-दीपक दुआ… (This review is featured in IMDb Critics Reviews)
देखो जी, सीधी-सी बात यह है कि जिस फिल्म को बनाने वालों ने अपने टीज़र, ट्रेलर, गानों और प्रचार के साथ-साथ फिल्म के नाम तक में यह बता दिया हो कि वे लोग आपको टॉक्सिक यानी ज़हरीला मनोरंजन परोसने जा रहे हैं और जिस फिल्म के नाम की टैगलाइन बड़ी साफगोई से ‘बड़ों के लिए एक परी-कथा’ होने का दावा कर रही हो उसे लेकर आप चाहे जितना मुंह बनाएं, सिर खपाएं, खून जलाएं, इससे उन लोगों को बिल्कुल फर्क नहीं पड़ता जिन्हें इस किस्म की फिल्में बनानी हैं या देखनी हैं।
रिलीज़ के दिन सुबह-सुबह के पहले शो में लगभग पूरे भरे हुए थिएटर में मेरे बगल में बैठे शख्स ने बताया कि रात की बस पकड़ कर आज सुबह उत्तराखंड से दिल्ली लौटा हूं और घर जाने की बजाय पहले थिएटर में आया हूं। क्यों? जवाब मिला-‘रॉकी भाई की फिल्म तो देखनी ही थी न।’ लो कर लो अब रिव्यू।
सच यही है कि इस किस्म की फिल्में ‘रिव्यूप्रूफ’ होती हैं। जिन्हें यश और उनका जलवा देखना है, वे किसी भी रिव्यू की परवाह नहीं करेंगे। और जिन्हें इस तरह का एंटरटेनमैंट नहीं पसंद, उन्हें आप थिएटर तक जबरन भी छोड़ आओ तो वे चौखट से लौट आएंगे।
कन्नड़ सिनेमा का हिन्दी में पहला बड़ा कदम 2018 में आई ‘के.जी.एफ.-चैप्टर 1’ था। इस फिल्म से यश के प्रति हिन्दी वालों में ऐसी दीवागनी उपजी थी कि इसके अगले भाग ‘के.जी.एफ.-चैप्टर 2’ ने पिछले वाले से कमज़ोर होने के बावजूद रिकॉर्डतोड़ कमाई की थी। यही कारण है कि कन्नड़ से हिन्दी में डब होकर आई ‘टॉक्सिक’ की राह महीनों से देखी जा रही थी और यश के चाहने वालों को न तो रिव्यूज़ का इंतज़ार है और न ही परवाह।
खुद यश ने डायरेक्टर गीतू मोहनदास के साथ मिल कर इस फिल्म को लिखा है। 40 से 70 के दशक के गोआ में स्थित इस फिल्म की कहानी का ढांचा नया नहीं है। एक अनाथ लड़का धीरे-धीरे अंडरवर्ल्ड पर राज करने लगता है। कुछ लोग उसके करीबी बनते हैं तो कुछ रकीब। कोई उसका वफादार है तो कोई षडयंत्र बुन रहा है। इस कहानी में उस लड़के की निजी ज़िंदगी के उतार-चढ़ाव भी हैं। उसके मां-बाप, बहन के साथ उसका भावनात्मक रिश्ता, उसके जीवन में आने वाली एक सकर्स-कलाकार, उससे हुआ उसका बेटा, उसकी पत्नी, बच्चा और इन सबसे ऊपर वह खुद, जो हिंसा और गुस्से का शिकार होकर अपनी व दूसरों की ज़िंदगी गर्त बनाने पर तुला हुआ है।
इस फिल्म में दिक्कत कहानी के साथ नहीं बल्कि उसे फैलाने वाली स्क्रिप्ट के साथ है और उससे भी बढ़ कर उसे फिल्माने वाले डायरेक्शन के स्टाइल के साथ है। पहले पौने घंटे तक आप दिमाग लगाते रह जाओ, मजाल है कि कुछ समझ में आ जाए। उसके बाद कहानी पकड़ में आती है लेकिन आप दिमाग लगाना वैसे ही बंद कर देते हो। आखिरी के कुछ मिनटों में जाकर जब कहानी की परतें खुलती हैं तो दिमाग भन्ना उठता है कि अच्छा… यह बात थी। दरअसल पूरी फिल्म देखने के बाद आप कहानी तो कुछ हद तक पकड़ लेते हो लेकिन उन गहरी बातों को नहीं पकड़ पाते जिन्हें यह फिल्म कहना तो चाहती है मगर अपने बेहद उलझे हुए कथानक व कन्फ्यूज़ करते फिल्मांकन के चलते कह नहीं पाती। सवा तीन घंटे लंबी इस फिल्म में इतना कुछ हो रहा है, इतने सारे किरदार हैं, उन सब की ज़िंदगी के इतने सारे पहलू हैं कि समझ ही नहीं आता कि हो क्या रहा है और आखिर हो क्यों रहा है। बीच में कुछ एक जगह नैरेशन द्वारा कहानी को बढ़ाना-समझाना भी इस फिल्म को लिखने वालों और बनाने वालों की असफलता है।
गीतू मोहनदास को हम ऑस्कर में भेजी गई ‘लायर्स डाइस’ जैसी उम्दा फिल्म के लिए जानते हैं। अब हम उन्हें ‘टॉक्सिक’ जैसी एक ऐसी फिल्म के लिए भी जानेंगे जो बेहद भव्य ढंग से एक उलझी हुई कहानी को तेज़ रफ्तार और ज़बर्दस्त मारधाड़ के साथ परोसती है। जी हां, फिल्म की गति इतनी तेज़ है कि आप जब तक एक सीन को समझने की कोशिश करें, एक किरदार की भावनाओं को पकड़ने का प्रयास करें, एक संवाद के शब्दों पर गौर करें, तब तक उससे बिल्कुल अलग मूड का अगला सीन आकर पिछले का असर फ्लश कर देता है। और मारधाड़, शायद वही इस फिल्म को बनाने का असली मकसद रहा हो। गोलियां, कुल्हाड़ियां, चाकू, बम, लात-घूंसे ऐसे धायं-धायं चल रहे हैं जैसे मूसलाधार बारिश हो रही हो। और लाशें तो इस फिल्म में इतनी गिरी हैं कि उन्हें दफनाने के लिए गोआ की धरती कम पड़ जाए। पर्दे की यह नाजायज़ हिंसा कल को जब हमें हिंसक बनाएगी तब हम चिंता करेंगे, फिलहाल तो इसकी भव्यता का मज़ा लेते हैं।
इस फिल्म में कई इमोशनल पल हैं, अपनों की परवाह है, मोहब्बत है, रिश्ते हैं, लेकिन वे सब कहानी के सहज प्रवाह का हिस्सा नहीं लगते। भारी-भरकम डायलॉग हैं जो सुनने में भले ही अच्छे लगते हों लेकिन जिनके मुंह से और जिस माहौल में वे निकल रहे हैं, जंचते नहीं हैं। फिल्म में कई जगह काफी सारी अंग्रेज़ी है लेकिन पर्दे पर कोई सबटाइटिल नहीं आते। अब इतनी अंग्रेज़ी तो हमें आनी ही चाहिए न!
गाने बेहतर हैं, जमते हैं। बैकग्राउंड म्यूज़िक ज़रूर बहुत जगह कनफोड़वा बन जाता है। एक्शन कमाल का है। बल्कि यही एक चीज़ है जिसे जम कर एन्जॉय किया जा सकता है बशर्ते कि आपको खून-खराबा देखने में मज़ा आता हो और आप उसमें लॉजिक जैसी फालतू चीज़ न ढूंढते हों। लोकेशन और सैट शानदार हैं, चकाचौंध करते हैं। शानदार तो इस फिल्म की हर ‘देखने लायक’ चीज़ है। फिल्म में खूब पैसा खर्च किया गया है, यह पर्दे पर साफ दिखता है। एडिटिंग और कसी जा सकती थी। कई सारे सीन गैरज़रूरी लगते हैं। दरअसल यह कमी डायरेक्टर की है जिन्होंने फिल्म को अतिभव्य और बेहद स्टाइलिश ढंग से बनाने के फेर में इतना गाढ़ा बना दिया कि देखने वाले का दिमाग चिपचिपाने लगे।
यश सही मायने में इस फिल्म की जान हैं। एक स्टार क्या होता है, एक स्टार का आभामंडल कैसा होता है, यह पर्दे पर उनकी मौजूदगी से पता चलता है। यश ने पूरी फिल्म में इतना सिगरेट-सिगार पिया है कि थिएटर धुआं-धुआं हो उठता है। यदि उन्होंने सचमुच शूटिंग के दौरान भी इतना ही धुआं उड़ाया है तो हमें उनके स्वास्थय की चिंता कर लेनी चाहिए। बाकी तो फिल्म में ढेरों कलाकार भरे पड़े हैं और हर किसी ने काम भी बढ़िया ही किया है। ढेर सारे किरदार, उन किरदारों के नाम और उनके आपसी रिश्ते समझने में सिरदर्द होता है। एक बात और-राया, टिकट, नाडिया, मेलिसा, एलिज़ाबेथ, एडम, टोनी, करमाडी, भीरा, फर्नांडीज़, पैड्रो, एंथोनी, निकोलस, रॉबर्ट, मार्कस, सेल्वाडोर जैसे नामों के बीच हीरो की बहन का नाम ‘गंगा’ कुछ अजीब नहीं लगता?
इस फिल्म का एक संवाद है-‘दिमाग एक ऐसी भूलभुलैया है कि उससे बाहर निकलने का रास्ता ढूंढते-ढूंढते अच्छा-खासा इंसान भी गुमशुदा हो जाता है।’ यही बात इस फिल्म के बारे में भी कही जा सकती है। इस फिल्म में ठहराव, बढ़िया क्वालिटी का मनोरंजन या कोई मैसेज ढूंढते हुए गुमशुदा होना है या रॉकिंग स्टार यश की इस भव्य और हिंसक परी-कथा को बिना ज़्यादा दिमाग लगाए देखना है, मर्ज़ी आपकी।
(रेटिंग की ज़रूरत ही क्या है? रिव्यू पढ़िए और फैसला कीजिए कि यह कितनी अच्छी या खराब है। और हां, इस पोस्ट के नीचे कमेंट कर के इस रिव्यू पर अपने विचार ज़रूर बताएं।)
Release Date-26 August, 2026 in theaters
(दीपक दुआ राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त फिल्म समीक्षक हैं। 1993 से फिल्म–पत्रकारिता में सक्रिय। ‘सिनेयात्रा डॉट कॉम’ (www.cineyatra.com) के साथ–साथ विभिन्न समाचार पत्रों, पत्रिकाओं, वेब–पोर्टल, रेडियो, टी.वी. आदि पर सक्रिय दीपक ‘फिल्म क्रिटिक्स गिल्ड’ के सदस्य भी हैं।)

बहुत शानदार समीक्षा दीपक जी 👏🏻👏🏻👏🏻👏🏻
धन्यवाद…