-दीपक दुआ…
शादी को पांच साल हुए। जस को बच्चा चाहिए, बानी को नहीं। तलाक की नौबत। जस आगे बढ़ गया। उसे प्रीति मिली। एक दिन पता चला कि प्रीति मां बनने वाली ह-जस के बच्चे की। अचानक बानी वापस आ गई। वह भी मां बनने वाली है-जस के बच्चे की। अब जस बेचारा डबल रोल खेल रहा है। कभी प्रीति कभी बानी के बीच झूल रहा है। इस झोलझाल में और भी कई किरदार आ-आकर अपनी पींगें बढ़ा रहे हैं। क्या होगा जस का? बानी के पास जाएगा या प्रीति के? या फिर…?
जिन दर्शकों ने डेविड धवन की फिल्में देखी हैं उन्हें मालूम है कि डेविड किस किस्म का सिनेमा बनाते हैं। उनके सिनेमा में दिमाग को टैंशन मुक्त करके एन्जॉय वाले मोड में डाला जाता है, तर्क और सवाल उठाने वाली नसों को ढीला छोड़ा जाता है, पलकों को झपकाए बिना पर्दे पर तेज रफ्तार से आ रहे रंग-बिरंगे नजारों से आंखों को सेंका जाता है, कानों को खुला रखा जाता है ताकि चुलबुली बातें मिस न हो जाएं और साथ ही कदमों व सिर को गानों के साथ थिरकाया जाता है। तो लो जी मुबारक हो, डेविड धवन के सिग्नेचर स्टाइल वाला वही सिनेमा एक बार फिर आपके सामने है।
पहले भी ढेरों फिल्मों में हम डबल ट्रबल में फंसे हीरो को देख चुके हैं। एक सच को छुपाने के लिए बोले गए झूठ का जाल बुनते-बुनते हीरो खुद ही जाल में फंस जाता है। इस फंसी में से हंसी उपजती है। यहां भी वही भगदड़ मची है जिसमें कई सारे किरदार अपने-अपने तरीके से भसड़ मचा रहे हैं। यह फिल्म भी अपने पहले ही सीन से चौथा गियर डालते हुए रंगीनियों के बाजार में से सरपट निकल रही है। फटाफट घटनाएं, पटापट संवाद, कटाकट सीन, बस देखते जाओ, सुनते जाओ, एन्जॉय करते जाओ। हां, कोई सवाल न उठाना और पहले देखी हुई किसी फिल्म को याद न करना।
सवाल उठाना ही है तो सुनिए-कभी ‘बीवी नं. 1’ के एक गाने में ‘इश्क चांदी है, इश्क सोना है, है जवानी तो इश्क होना है…’ की तान छेड़ी गई थी। लेकिन इस फिल्म के किरदारों के लिए जवानी का इश्क मन से नहीं तन से है। यहां दिल बाद में मिल रहे हैं और जिस्म पहले मिलने को आतुर हैं। यहां शराब की नदियां बह रही हैं। लड़के हों या लड़कियां, हर कोई छातियां दिखाने पर उतारू है। यहां रंधावा नाम का लुधियाना का पंजाबी लंदन में राजस्थानी बोल रहा है और कहानी में आने वाले हर मोड़ का अंदाज़ा दर्शकों को पहले से ही हो रहा है। बस खुश…?
इस कहानी के बहाने से यह फिल्म युवा पीढ़ी के उतावलेपन की बात करती है जहां रिश्तों से ज़्यादा तवज्जो कैरियर को दी जाती है। लेकिन यह सीरियस फिल्म कत्तई नहीं है। यहां तो बस मौज है, मज़ा है, मस्ती है और भरपूर है। गाने-वाने, लोकेशन, कपड़े, किरदार, संवाद, सब रंगत लिए हुए है। डेविड धवन ने जिस स्टाइल से यह फिल्म बनाई है, लगता नहीं कि उन्हें अभी रिटायरमैंट लेनी चाहिए।
वरुण धवन इस किस्म के छिछारे किरदारों में खूब जंचते हैं। डेविड के साथ जो काम कभी गोविंदा करते थे, वह जगह वरुण ने भरपूर भरी है। मृणाल ठाकुर, पूजा हेगड़े और मौनी रॉय ने अपना ‘काम’ बखूबी किया है। मनीष पॉल ने हमेशा की तरह जम कर काम किया है। जिम्मी शेरगिल, राकेश बेदी, चंकी पांडेय, अली असगर, राजेश कुमार भी खूब जंचे। थोड़ी-थोड़ी देर के लिए आए मनोज पाहवा, राजपाल यादव, जॉनी लीवर, कुबरा सैत वगैरह भी ठीक रहे।
इस किस्म की फिल्में दर्शकों के दिमाग के लिए नहीं बल्कि उससे नीचे के अंगों के लिए बनाई जाती हैं। इसे देखिए आंखों को गर्माने के लिए, दिल को धड़काने के लिए और बदन को फड़काने के लिए। सवाल उठाने या खून जलाने के लिए नहीं।
(रेटिंग की ज़रूरत ही क्या है? रिव्यू पढ़िए और फैसला कीजिए कि यह कितनी अच्छी या खराब है। और हां, इस पोस्ट के नीचे कमेंट कर के इस रिव्यू पर अपने विचार ज़रूर बताएं।)
Release Date-05 June, 2026 in theaters
(दीपक दुआ राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त फिल्म समीक्षक हैं। 1993 से फिल्म–पत्रकारिता में सक्रिय। ‘सिनेयात्रा डॉट कॉम’ (www.cineyatra.com) के साथ–साथ विभिन्न समाचार पत्रों, पत्रिकाओं, वेब–पोर्टल, रेडियो, टी.वी. आदि पर सक्रिय दीपक ‘फिल्म क्रिटिक्स गिल्ड’ के सदस्य भी हैं।)
