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रिव्यू-‘मैं वापस आऊंगा’ अखियां लगाई रखना

Deepak Dua by Deepak Dua
2026/06/12
in CineYatra, फिल्म/वेब रिव्यू
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रिव्यू-‘मैं वापस आऊंगा’ अखियां लगाई रखना
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-दीपक दुआ…

साल 1947। सरगोधा, पंजाब। ईशर सिंह ग्रेवाल और अफसाना हसन की मोहब्बत परवान चढ़ ही रही थी कि देश के बंटवारे में पंजाब भी बंट गया। सरगोधा उधर रह गया और ईशर को इधर आना पड़ा। जाने से पहले ईशर उसे कह कर गया-मैं वापस आऊंगा।

साल 2024। चंडीगढ़। 95 वर्षीय ईशर सिंह ग्रेवाल अपनी याद्दाश्त खो रहे हैं। मृत्यु निकट है लेकिन वह बार-बार 1947 के सरगोधा की उन गलियों में पहुंच जाते हैं जहां उन्होंने अफसाना से कुछ वादे किए थे। ईशर सिंह कुछ अजीब-सी बातें करते हैं, अजीब-सी हरकतें। लंदन से आया उनका पोता निर्वैर उन्हें सुनता है, समझता है, उनके अर्थ तलाशता है और फिर उनकी अधूरी ख्वाहिश पूरी करने के लिए…!

इम्तियाज़ अली का सिनेमा हमें एक अलग संसार में ले जाता है। उस संसार में उनके रचे किरदारों की अपनी दुनिया होती है जो धीरे-धीरे हमें अपनी-सी लगने लगती है। शुरू में ये किरदार भी हमें कुछ अजीब, कुछ पराए-से लगते हैं लेकिन धीरे-धीरे हम इन किरदारों से और ये किरदार हमसे बातें करने लगते हैं। इम्तियाज़ की यह फिल्म ‘मैं वापस आऊंगा’ (Main Vaapas Aaunga) भी ऐसी ही है जिसमें बातें हों, घटनाएं, किरदार या माहौल, सब कुछ हौले-हौले अपना असर बढ़ाता है और फिल्म का अंत आते-आते हम इस असर में डूब-से जाते हैं।

मानव इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदी-भारत के बंटवारे पर बहुत कुछ बोला, लिखा, बनाया गया है। नयनिका महतानी और खुद इम्तियाज़ की लिखी-बुनी यह फिल्म (Main Vaapas Aaunga) बंटवारे के वक्त की एक ऐसी ही कहानी को कुछ अलग तरह से कहने, दिखाने का प्रयास करती है। इस फिल्म में मूल कहानी के समानांतर कई सारी बातें हैं जिन्हें समझा जाना चाहिए। बंटवारे के समय के वे पन्ने हैं जिनका ज़िक्र हमारे ज़ख्मों को कुरेदने लगता है। आम लोगों के उस भरोसे का दरकना है कि हुक्मरान ज़मीन पर लकीरें नहीं खिंचने देंगे और हमेशा से साथ रहती आईं कौमें एक-दूसरे को थोड़े ही मारेंगी। बेटियों को ‘बचाने’ के लिए मांओं द्वारा ही किए गए उनके कत्ल हैं। हर त्रासदी की तरह अंजाम भुगतती औरतों की वीभत्स तस्वीरें हैं। उधर से उजड़ कर आए हमारे उन पुरखों के किस्से है जिन्होंने अपनी मेहनत से यहां दोबारा आशियाने खड़े किए थे। यह फिल्म आज के वक्त की भी कुछ बातें सामने लाती है जहां लंदन में रह रहा युवक खुद से पूछ बैठता है कि आखिर वह कर क्या रहा है। जहां घर के बुजुर्ग अचानक से बेगाने लगने लगते हैं। अपने मिज़ाज से यह कहानी कहीं-कहीं अमृता प्रीतम की ‘पिंजर’ के पास भी पहुंचती है लेकिन लेखक जोड़ी इसे अलग राह पर ले जाती है और एक ऐसी मंज़िल पर पहुंचाती है जहां मोहब्बत है, इंसानियत है, रिश्ते हैं और उन रिश्तों की कद्र करने वाले लोग भी।

इम्तियाज़ अपनी फिल्मों में कहानी की परतों को धीरे-धीरे, एक-एक कर के उतारना पसंद करते हैं। साथ ही वह दर्शकों को फिल्म परोस कर नहीं देते हैं बल्कि उनसे भी उम्मीद रखते हैं कि वे फिल्म को समझने में मेहनत करे। इस फिल्म (Main Vaapas Aaunga) में भी ऐसा ही है। हालांकि कुछ एक चीज़ें खटकती हैं। कहानी के बार-बार बीते समय में जाने और वर्तमान में लौटने से कहीं-कहीं भारीपन लगता है। किरदारों को स्थापित करने और कहानी का माहौल बनाने में लगाया गया इंटरवल से पहले का हिस्सा कुछ रूखा-सा लगता है। फिल्म की लंबाई भी यहीं पर खटकती है। बुजुर्ग ईशर सिंह की बातें कुछ और सीधी व सरल होतीं तो फिल्म का प्रवाह अधिक सहज लगता। उनका बड़ा बेटा उनसे इतना खफा क्यों रहता है? मगर इंटरवल के बाद का हिस्सा सारी कमियां परे करता है जब कहानी हमारे भीतर पैठने लगती है और अंत आते-आते हमें भिगोने लगती है। तब यह फिल्म नहीं रहती, कोई नज़्म बन जाती है जो दिलों को छूती है, भिगोती है, निचोड़ डालती है। इसे देखते हुए ‘वीर ज़ारा’ की याद आए तो आने दीजिएगा।

युवा ईशर बने वेदांग रैना और अफसाना बनीं शरवरी अपनी मासूमियत और चुलबुलेपन से हमें भाते हैं तो वहीं बुजुर्ग ईशर के किरदार में नसीरुद्दीन शाह बेजोड़ लगते हैं। दिलजीत दोसांझ पता नहीं कैसे इतने सहज हो जाते हैं। रजत कपूर, अंजना सुखानी, बनिता संधू, संजय सूरी, मनीष चौधरी, दानिश पंडोर, विनोद नागपाल व अन्य तमाम कलाकार अपनी-अपनी भूमिकाओं से न्याय करते हैं। इसके लिए कास्टिंग डायरेक्टर मुकेश छाबड़ा की मेहनत को भी सराहा जाना चाहिए। तकनीकी तौर पर फिल्म उन्नत है। लोकेशन, पोशाकों और रंगों से इम्तियाज़ माहौल को प्रभावी बनाते हैं। इरशाद कामिल के गीत और ए.आर. रहमान का संगीत फिल्म में रच-बस गया है।

‘मैं वापस आऊंगा’ (Main Vaapas Aaunga) जैसी फिल्में धीमी आंच पर पकाई जाती हैं। यह रेखांकित करती हैं कि हमारे इतिहास में अनगिनत कहानियां हैं। यहीं देख लीजिए-ईशर की कहानी तो इम्तियाज़ ने कह दी, अफसाना का हिस्सा तो रह ही गया। यह फिल्म देखिए, किसी कविता-सी है यह। भीगे दिलों को यह अधिक भाएगी। ज़मीन गीली हो तो मोहब्बत के बीज बोना आसान हो जाता है न।

(रेटिंग की ज़रूरत ही क्या है? रिव्यू पढ़िए और फैसला कीजिए कि यह कितनी अच्छी या खराब है। और हां, इस पोस्ट के नीचे कमेंट कर के इस रिव्यू पर अपने विचार ज़रूर बताएं।)

Release Date-12 June, 2026 in theaters

(दीपक दुआ राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त फिल्म समीक्षक हैं। 1993 से फिल्म–पत्रकारिता में सक्रिय। ‘सिनेयात्रा डॉट कॉम’ (www.cineyatra.com) के साथ–साथ विभिन्न समाचार पत्रों, पत्रिकाओं, वेब–पोर्टल, रेडियो, टी.वी. आदि पर सक्रिय दीपक ‘फिल्म क्रिटिक्स गिल्ड’ के सदस्य भी हैं।)

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