-दीपक दुआ… (This review is featured in IMDb Critics Reviews)
‘इतनी स्वीट बनेगी न, तो खा जाएंगे…।’ भोपाल के एक पुलिस स्टेशन में तैनात ए.एस.आई. बबिता सिंह को उसकी साथी समझाती है। पर बबिता या तो समझना नहीं चाहती या फिर हालात उसे यह समझने नहीं दे रहे हैं। पिता की मृत्यु के बाद अनुकंपा के आधार पर उसे यह नौकरी मिली है। इसीलिए उसे कोई सीरियसली नहीं लेता है। बॉस की नज़रों में उसकी काबिलियत रीलें शूट करने और लिखा-पढ़ी के काम से ज़्यादा नहीं है और घरवालों की नज़र में वह एक ऐसी नौकरी कर रही है कि उन्हें किसी को बताते हुए भी शर्म आती है। बबिता खुद को साबित करना चाहती है-नौकरी में भी, घर पर भी। कर पाएगी वह?
दो हफ्ते के लिए सस्पैंड होकर ननद की गोदभराई के लिए दो साल बाद अपने होमटाउन रीवा पहुंची बबिता को उसके बचपन का दोस्त बंसी मिलता है। वह उससे कुछ कहना चाहता है। लेकिन अगले ही दिन बंसी का कत्ल हो जाता है। कातिल भी पकड़ा गया है मगर बबिता को लगता है कि पकड़ा गया शख्स बंसी का कातिल नहीं है। कौन है कातिल? क्यों हुआ बंसी का कत्ल? क्या बबिता सच का पता लगा पाई? क्या वह खुद को साबित कर पाई या फिर…?
अमेज़न प्राइम वीडियो पर आई इस फिल्म (Babita Singh Reporting) की कई सारी खूबियों में से पहली है इसकी लिखाई। एक ऐसी नायिका जो खास तो बिल्कुल नहीं बल्कि आम से भी आम है। साथी पुलिस वालों की नज़र में कमतर, क्योंकि वह एग्ज़ाम पास करके नौकरी में नहीं आई है। बॉस की नज़र में सिर्फ थाने के अंदर की नौकरी करने लायक। कद-काठी से भारी (मोटी कह लीजिए), जिसका मज़ाक उसके पति समेत बाकी लोग भी अक्सर उड़ाते रहते हैं। पति के लिए तो उसकी नौकरी भी बस एक औपचारिकता है क्योंकि घर तो वही ‘चलाता’ है न। यह बात अलग है कि वह कभी पत्नी का हाथ तक नहीं बंटाता और अपना ‘काम’ पूरा हो जाने के बाद करवट लेकर सो जाता है। और बबिता की सास को उससे अलग ही शिकायत है कि शादी के दो साल में न तो उसे कभी छुट्टी मिल पाई और न ही वह मां बन पाई। और अब वह आई भी है तो घर-ससुराल का काम छोड़ अपने दोस्त के कत्ल की तफ्तीश में लगी हुई है। कोई शर्म है कि नहीं उसे?
लेखिका अमिता व्यास ने बड़ी बारीकी से इस कहानी को बुना है। वह इस कहानी में एक मध्यवर्गीय परिवार की रोज़मर्रा की उन घटनाओं को सलीके से पिरोती हैं जो सबकी नज़र में आम हैं। घर के सारे काम बहू करेगी और श्रेय बेटे को मिलेगा। और यह सब इतनी सहजता से दिखाया गया है कि पति, सास, बाकी लोगों और यहां तक कि उस बहू को भी यह अजीब नहीं लग रहा है। पुलिस महकमे के सीन काफी कम हैं लेकिन जो हैं, वे सच्ची तस्वीरें दिखाते हैं। बंसी, उसका परिवार, उसके दोस्त, शहर के दुकानदार, नशेड़ी आदि सारे के सारे किरदारों में से कोई भी ‘फिल्मी’ नहीं है। यह इस फिल्म की ऐसी खूबी है जो बहुत कम फिल्मों में पाई जाती है। हर एक शख्स, हर एक हरकत, हर एक घटना, हर एक लोकेशन, हर एक संवाद इस कदर विश्वसनीय है कि सिनेमा में थ्रिल देखने के आदी हो चुके दर्शक चाहें तो इसे इस फिल्म (Babita Singh Reporting) की कमी मान सकते हैं लेकिन यह असल में इस सिनेमा की ताकत है।
अंबिका पंडित ने इससे पहले भी कुछ एक चीज़ें बनाई हैं लेकिन बतौर डायरेक्टर यह उनकी पहली फिल्म है और मानना पड़ेगा कि उनके पास एक काबिल फिल्मकार की वह दृष्टि है जो उन्हें दूर तक ले जा सकती है। बिना किसी चीख-चिल्लाहट, बिना किसी ऊल-जलूल हरकत और बिना कोई उपदेश दिए वह इस कहानी में जिस तरह से स्त्रियों की दशा दिखाती हैं, उससे फेमिनिज़्म का झंडा उठा कर घूमने वालों को कुछ सीखना चाहिए।
कैमरा इस कहानी के मुताबिक तनाव रचता है तो बैकग्राउंड म्यूज़िक भरपूर साथ निभाता है। लोकेशन कमाल की हैं। प्रोडक्शन डिज़ाइनिंग वाले हों, कॉस्ट्यूम वाले या मेकअप वाले, हर कोई तारीफ का हकदार है। गाने कहानी का ही हिस्सा लगते हैं। कही-कहीं एडिटिंग की हल्की-सी गुंजाइश दिखाई देती है। बंसी की मौत का सच तलाशते हुए हर किरदार का अपना-अपना सच इस फिल्म में जो ट्विस्ट लाता है उससे बबिता के साथ-साथ दर्शक भी बेचैन होते हैं। यह इस फिल्म की सफलता है। बंसी की मौत का सच किसी को थोड़ा अस्वाभाविक लग सकता है लेकिन वह सच असहज भी करता है और यही असहजता ही इस कहानी को कामयाब बनाती है।
बबिता सिंह बनीं निमिषा सजायन अपने किरदार में एक्टिंग नहीं करतीं, उसे भरपूर जीती हैं। उन्हें कोई बड़ा पुरस्कार मिलना चाहिए। गीतिका विद्या, अंशुमान पुष्कर, बरुण सोबती, सुनीता राजवर बेहद विश्वसनीयता से अपने किरदारों के भीतर समा जाते हैं। बबिता के पति के किरदार के नज़रिए से सोचें तो उसे निभाने के अंशुमान ने सचमुच ज़ोर लगाया होगा। प्रिया यादव, रवि झांकल, कुलदीप सरीन, राजेश कुमार, नवल शुक्ला, प्रियंका सेतिया, रजत दहिया, नितिन गोयल व बाकी सब कलाकार बेहद सहज नज़र आए हैं।
अपने फ्लेवर में यह (Babita Singh Reporting) भले ही एक मर्डर की तफ्तीश करती सस्पैंस-थ्रिलर टाइप फिल्म हो लेकिन असल में यह हमारे समाज के उन कुछ पहलुओं को उजागर करती है जिनसे हम सब रोज़ाना दो-चार होते हैं लेकिन हममें से किसी को उनसे फर्क नहीं पड़ता। इस किस्म की फिल्में फर्क लाने का दावा नहीं करतीं, लेकिन ये सोच बदलने का काम ज़रूर करती हैं। इस फिल्म का अंत यह भी विश्वास दिलाता है कि अभी सब कुछ उतना स्याह, उतना प्रदूषित नहीं हुआ है कि जिसे बदला न जा सके। ज़रूरत सिर्फ कदम उठाने भर की है। इस फिल्म को बनाने वालों ने यह कदम उठाया है और सही दिशा में उठाया है। ऐसी फिल्मों को, इन्हें बनाने वालों को चटक सैल्यूट दिया जाना चाहिए।
(रेटिंग की ज़रूरत ही क्या है? रिव्यू पढ़िए और फैसला कीजिए कि यह कितनी अच्छी या खराब है। और हां, इस पोस्ट के नीचे कमेंट कर के इस रिव्यू पर अपने विचार ज़रूर बताएं।)
Release Date-28 August, 2026 on Amazon Prime Video
(दीपक दुआ राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त फिल्म समीक्षक हैं। 1993 से फिल्म–पत्रकारिता में सक्रिय। ‘सिनेयात्रा डॉट कॉम’ (www.cineyatra.com) के साथ–साथ विभिन्न समाचार पत्रों, पत्रिकाओं, वेब–पोर्टल, रेडियो, टी.वी. आदि पर सक्रिय दीपक ‘फिल्म क्रिटिक्स गिल्ड’ के सदस्य भी हैं।)

आपके लेखन के लिए भी चटक सैलूट दुआ साहब
इतनी ईमानदारी से हर सिनेमा का रिव्यू लिखना बेहद काबिले तारीफ है आपके लेखन से ही मेरी तरह हज़ारों लाखों लोग तय करते होंगे कि यह फ़िल्म या वेब सीरिज देखनी है या नहीं 🙏🏻 धन्यवाद सर
धन्यवाद… आभार…
बहुत अच्छी समीक्षा। जिज्ञासा भी बनी रहती है और एक बौद्धिक तृप्ति भी होती है।
धन्यवाद…
आज अभी फिल्म खत्म की, वाकई बहुत अच्छी है। low profile में बहुत बड़े सच अनुभव करती है, चुपचाप।
आपकी समीक्षा आपकी दृष्टी पैनी है।
साधुवाद
धन्यवाद…
कमाल का review, हमेशा की तरह.. देखते हैं इस वीकेंड.. इस डायरेक्टर की और कौन सी अच्छी मूवी या सीरीज है.
धन्यवाद… ‘ब्लैक वारंट’ का एक एपिसोड इनका था…