-दीपक दुआ… (This review is featured in IMDb Critics Reviews)
नब्बे के दशक में जब मुंबई अंडरवर्ल्ड पर दाउद की डी कंपनी का राज था तो उसका एक विरोधी था हुसैन उस्तरा। इसी हुसैन उस्तरा ने अशरफ खान नाम की उस औरत को बढ़ावा दिया था जिसके पति को दाउद के कहने पर मारा गया। अपने पति के कत्ल का बदला लेने के लिए अशरफ बन गई थी सपना दीदी और उसने उस्तरा के साथ मिल कर दाउद को शारजाह के स्टेडियम में टपकाने का प्लान भी बना डाला था। लेकिन ऐसा हो न सका और डी कंपनी ने पहले सपना को टपकाया, फिर उस्तरा को। मुंबई अंडरवर्ल्ड को करीब से जानने वाले पत्रकार हुसैन ज़ैदी की किताब ‘माफिया क्वीन्स ऑफ मुंबई’ के सपना दीदी पर लिखे अध्याय पर आधारित विशाल भारद्वाज की यह फिल्म ‘ओ रोमियो’ (O’ Romeo) सपना और उस्तरा की कहानी को कुछ अलग नज़रिए से देखती है, कुछ अलग ढंग से दिखाती है।
उस्तरा अपने विरोधियों को उस्तरे से मारने में उस्ताद है। लड़कियां उसके बिस्तर पर आती-जाती रहती हैं। एक दिन अफ्शां उसे चार लोगों को मारने की सुपारी देने आती है तो वह बदलने लगता है। कल तक उस्तरे से लोगों को मारने वाले का दिल अब घायल हो चुका है। प्यार में रोमियो बन कर अब वह अपनी जूलियट के लिए कुछ भी करने को तैयार है, कुछ भी।
अपनी फिल्मों में अक्सर ज़िंदगी के अंधेरे पहलुओं और किरदारों के स्याह पक्षों को उभारने वाले फिल्मकार विशाल भारद्वाज की फिल्ममेकिंग पर पश्चिम के क्लासिक सिनेमा का काफी प्रभाव दिखता है। यही कारण है कि उनकी फिल्मों की पृष्ठभूमि अक्सर पथरीली होती है और उनके रचे गए किरदार खुरदुरे। यह कलाकारी विशाल ने ‘ओ रोमियो’ (O’ Romeo) में भी दिखाई है। उस्तरा और अफ्शां के बहाने से वह असल में इंसान के भीतर आए बदलाव और अपने प्यार के लिए कुछ भी कर गुज़रने की कहानी तो दिखाते हैं लेकिन कहानी कहने की उनकी शैली पिछली फिल्मों जैसी ही है। यह उनका सिग्नेचर स्टाइल है लेकिन हर स्टाइल हर बार हर किसी को भा ही जाए, यह ज़रूरी तो नहीं।
हुसैन ज़ैदी की कहानी में ढेरों बदलाव किए गए हैं जिससे ‘ओ रोमियो’ (O’ Romeo) की कहानी एक अलग ही मकाम पर जा पहुंचती है। विशाल और रोहन नरूला की लिखी स्क्रिप्ट अंडरवर्ल्ड और हिंसा के माहौल में प्यार की अनूठी कहानियां परोसती है। अफ्शां का अपने मरहूम पति के लिए प्यार जिसकी खातिर वह अंडरवर्ल्ड से भिड़ने को तैयार है, उस्तरा का अफ्शां से प्यार जिसके लिए वह जलाल भाई से भिड़ रहा है। यह प्यार ही तो सब कुछ करवा रहा है। लेकिन पर्दे पर ‘दिख’ रहा यह प्यार इधर बैठे दर्शक को ‘छू’ क्यों नहीं पा रहा है? उस्तरा अफ्शां के प्यार में घुला जा रहा है लेकिन थिएटर में बैठे दर्शक को इस प्यार की गर्माहट महसूस ही नहीं हो रही है। उस्तरा पर्दे पर रो रहा हो और यहां हॉल में बैठा दर्शक हंस रहा हो तो समझिए कि भावनाओं को उबालने में आंच ज़रा मंदी रह गई है।
‘ओ रोमियो’ (O’ Romeo) की स्क्रिप्ट बहुत जगह डावांडोल है। उस्तरा एक पुलिस वाले के इशारों की नचनिया बना हुआ है। उस्तरा के पास से गायब होकर अफ्शां जहां पहुंचती है, वह मोड़ इस कदर फिल्मी है कि लेखकों की कल्पनाशीलता पर तरस आने लगता है। और फिल्म का अंत…! डसके बारे में तो कुछ न ही कहा जाए तो बेहतर होगा। कहानी में इतने सारे ‘फिल्मी’ संयोग हैं कि लगता नहीं कि आप उन विशाल भारद्वाज की लिखाई-बुनाई से रूबरू हो रहे हैं जिन्होंने कभी ‘मकबूल’ और ‘ओमकारा’ से गहरा असर छोड़ा था। बुरी तो उनकी ‘हैदर’ भी नहीं थी भले ही उसे बनाने की उनकी नीयत ‘कुछ और’ थी। नीयत तो विशाल की ‘ओ रोमियो’ को लेकर भी कुछ साफ नहीं दिखती वरना अंडरवर्ल्ड के दो लोगों और उनकी प्रेम कहानी को यूं ग्लैमराइज़ करके दिखाने का भला क्या औचित्य हो सकता है। भई जब दाउद की बहन को बेचारी अबला दिखाने के लिए ‘हसीना पारकर’ बन सकती है तो उस्तरा और सपना दीदी को रोमियो-जूलियट क्यों नहीं दिखाया जा सकता?
(रिव्यू : ‘हसीना पारकर’-आपा, स्यापा, क्यूटियापा…)
ऐसा नहीं है कि अंडरवर्ल्ड वाले प्यार नहीं कर सकते। ‘वन्स अपॉन ए टाइम इन मुंबई’ में अंडरवर्ल्ड के एक्शन और जानदार संवादों के साथ रोमांस की खुशबू और सुरीले गानों का आनंद हमने खूब उठाया था। लेकिन ‘ओ रोमियो’ (O’ Romeo) प्यार की गर्माहट के मामले में कच्ची रह गई है। हां, इसका एक्शन ज़ोरदार है। बेहद घृणित और स्टाइलिश, ‘एनिमल’ सरीखा। लेकिन विदेशी फिल्में देखने वाले दर्शक पहचान लेंगे कि ज़्यादातर एक्शन सीक्वेंस कहां से उड़ाए गए हैं। संवाद कहीं-कहीं बेहतर हैं लेकिन इनका दोहराव चुभता है। चुभती तो इस फिल्म की लंबाई भी है। तीन घंटे लंबी यह फिल्म आपके सब्र का इम्तिहान लेती है। देना चाहते हैं आप?
(रिव्यू-कसी हुई, सधी हुई ‘वन्स अपॉन ए टाइम इन मुंबई’)
शाहिद कपूर इस तरह के ‘कमीने’ किरदारों में जंचते हैं। या यह भी कह सकते हैं कि अब फिल्मकार उन्हें ऐसे ही किरदारों में लेने लगे हैं। उनके काम में कमी है भी नहीं, किरदार में भले ही दोहराव दिखे। तृप्ति डिमरी असरदार रही हैं। दिशा पटनी को जूनियर आर्टिस्ट बना दिया गया। उनसे बेहतर तो तमन्ना भाटिया रहीं, भले ही बोर कर गईं। विक्रांत मैस्सी साधारण रहे। अविनाश तिवारी हर बार अलग-अलग रंग में आकर रंगत बिखेर जाते हैं। फरीदा जलाल की फिल्म में ज़रूरत ही नहीं थी। गलत ढंग से बोला गया उनका संवाद भी किसी ने नहीं काटा। नाना पाटेकर अतरंगी लगे हालांकि साधारण रहे। उस्तरा के दोस्त के किरदार में हुसैन दलाल और क्लासिकल गाने वाले इंस्पैक्टर के किरदार में राहुल देशपांडे खूब जंचे। गुलज़ार और विशाल भारद्वाज की जोड़ी के रचे गाने दमदार नहीं रहे।
विशाल भारद्वाज अपनी फिल्मों में इतने ज़्यादा प्रयोगधर्मी हो जाते हैं कि अक्सर उनके किए प्रयोग इधर-उधर छितराने लगते हैं। ऐसे में उनके बुद्धिजीवी प्रशंसक भले ही उनके लिए लाल कालीन बिछाएं, निष्पक्ष दर्शक उनकी इस फिल्म से ज़्यादा प्यार नहीं कर पाएंगे।
(रेटिंग की ज़रूरत ही क्या है? रिव्यू पढ़िए और फैसला कीजिए कि यह कितनी अच्छी या खराब है। और हां, इस पोस्ट के नीचे कमेंट कर के इस रिव्यू पर अपने विचार ज़रूर बताएं।)
Release Date-13 February, 2026 in theaters
(दीपक दुआ राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त फिल्म समीक्षक हैं। 1993 से फिल्म-पत्रकारिता में सक्रिय। ‘सिनेयात्रा डॉट कॉम’ (www.cineyatra.com) के साथ-साथ विभिन्न समाचार पत्रों, पत्रिकाओं, वेब-पोर्टल, रेडियो, टी.वी. आदि पर सक्रिय दीपक ‘फिल्म क्रिटिक्स गिल्ड’ के सदस्य भी हैं।)
