-दीपक दुआ…
बुलंदशहर से एक बच्ची किडनैप हुई है। मामला हाई प्रोफाइल है इसलिए आई.पी.एस. शिवानी शिवाजी रॉय को बुलाया जाता है। अपनी तफ्तीश में शिवानी पाती है कि मामला उतना सीधा नहीं है जितना ऊपर से लग रहा है। देश भर से 9-10 साल की बच्चियां गायब हो रही हैं। क्या कारण हो सकता है? उनसे भीख मंगवाई जा रही है? उनके अंग बेचे जा रहे हैं? या फिर कुछ और…? कौन करवा रहा है यह सब? आइए देखते हैं।
2014 में आई प्रदीप सरकार वाली ‘मर्दानी’ से जन्मी सिनेमाई कॉप शिवानी अपनी पैनी नज़र और साहस के लिए सराही गई थी जिसने उस फिल्म में लड़कियों की तस्करी और नशे का कारोबार करने वालों को सबक सिखाया था। बाद में उसी फिल्म के लेखक गोपी पुथरन के निर्देशन में 2019 में ‘मर्दानी 2’ में आकर शिवानी ने एक सनकी बलात्कारी और हत्यारे के विरुद्ध लड़ाई लड़ी थी। इस बार शिवानी के निशाने पर बच्चियों के किडनैपर हैं। मगर क्या इस बार बात पहली दो फिल्मों जैसी मज़बूत बन पाई है? आइए देखते हैं।
‘मर्दानी’ सीरिज़ की इन फिल्मों की कहानी का तय ढांचा है। कहीं पर कोई राक्षस लड़कियों पर अत्याचार कर रहा है और शिवानी आकर उसे सबक सिखा रही है। शिवानी यह सब कैसे करती है, किन की मदद लेती है, किसी केस को समझने-सुलझाने का उसका तरीका क्या रहता है, यह सब ‘मर्दानी’ देखने वाले दर्शक जानते हैं। तो फिर इन फिल्मों में नया क्या है? जवाब है-इनके विषय और इनके खलनायक। सब्जैक्ट जितना अनोखा और खलनायक जितना ताकतवर होता है, दर्शकों को अपने नायक (या नायिका) को भिड़ते और जीतते देख कर उतना ज़्यादा मज़ा आता है। क्या ‘मर्दानी 3’ में ऐसा हो पाया? आइए देखते हैं।
(रिव्यू-कड़वे हालात दिखाती है ‘मर्दानी 2’)
यह फिल्म ‘मर्दानी 3’ (Mardaani 3) अपने पहले ही सीन से आपको कस लेती है। शिवानी का ओपनिंग सीन गजब है। उसके ठीक बाद यह अपने मूल ट्रैक पर चल देती है और इंटरवल तक बिना रुके चलती जाती है। इस दौरान यह कामयाबी से उस किस्म का तनाव बुन पाती है जो इस तरह की फिल्मों के लिए ज़रूरी होता है। आयुष गुप्ता, दीपक किंगरानी और बलजीत सिंह मारवाह का लेखन थोड़ी-बहुत ऊंच-नीच के साथ इस दौरान फिल्म को बांधे रखता है। थोड़ी-थोड़ी देर में आते नए किरदार, नया घटनाक्रम, बदलती लोकेशंस और परिस्थितियां उत्सुकता बनाए रखते हैं। इस दौरान कैमरा, लोकेशन, बैकग्राउंड म्यूज़िक और कलाकारों के अलावा निर्देशक अभिराज मीनावाला ने भी सध कर काम किया है। लेकिन क्या यही ताकत इंटरवल के बाद भी बनी रह पाती है? आइए देखते हैं।
इस तरह की फिल्मों में कहानी के दो पहलू होते हैं। पहले में उसे फैलाया, बिखराया जाता है और दूसरे में समेटा। ‘मर्दानी 3’ (Mardaani 3) अपनी सीरिज़ की पिछली दोनों फिल्मों की तरह कहानी को फैलाने में तो कामयाब रही लेकिन इसे समेटते समय लेखक लोग (खासतौर से कहानी लेखक) हांफने लगे। यह तो भला हो स्क्रिप्ट पर हाथ साफ करने वालों का जिन्होंने फिल्म को एक स्तर से नीचे नहीं जाने दिया। दरअसल दिक्कत दो किस्म की रही। पहली यह कि जिस वजह से बच्चियों को किडनैप किया जा रहा था उससे दर्शक जुड़ नहीं पाते। वजह ऐसी होनी चाहिए थी जो दर्शकों को भावनात्मक तौर पर बांध पाती, उसे हिला-डुला-रुला पाती। दूसरी दिक्कत यह कि कहानी को समेटते समय पर्दे पर बहुत कुछ ‘फिल्मी-फिल्मी’ सा होने लगा जिसे आसानी से जज़्ब नहीं किया जा सकता। खलनायक बच्चियों को वहीं क्यों ले जा रहा है, यह काम तो यहां भी हो सकता था न…! वैसे भी बच्चियों को वहां ले जाने में कितनी लॉजिस्टिक दिक्कतें आईं होंगी न…! शिवानी की टीम भी फिल्मी स्टाइल में वहां पहुंच गई, वहां का सिस्टम हिला डाला लेकिन वहां वालों ने चूं तक नहीं की…! धत्त तेरे की…! अब फिल्म है तो ‘फिल्मीपन’ भी होगा ही लेकिन वह ‘सिंहम’ जैसी फिल्मों में चल जाता है, ‘मर्दानी’ ने तो अपनी अलग राह बनाई थी न, फिर वह क्यों लेडी सिंहम बनने चली है? वैसे भी एक आई.पी.एस. अपनी टीम के मौजूद होते हुए हर छोटे-बड़े पर खुद हाथ छोड़ने लगे तो उसे क्या कहेंगे? कुछ ‘दिल्ली क्राइम’ से सीखा जाना चाहिए था। और हां, अपनी हीरोइन से कहिए कि रोमन में लिखी गई स्क्रिप्ट के ‘सोढी’ को ‘सोधी’ तो न बोले। लेकिन इस फिल्म में सराहने को भी बहुत कुछ है। क्या? आइए देखते हैं।
‘मर्दानी 3’ (Mardaani 3) हमारे समाज की उन बुराइयों, गंदगी, अपराध को उभार कर दिखाती है जिन्हें हम जान-बूझ कर अनदेखा कर जाते हैं, ठीक वैसे ही जैसे बड़े शहरों के चौराहों पर भीख मांगते बच्चों को हम देखते हुए भी नहीं ‘देखते’। यह फिल्म पूछती है कि हमारा सिस्टम सिर्फ बड़े बाप के बच्चों पर अत्याचार होने के बाद ही क्यों जागता है? गरीब, कमपढ़ लोगों के साथ सरकार, सिस्टम, पुलिस कैसा रवैया रखती है, यह हमसे बेहतर कौन जानता है। पुलिस वालों पर भी यह फिल्म उंगली उठाने से पीछे नहीं रहती कि जब अपराधी अपनी कमाई का एक ‘कट’ पुलिस तक पहुंचाते हैं तो उस अपराध में वे पुलिस वाले भी बराबर के भागी हो जाते हैं। इन बेचैन करते सवालों के लिए इस फिल्म को देखा जाना चाहिए। बाकी कैसी रही यह फिल्म? आइए देखते हैं।
रानी मुखर्जी का अभिनय हमेशा ही तरह शानदार रहा है। नारी प्रधान विषय वाली फिल्म में नायिका को उभारने के लिए बाकी लोग जान-बूझ कर हल्के रखे जाते हैं, यहां भी ऐसा ही हुआ है। लेकिन बाकी सब ने अपने-अपने किरदार ठीक से निभाए हैं। ‘मर्दानी 3’ (Mardaani 3) की एक और कमी यह रही कि इस बार विलेन अपनी तमाम अदाओं और मेकअप के बावजूद उतना खूंखार, दमदार नहीं रहा जितना इस सीरिज़ की फिल्मों में रहता है, रहना चाहिए। अम्मा बनीं मल्लिका प्रसाद ने फिर भी जम कर काम किया है। थोड़ा और संभल कर लिखी जाती, थोड़ा और कस कर बुनी जाती तो यह फिल्म कमाल हो सकती थी। फिलहाल तो यह सिर्फ अपने चुभते विषय, इंटरवल तक की कसावट और रानी के अभिनय के लिए ही दर्शनीय बन पाई है।
(रेटिंग की ज़रूरत ही क्या है? रिव्यू पढ़िए और फैसला कीजिए कि यह कितनी अच्छी या खराब है। और हां, इस पोस्ट के नीचे कमेंट कर के इस रिव्यू पर अपने विचार ज़रूर बताएं।)
Release Date-30 January, 2026 in theaters
(दीपक दुआ राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त फिल्म समीक्षक हैं। 1993 से फिल्म-पत्रकारिता में सक्रिय। ‘सिनेयात्रा डॉट कॉम’ (www.cineyatra.com) के साथ-साथ विभिन्न समाचार पत्रों, पत्रिकाओं, वेब-पोर्टल, रेडियो, टी.वी. आदि पर सक्रिय दीपक ‘फिल्म क्रिटिक्स गिल्ड’ के सदस्य भी हैं।)
