-दीपक दुआ…
ड्यूटी फर्स्ट…! बस यह कहा और निकल गई काम पर। बीमार बच्चे को छोड़, अधूरा खाना छोड़, आधी नींद छोड़, फुनफुनाती सास को छोड़, भुनभुनाते पति को छोड़, खुद अपनी खराब तबियत को पीछे छोड़ वह पहुंची अस्पताल और यूनिफॉर्म पहनते ही उसके भीतर आ गई सुपर पॉवर। जी हां, यह होती है नर्स। ऐसी ही एक सुपर नर्स अंजलि कुल्थे और उन जैसे कई कर्मठ कर्मियों के साहस को सलाम करने आई है यह फिल्म जो न सिर्फ पूछती है बल्कि बताती भी है कि कौन हैं हमारे असली ‘भारत भाग्य विधाता’।
26 नवंबर, 2008 की उस मनहूस रात मुंबई की छाती को ज़ख्मी करने आए दस पाकिस्तानी आतंकियों में से दो इस्माइल खान व अजमल कसाब कामा अस्पताल में भी जा घुसे थे। तब महिलाओं और बच्चों के इस अस्पताल के स्टाफ ने साहस का परिचय देते हुए सारे मरीजों को यहां-वहां छुपा कर वार्ड के ताले व बत्तियां बंद कर उन्हें बचाया था। इसी स्टाफ में थीं नर्स अंजलि कुल्थे जिन्होंने उस रात न सिर्फ 20 गर्भवती महिलाओं को बचाया बल्कि बाद में ज़िंदा पकड़े गए एकमात्र आतंकी अजमल कसाब को पहचानने में पुलिस की मदद भी की थी। इस फिल्म की नर्स गीता का किरदार उन्हीं अंजलि से प्रेरित है।
मनोज तापड़िया की रितेश शाह के साथ मिल कर लिखी यह फिल्म सिर्फ एक नर्स के साहस की नहीं बल्कि उस अस्पताल के सभी कर्मियों की हिम्मत की कहानी कहती है। सवा सौ साल पहले शुरू हुए और स्टाफ व सुविधाओं की कमी से जूझ रहे एक सरकारी अस्पताल के भीतर की इस कहानी में कहीं बनावट नहीं दिखती। यहां कलाकार नहीं किरदार दिखते हैं। घटनाओं में अतिरेक नहीं वास्तविकता दिखती है, संवादों में फिल्मीपन नहीं सहजता मिलती है, तो यह पूरी तरह से इसे लिखने वालों की मेहनत का फल है। एक नहीं अनेक दृश्य हैं जिन्हें देखने के बाद रोमांच होता है, लगता है कि इसे लिखते समय लेखक की आंखें भी अवश्य ही नम हुई होंगी। खासतौर से वह सीन जब अफरातफरी में हर कोई अपनी जान बचाने की सोच रहा है और एक नर्स ‘नाइटिंगेल प्रतिज्ञा’ दोहराने लगती है-‘‘मैं प्रतिज्ञा करती हूं कि…’’ और एक-एक कर सारी आवाज़ें उसके साथ जुड़ जाती हैं तो यकीन हो उठता है कि स्वास्थय सेवाओं में नर्सें सचमुच उस सारथी की तरह होती हैं जिनके बगैर डॉक्टर बिना रथ के योद्धा से अधिक कुछ नहीं।
और यह फिल्म सिर्फ कामा अस्पताल के भीतर या सिर्फ उस रात की ही कहानी नहीं कहती बल्कि यह हमें उन नर्सों के परिवार में भी ले जाती है। यह हमें उन लोगों से भी मिलवाती है जिनसे नर्सें रोज़ मिलती हैं। साथ ही यह हमें इन नर्सों के अंतर्मन में भी ले जाती है। इतना सटीक चित्रण, इतनी बारीक नज़र कि मन इन किरदारों के संग हो लेता है।
बतौर निर्देशक मनोज तापड़िया की यह पहली फिल्म है। लेकिन जिस सधेपन से उन्होंने इसे बनाया है, लगता है कि वह अपना हुनर अच्छी तरह से मांज-निखार कर आए हैं। कई सारे दृश्य उनकी प्रतिभा का खुल कर परिचय देते हैं। बड़ी बात यह भी है कि हर छोटे-बड़े किरदार को यह फिल्म बखूबी जगह देती है और किसी कलाकार को ओवर नहीं होने देती। कंगना रानौत ने बेहतरीन काम किया है, अवार्ड पाने लायक। अवार्ड तो खैर इस फिल्म को लेखन और निर्देशन में भी मिलने चाहिएं। बाकी के तमाम कलाकारों-गिरिजा ओक, स्मिता तांबे, ईशा डे, रसिका अगाशे, सयाजी शिंदे आदि सभी ने किया है। गाने कम हैं, जो हैं सही हैं।
शुरुआत में माहौल बनाती और बाद में इस किस्म की कहानी के लिए ज़रूरी तनाव रच पाने में सफल रहती इस तरह की कहानियां ही असल में सिनेमा को समृद्ध करने का काम करती हैं। एक बात और, बिना उपदेशात्मक हुए यह फिल्म बहुत ही असरदार ढंग से यह भी समझा जाती है कि हर कोई सिर्फ अपना कर्म, कर्तव्य, ड्यूटी पूरी निष्ठा से निभा ले तो वही है असली-भारत भाग्य विधाता।
(यह रिव्यू एक फिल्म समीक्षक का ही नहीं, गर्व से भरे एक नर्स-पति का भी है)
(रेटिंग की ज़रूरत ही क्या है? रिव्यू पढ़िए और फैसला कीजिए कि यह कितनी अच्छी या खराब है। और हां, इस पोस्ट के नीचे कमेंट कर के इस रिव्यू पर अपने विचार ज़रूर बताएं।)
Release Date-05 June, 2026 in theaters
(दीपक दुआ राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त फिल्म समीक्षक हैं। 1993 से फिल्म–पत्रकारिता में सक्रिय। ‘सिनेयात्रा डॉट कॉम’ (www.cineyatra.com) के साथ–साथ विभिन्न समाचार पत्रों, पत्रिकाओं, वेब–पोर्टल, रेडियो, टी.वी. आदि पर सक्रिय दीपक ‘फिल्म क्रिटिक्स गिल्ड’ के सदस्य भी हैं।)
