैयार लड़कियां? क्या हक नहीं होता इन्हें ‘न’ कहने का? और अगर ये राजी न हों तो क्या हक मिल जाता है लड़कों को, समाज को इन्हें दबाने का, कुचलने का, मार देने का?’
असल में हमारे यहां लड़कियों की रज़ामंदी और इंकार को अक्सर दरकिनार कर दिया जाता है। उनके पहनावे से लेकर पढ़ाई, कैरियर और जीवनसाथी चुनने तक को उनका ‘अधिकार’ नहीं माना जाता। ऐसी फिल्में उनके इसी अधिकार की बात करती हैं। यह फिल्म ‘पूजा मेरी जान’ (Pooja Meri Jaan) बताती है कि पूजा ने कई ब्वॉय फ्रैंड बदले हैं, तो क्या इससे वह चरित्रहीन हो गई? अनिकेत पांच साल से उसे तरह-तरह से राज़ी करने पर तुला है। लेकिन वह उसे दोस्त मानती है और कई बार सीधे मना भी कर चुकी है। अब अगर वह नहीं मान रहा है तो इसमें पूजा की क्या गलती? फिल्म बड़ी शिद्दत से यह सवाल पूछती है कि ये लड़के लोग रिजेक्शन को स्वीकार करने की बजाय लड़की पर एसिड फेंकने, उसे चाकू मारने या खुद की नस काटने जैसी हरकतें क्यों करने लग जाते हैं? यह फिल्म उन लोगों को भी कटघरे में खड़ा करती है जो समाज में घटने वाली ऐसी घटनाओं पर बिना सारा सच जाने अपनी राय बनाने और उसे शोर मचा कर सबके सामने रखने लगते हैं।
नवजोत गुलाटी और कनिष्का सिंह देव की लिखाई बहुत अधिक कसी हुई और पैनी न होने के बावजूद अपनी बात स्पष्टता से रख पाने में कामयाब रही है। फिल्म (Pooja Meri Jaan) देखते हुए दमदार संवादों की कमी साफ महसूस होती है और लगता है कि कुछ किरदारों को और अधिक विस्तार व फैलाव मिला होता तो यह अधिक असरदार हो सकती थी। नवजोत गुलाटी का निर्देशन साधारण रहा है। ऐसी फिल्मों के सीन बनाते समय जो धार होनी चाहिए, उसकी कमी इस फिल्म को कई जगह ‘रूखा’ बनाती है। कोर्ट-रूम सीन हों और उसमें पकड़ न हों तो क्या मज़ा आएगा? नाटकीयता की कमी और फिल्म का एकरस स्वाद इसे ‘सूखा’ भी बनाता है। लंबे समय से बन रही इस फिल्म (Pooja Meri Jaan) पर बासीपन की छाया भी महसूस होती है। गीतों के शब्द अच्छे हैं, कहानी में रचे-बसे हुए। संगीत अधिक प्रभावशाली हो सकता था।
मृणाल ठाकुर का काम ठीक रहा है। पूजा के मनोभावों को उन्होंने अपने किरदार की सीमाओं के बावजूद सही से पकड़े रखा। ऐसी नायिका केंद्रित फिल्म हो तो अक्सर ऐसे लड़के लिए जाते हैं जो काम भर चला दें। यहां भी यही हुआ है। वकील बने विजय राज़ ज़रूर छाए रहे। हुमा कुरैशी ने उन्हें दम भर टक्कर दी। पुलिस अफसर बनीं सुनीता रजवार का काम जबर रहा। उनके किरदार को बीच में ही गायब करने की बजाय आगे भी इस्तेमाल किया जाना चाहिए था।
ज़ी-5 पर आई यह फिल्म (Pooja Meri Jaan) भले ही औसत कहानी पर बनी एक औसत किस्म की फिल्म हो लेकिन जो बात यह कहती है, उस बात के लिए और जिस तरह से कहती है, उसके लिए इस फिल्म को देखा जा सकता है।
(रेटिंग की ज़रूरत ही क्या है? रिव्यू पढ़िए और फैसला कीजिए कि यह कितनी अच्छी या खराब है। और हां, इस पोस्ट के नीचे कमेंट कर के इस रिव्यू पर अपने विचार ज़रूर बताएं।)
Release Date-02 October, 2026 in theaters
(दीपक दुआ राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त फिल्म समीक्षक हैं। 1993 से फिल्म–पत्रकारिता में सक्रिय। ‘सिनेयात्रा डॉट कॉम’ (www.cineyatra.com) के साथ–साथ विभिन्न समाचार पत्रों, पत्रिकाओं, वेब–पोर्टल, रेडियो, टी.वी. आदि पर सक्रिय दीपक ‘फिल्म क्रिटिक्स गिल्ड’ के सदस्य भी हैं।)
