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रिव्यू-सही और गलत के बीच टंगा ‘लास्ट मैन इन टॉवर’

Deepak Dua by Deepak Dua
2026/09/11
in CineYatra, फिल्म/वेब रिव्यू
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रिव्यू-सही और गलत के बीच टंगा ‘लास्ट मैन इन टॉवर’
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-दीपक दुआ… (This review is featured in IMDb Critics Reviews)

इस अनंत ब्रह्मांड में तिनके जितनी बड़ी मुंबई। उसमें तिनके से भी छोटी विश्राम सोसायटी। उस सोसायटी का एक ज़र्रा योगेश मिश्रा। लेकिन इस एक ज़र्रे की ज़िद के चलते इस सोसायटी की दुनिया थम-सी गई है। दरअसल एक बिल्डर इस सोसायटी के टॉवर गिरा कर वहां नई बिल्डिंग बनाना चाहता है। वह सबको मार्केट रेट से ज़्यादा पैसे दे रहा है। एक-एक करके सब लोग फ्लैट बेचने को राज़ी हो जाते हैं, सिवाय रिटायर्ड टीचर योगेश मिश्रा के। अब कैसे बनेगी यहां नई बिल्डिंग? मास्टरजी राज़ी होंगे या नहीं? कौन मनाएगा उन्हें और कैसे? क्या वह मान जाएंगे…?

भारतीय मूल के ऑस्ट्रेलियाई लेखक-पत्रकार अरविंद अडिगा के चर्चित उपन्यास ‘द व्हाइट टाइगर’ पर इसी नाम से प्रियंका चोपड़ा और राजकुमार राव वाली फिल्म 2021 में आ चुकी है। अब आई यह फिल्म ‘लास्ट मैन इन टॉवर’ (Last Man in Tower) अरविंद के इसी नाम के उपन्यास पर आधारित है।

(रिव्यू-दहाड़ता नहीं मिमियाता है ‘द व्हाइट टाइगर’)

अरविंद अपनी लिखाई में मुख्य कथा के नीचे इंसानी भावनाओं की एक धारा बहाते दिखते हैं जो इस फिल्म (Last Man in Tower) में भी स्पष्ट महसूस होती है। यही कारण है कि ऊपरी तौर पर कुछ और दिख रही कहानी अपने अंडर करंट में कुछ और ही कह रही होती है। विश्राम सोसायटी में मास्टर जी की खूब इज़्ज़त है, हर कोई उन्हें अपने परिवार की तरह मानता है, लेकिन जब उनकी वजह से बाकी सबके सपने संकट में पड़ते हैं तो समीकरण बदलने लगते हैं। तानों-उलाहनों से शुरू होकर बात अपमान, आरोपों और हमलों तक जा पहुंचती है। यह सब इतने ठहराव के साथ होता है कि विश्राम सोसायटी के लोगों के साथ-साथ बाकी सबको और यहां तक कि फिल्म देख रहे हम दर्शकों को भी मास्टरजी का अड़ियल रवैया गलत लगने लगता है। एक जगह बिल्डर कहता है-‘यह दुनिया सही-गलत से नहीं चलती।’ योगेश मिश्रा का जवाब होता है-‘पर दुनिया सही-गलत के बिना भी तो नहीं चलती।’ अंत आते-आते तो ऐसा लगता है जैसे खुद मास्टरजी अपनी ही नज़र में गलत साबित हो रहे हैं। यह इस फिल्म (Last Man in Tower) को लिखने वालों की सफलता है।

इस फिल्म (Last Man in Tower) की स्क्रिप्ट लिखी भी तो एक महारथी ने है। ‘सलाम बॉम्बे’, ‘मिसिसिपी मसाला’, ‘द नेमसेक’ जैसी पटकथाएं लिख चुकीं सूनी तारापोरवाला ने अरविंद के उपन्यास की आत्मा को अपनी स्क्रिप्ट में उतारा है। हर किरदार की विशेषताओं को बड़ी ही बारीकी से बुना गया है और कोई भी उससे डिगता नहीं है। जूही चतुर्वेदी के संवाद बहुत सटीक हैं जो किरदारों और घटनाओं के साथ मेल खाते हुए गहरा असर छोड़ते हैं। दमे का मरीज लेकिन नई-नई इमारतें बनाने का जुनून पाले बैठा बिल्डर, मास्टरजी से अलग रहने वाला और उनके सिद्धांतों को गलत मानने वाला उनका बेटा, सोसायटी का दब्बू सेक्रेटरी, एक बुजुर्ग दंपती, एक छुटभैया ब्रोकर, साइबर कैफे चलाने वाला एक शख्स, अपने मंदबुद्धि बेटे की परवरिश के लिए जूझ रही एक मां और यहां तक कि कभी पर्दे पर न आया मास्टरजी का एक छात्र जो अब एक नामी पत्रकार है, जैसे इसके किरदार इस कहानी को नए रंग और जुदा आयाम देते हैं।

इस हिन्दी फिल्म (Last Man in Tower) को एक अमेरिकी डायरेक्टर बेन रेखी ने बनाया है और जिस तरह से उन्होंने मुंबई शहर और यहां के रहवासियों की फितरत को छुआ है, वह हैरान करता है। मास्टरजी और अन्य किरदारों में आपको अपने आसपास के किरदारों की, खुद की झलक मिलती है। बेन रेखी बिना किसी उतावलेपन के कई दृश्य इतने पैने रचते हैं कि दर्शक मन उनके साथ हो लेता है।

मनोज वाजपेयी का काम इतना अधिक सधा हुआ है कि उनकी प्रशंसा के लिए शब्द कम पड़ सकते हैं। एक रिटायर्ट बुजुर्ग के बात करने का तरीका, आवाज़ की लहक, चेहरे के भाव, आंखें, मनोज अपनी हर जुंबिश तक से अभिनय कर लेते हैं। अभिनय बाकी सबका भी बेहद कमाल का है। बोमन ईरानी, सुकांत गोयल, हरीश खन्ना, दर्शन जरीवाला, चंदन रॉय सान्याल, सलीम सिद्दिकी, सभी अपने किरदारों में समाए रहे हैं। हैरान करती हैं दिव्या दत्ता। इतना मारक अभिनय, इतना असरदार कि मन वाह-वाह कर उठे।

रंगराजन रामाबद्रन का कैमरा अपनी आंख से दृश्यों को कैद ही नहीं करता, उन्हें नए अर्थ भी देता है। बैकग्राउंड म्यूज़िक फिल्म में इस कदर घुलमिल गया है कि वह भी एक किरदार बन गया है।

सितंबर में इस तरह की ‘हट के’ वाले स्वाद की फिल्में खूब रिलीज़ होती हैं क्योंकि ऑस्कर की एंट्री खुलने वाली होती है। यह फिल्म (Last Man in Tower) सचमुच इस काबिल है कि इसे भारत की तरफ से ऑस्कर में भेज दिया जाना चाहिए। बेहद सधा हुआ निर्देशन, बेहद कसी हुई स्क्रिप्ट और बेहद प्रभावी अभिनय वाली यह फिल्म सिनेमा में सार्थकता तलाशने वाले दर्शकों की भूख को जी भर कर मिटाती है।

(रेटिंग की ज़रूरत ही क्या है? रिव्यू पढ़िए और फैसला कीजिए कि यह कितनी अच्छी या खराब है। और हां, इस पोस्ट के नीचे कमेंट कर के इस रिव्यू पर अपने विचार ज़रूर बताएं।)

Release Date-11 September, 2026 in theaters

(दीपक दुआ राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त फिल्म समीक्षक हैं। 1993 से फिल्म–पत्रकारिता में सक्रिय। ‘सिनेयात्रा डॉट कॉम’ (www.cineyatra.com) के साथ–साथ विभिन्न समाचार पत्रों, पत्रिकाओं, वेब–पोर्टल, रेडियो, टी.वी. आदि पर सक्रिय दीपक ‘फिल्म क्रिटिक्स गिल्ड’ के सदस्य भी हैं।)

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