-दीपक दुआ… (This review is featured in IMDb Critics Reviews)
इस फिल्म ‘डायल 1975’ की कहानी कुछ यूं है कि… यार, मैं न बता रहा कहानी। पूरी फिल्म देख ली, इत्ती लंबी और उलझी हुई कहानी है कि देखने में माथा खराब हो गया, अब बताने में भी होगा। एक काम कीजिए, खुद ही ट्रेलर में देख लीजिए, अगर वह भी समझ में आ जाए तो।
(यह लीजिए फिल्म ‘डायल 1975’ के ट्रेलर का लिंक)
हां तो, अब आपकी समझ में आ गया होगा कि… बताइए क्या समझ में आया? नहीं आया न कुछ? चलिए मैं कोशिश करता हूं।
जून 1975 में तब की ताकतवर प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने भारत में इमरजैंसी लगवा दी थी। उन दिनों हर तरफ नज़र रखी जा रही थी, फोन-शोन रिकॉर्ड हो रहे थे, ऐसे में एक फोन-कॉल रिकॉर्ड होता है कि जर्मनी से एक ब्रीफकेस आ रहा है जिसमें आने वाले ज़माने का एक यंत्र है। इसकी डील चार लाख रुपए में एक होटल में होगी। अब बहुत सारे लोग इस डील के आगे-पीछे घूम रहे हैं। किसी को उस कॉल-रिकॉर्डिंग की टेप चाहिए, किसी को वह ब्रीफकेस, किसी को चार लाख रुपए तो किसी और को कुछ और। इन सारी चाहतों को पूरा करने के लिए अलग-अलग लोग, अलग-अलग लोगों को ज़िम्मेदारी देते हैं और ये अलग-अलग लोग बहुत सारे अलग-अलग लोगों को मारे जा रहे हैं।
सन् 1975 की इमरजैंसी की पृष्ठभूमि में बुनी गई इस कहानी का ट्रेलर यह भी बताता है कि यह सारी खुराफात भविष्य के उस यंत्र यानी बिना तार के एक फोन (मोबाइल फोन कह लीजिए) के लिए की जा रही है ताकि उस पर जब बातें हों तो वे रिकॉर्ड न हो सकें और यह सब एक ‘बड़े नेता का ताकतवर बेटा’ (समझे, कौन…?) करवा रहा है।
अब पहली बात-मान लीजिए कि वह यंत्र (मोबाइल फोन) अगर सही हाथों में पहुंच जाता तो उसका इस्तेमाल कैसे होता? वह फोन नेटवर्क कैसे पकड़ता? और पूरे देश में वह एक ही होता तो दूसरी तरफ वाले फोन की रिकॉर्डिंग तो हो सकती थी न? चलिए, सही हाथों में न पहुंच कर अगर वह गलत हाथों में पहुंच जाता तो वे गलत लोग इसका क्या करते? क्योंकि अचार इसका डलता नहीं और बाकी किसी काम वह आता नहीं। और ऐसी भी क्या मारामारी कि उसके लिए उस ज़माने में चार लाख (आज के लगभग सवा करोड़) रुपए वह ‘बड़े नेता का ताकतवर बेटा’ देने जा रहा था? और उसे रोकने वाले कौन थे? वे लोग उसे रोकना ही क्यों चाह रहे थे? किस के इशारे पर वे उसे रोकना चाह रहे थे? और उस कॉल-रिकॉर्डिंग वाले टेप को हासिल करके उन्हें क्या मिलने वाला था? ब्लैकमेल करते वे उसे? उसे, उस बड़े नेता के ताकतवर बेटे को? हा… हा… हा…!
दरअसल बात हंसने से ज़्यादा यह विचार करने की है कि आखिर यह कहानी कहना क्या चाहती है? कैसे सोची गई होगी यह कहानी? क्या विचार रहा होगा लेखकों के दिमागों में? इस कहानी को जब उन्होंने एक पटकथा के तौर पर फैलाया होगा तब क्या चल रहा होगा उनके दिमाग में कि इसके द्वारा आखिर उन्हें दर्शकों तक क्या संदेश पहुंचाना है? इस फिल्म (Dial 1975) को देखते समय उठने वाले ढेरों सवालों पर यह कुछ नहीं कह पाती। यही गूंगापन इस फिल्म (Dial 1975) की सबसे बड़ी कमज़ोरी है।
ढेर सारे किरदार हैं इसमें और ढेरों किस्म के किरदार हैं इसमें। लेकिन इन लोगों के होने से कहानी का प्रवाह सहज होने की बजाय बुरी तरह से उलझा है और ऐसी कन्फ्यूज़न उपजाता है कि आप माथा पकड़ लेते हैं। इन किरदारों की जो पृष्ठभूमि बताई गई है, वह इनकी विश्वसनीयता को कम करती है।
इस फिल्म (Dial 1975) के दोनों डायरेक्टर्स (जैसी उलझी हुई कहानी है, एक से तो संभले भी न) का कसूर इसलिए ज़्यादा नहीं है कि लेखन में उनका हाथ नहीं रहा। लेकिन इससे वह बरी नहीं हो जाते। उलझी हुई पटकथा को और अधिक उलझाने व सुस्ताने वाले स्टाइल में निर्देशित करने के गुनहगार तो ये दोनों हैं ही। फिल्म में बार-बार आता नैरेशन बताता है कि इसे लिखने-बनाने वालों के पास न तो साफ नज़र थी और न ही स्पष्ट नज़रिया। उनके इस दृष्टि-दोष का खामियाजा अब दर्शकों को भुगतना पड़ रहा है। फिल्म के डायलॉग भारी-भरकम हैं और अधिकांश जगहों पर यह भारीपन बेवजह है। एक संवाद है-‘आप जैसे बुद्धिजीवियों के साथ यही समस्या है कि आप बहुत ऊपर से बैठ कर तमाशा देखते रहते हैं।’ इस फिल्म को बनाने वालों ने भी यही किया है-ऊपर से भारी, अंदर से खोखली फिल्म बना दी है। अब दर्शक सिर खुजाएंगे, ये लोग तमाशा देखेंगे।
किसी कस्बे सरीखी इस फिल्म (Dial 1975) की लोकेशन कहानी को अजीब-सा बासा लुक देती है। कैमरावर्क हल्का है और बैकग्राउंड म्यूज़िक डिस्टर्ब करता है। गाने-वाने साधारण हैं। हां, प्रोडक्शन डिज़ाइन बढ़िया है। 1975 के दौर को ठीक से पकड़ा है बोइशाली सिन्हा ने। के.के. मैनन हर बार की तरह जंचे हैं। प्रवेश राणा ठीक लगे और कीर्ति कुल्हारी भी। कीर्ति कुल्हारी की ‘इंदु सरकार’ के बाद इमरजैंसी की पृष्ठभूमि पर यह दूसरी फिल्म है। वह भी हल्की थी, यह भी कमवज़नी है। काम तो लगभग हर कलाकार का सही रहा है। उन टॉम ऑल्टर साहब का भी जिनका देहांत हुए 9 बरस बीत चुके हैं। जी हां, 2016 में यह फिल्म ‘सन् पचत्तर’ टाइटल के साथ शुरू हुई थी। बरसों से बन कर पड़ी थी। अब यह दूरदर्शन के वेव्स ओ.टी.टी. पर रिलीज़ हुई है।
(रिव्यू-मजबूरी का नाम ‘इंदु सरकार’)
सवाल यह भी उठ सकता है कि वेव्स वाले ऐसे माल को क्या सोच कर अपने प्लेटफॉर्म पर जगह देते हैं? फिर शिकायत होती है कि सरकारी चीज़ें घाटे में जा रही हैं। पता नहीं कंटैंट लेते समय वेव्स वाले सिनेमा के जानकार लोगों की मदद लेते भी हैं या ‘सरकारी तौर-तरीके’ अपनाते हैं। खैर, हमें क्या।
(रेटिंग की ज़रूरत ही क्या है? रिव्यू पढ़िए और फैसला कीजिए कि यह कितनी अच्छी या खराब है। और हां, इस पोस्ट के नीचे कमेंट कर के इस रिव्यू पर अपने विचार ज़रूर बताएं।)
Release Date-21 August, 2026 on Waves OTT
(दीपक दुआ राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त फिल्म समीक्षक हैं। 1993 से फिल्म–पत्रकारिता में सक्रिय। ‘सिनेयात्रा डॉट कॉम’ (www.cineyatra.com) के साथ–साथ विभिन्न समाचार पत्रों, पत्रिकाओं, वेब–पोर्टल, रेडियो, टी.वी. आदि पर सक्रिय दीपक ‘फिल्म क्रिटिक्स गिल्ड’ के सदस्य भी हैं।)

फिल्म देखने से ज्यादा आनन्द review पढ़ने में आ गया 😃 यूँ भी इतनी पुरानी फिल्म देखना बेकार है।
धन्यवाद…