-दीपक दुआ…
कहानियां दो तरह की होती हैं-एक वो जो सच होती हैं और दूसरी वो जिन्हें इस तरह से गढ़ा जाता है कि लोग उन्हें सच मान लेते हैं। ‘दृश्यम’ देखने वाले जानते हैं कि हम दूसरे किस्म की कहानी देख रहे हैं जिसे विजय सलगांवकर और उसके परिवार ने इस तरह से गढ़ा है कि वह सच न होते हुए भी सच लगती है, या कम से कम उसे सच मानने को हमारा मन करता है। हमें मालूम है कि समीर देशमुख 2 अक्टूबर की रात सलगांवकर के घर में उनके हाथों मारा गया लेकिन हम भी विजय और उसके परिवार की तरह यह मानना चाहते हैं कि उस दिन तो सलगांवकर फैमिली पणजी गई थी स्वामी चिन्मयानंद जी के सत्संग में, जिसके बाद उन्होंने पाव-भाजी भी खाई थी।
2015 में आई पहली वाली ‘दृश्यम’ (Drishyam) और 2022 में आई ‘दृश्यम 2’ (Drishyam-2) इसी नाम से बनीं मलयालम फिल्मों का रीमेक थीं। लेकिन इस बार वाली ‘दृश्यम-द कन्क्लूज़न’ (Drishyam-The Conclusion) की कहानी कुछ हफ्ते पहले आई मलयालम की ‘दृश्यम 3-द पास्ट नैवर स्टेज़ सायलेंट’ (Drishyam 3: The Past Never Stays Silent) से बिल्कुल अलग है। कह सकते हैं कि इस बार निर्देशक अभिषेक पाठक ने अपने साथी लेखकों आमिल कीयान खान और परवेज़ शेख के साथ मिल कर एक अलग संसार रचा है जो मलयालम वाली फिल्म से अलग होते हुए भी इस कड़ी की पिछली दोनों हिन्दी फिल्मों से जा जुड़ता है।
(रिव्यू-मनोरंजन का कसा हुआ जाल बिछाती ‘दृश्यम 2’)
‘दृश्यम’ के पहले और दूसरे भाग के बीच सात साल का फासला था और फिल्म में भी कहानी सात साल आगे गई थी। अब तीसरी वाली ‘दृश्यम’ (Drishyam-The Conclusion) आई भले ही चार साल बाद है मगर कहानी सिर्फ छह महीने ही आगे खिसकी है और जिस तरह से कहानी में किरदारों व घटनाओं का चित्रण है उससे कहीं-कहीं ऐसा भी लगता है कि आप ‘दृश्यम 2’ का ही विस्तार देख रहे हैं, कुछ ऐसा जो उसमें छूट गया था और जिसे अब समेट दिया गया है। इसे आप फिल्म की कमज़ोरी मानें या खूबी, यह आप पर है।
विजय और उसकी फैमिली से बार-बार हारने के बाद तिलमिलाई मीरा देशमुख और उसके पति ने इस बार क्राइम ब्रांच के धाकड़ एस.पी. राजवीर सिंह तोमर का सहारा लिया है। वह सबूत इक्ट्ठा करता है और नामी वकील इंद्रजीत शैट्टी कोर्ट में विजय को घेरता है। तो क्या इस बार सलगांवकर परिवार का सच सामने आ जाएगा? क्या मीरा अपना ‘बदला’ लेने में कामयाब होगी? अपने परिवार को बचाने के लिए इस बार विजय क्या चाल चलेगा?
दृश्यम का शाब्दिक अर्थ है-जो दिखाई देता है। मगर क्या हर वह चीज़ सच होती है जो दिखाई दे? ‘दृश्यम’ सीरिज़ की फिल्मों की कहानी इसी फिलॉसफी पर टिकी होती है। पिछली वाली फिल्म कई सवालों के सिरे खुले छोड़ गई थी। अच्छी बात यह है कि इस बार वाली फिल्म (Drishyam-The Conclusion) उन खुले सिरों को आपस में बांधती है और एक बार फिर से सस्पैंस और थ्रिल का एक ऐसा जाल बुनती है जिसमें आप फंसते चले जाते हैं और छटपटाते हैं। आपकी यही छटपटाहट इस कहानी को सफल बनाती है।
इस फिल्म (Drishyam-The Conclusion) के किरदारों में जोश है। भ्रष्ट इंस्पैक्टर गायतोंडे पहले से कर्रा हुआ है। क्राइम ब्रांच का एस.पी. तोमर पैना है तो वहीं वकील शैट्टी धारदार। मीरा देशमुख को अब समीर के लिए इंसाफ नहीं बल्कि बदला चाहिए। यहां तक कि उसका पति भी इस बार शांत नहीं बैठा है। विजय की चालबाज़ियां भी पहले से गहरी हुई हैं। यह अलग बात है कि इनमें से कई किरदारों के साथ पूरा न्याय नहीं हुआ है। ‘आदमी नहीं शनि हूं मैं’ कहते हुए और हर सीन में सिगरेट सुलगाते हुए आया एस.पी. तोमर संवाद और अदाएं तो भरपूर बिखेरता है लेकिन उसकी तफ्तीश बहुत गहरी नहीं हो पाई है। इसी तरह से बड़बोला वकील शैट्टी बहुत जल्दी हार मानने वाले मोड में आ जाता है। विजय के परिवार को भी बहुत कम विस्तार मिला और सौरभ शुक्ला के किरदार को भी। फिल्म खत्म होने पर आनंद तो भरपूर मिलता है मगर कहीं, कुछ छूटता हुआ-सा भी लगता है। बड़ी बात यह है कि इस बार कहानी को विराम मिला है। इस फिल्म को बनाने वाले अब इस सीरिज़ में आगे न ही बढ़ें तो बेहतर होगा।
अजय देवगन हमेशा की तरह अपने भावों, आंखों, संवादों और चुप्पी से असर छोड़ते हैं। तब्बू और रजत कपूर जंचते हैं। प्रकाश राज और कमलेश सावंत लुभाते हैं। इशिता दत्ता, श्रिया सरण, मृणाल जाधव, सौरभ शुक्ला, अजीत सिंह, रामचंद्र सिंह, नेहा जोशी समेत बाकी के सारे कलाकार भी जमे हैं। लेकिन इस फिल्म का सितारा बन कर उभरे हैं एस.पी. बने जयदीप अहलावत। पर्दे पर उनका आना रोशनी बिखेर देता है।
अभिषेक पाठक के निर्देशन में कसावट है। हालांकि दो-एक सीन खिंचते-से लगते हैं लेकिन फिल्म (Drishyam-The Conclusion) आपको पूरे समय कस कर रखती है। इंटरवल के बाद इसकी यह कसावट आपको मुठ्ठियां भींचने पर मजबूर करती है। क्लाइमैक्स आते-आते आपकी उन भिंची हुई मुठ्ठियों में पसीना आने लगता है और आपको पता भी नहीं चलता कि कब उन पसीजती हुई हथेलियों से फिसलती हुई यह फिल्म आपके दिल-दिमाग में जा बसती है। यह इस फिल्म की सफलता है। यह सिनेमा की सफलता है। इसका जश्न मनाया जाना चाहिए।
(रेटिंग की ज़रूरत ही क्या है? रिव्यू पढ़िए और फैसला कीजिए कि यह कितनी अच्छी या खराब है। और हां, इस पोस्ट के नीचे कमेंट कर के इस रिव्यू पर अपने विचार ज़रूर बताएं।)
Release Date-02 October, 2026 in theaters
(दीपक दुआ राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त फिल्म समीक्षक
हैं। 1993 से फिल्म–पत्रकारिता में सक्रिय। ‘सिनेयात्रा डॉट कॉम’ (www.cineyatra.com) के साथ–साथ विभिन्न समाचार पत्रों, पत्रिकाओं, वेब–पोर्टल, रेडियो, टी.वी. आदि पर सक्रिय दीपक ‘फिल्म क्रिटिक्स गिल्ड’ के सदस्य भी हैं।)
