-दीपक दुआ… (This review is featured in IMDb Critics Reviews)
पहले तो यह जान लीजिए कि ‘लालो’ हिन्दी में डब होकर आई एक गुजराती फिल्म है जिसे बिना उपयुक्त प्रचार के रिलीज़ कर दिया गया है, शायद यह सोच कर कि यह अपनी राह खुद बना लेगी। लेकिन इसे बनाने वाले लोग शायद हिन्दी के दर्शकों का मिज़ाज नहीं जानते कि ये लोग सिर्फ उसी चीज़ के पीछे भागते हैं जिसके भीतर भले ही दम हो या न हो लेकिन जिसका ढोल ज़ोर-ज़ोर से बजाया गया हो। तो सुनिए, इस फिल्म ‘लालो-श्रीकृष्ण सदा सहायते’ का ढोल इस तरह से बजाया जा सकता है कि अक्टूबर, 2025 में गुजराती में रिलीज़ हुई यह फिल्म गुजराती सिनेमा के इतिहास की सबसे बड़ी हिट फिल्म है। इसके आने से पहले जहां सबसे बड़ी हिट गुजराती फिल्म का कलैक्शन 50 करोड़ था वहीं इस फिल्म का कलैक्शन 120 करोड़ तक जा पहुंचा है। माउथ पब्लिसिटी के दम पर इतनी बड़ी हिट होने के बाद अब यह हिन्दी में डब होकर आई है। ज़ाहिर है इसमें कुछ तो खास होगा ही, आइए देखते हैं।
‘लालो’ की कहानी गुजरात के जूनागढ़ की है। ऑटो-रिक्शा चलाने वाले लालो का परिवार आर्थिक तंगी से त्रस्त है। लालो बुरी संगत में पड़ा हुआ है। एक दिन वह शहर से बाहर एक सवारी छोड़ने जाता है और वीराने में बने एक घर में फंस जाता है। न खाना, न पानी, न आसपास कोई इंसान, न वहां से निकलने का ज़रिया। वह भगवान को पुकारता है और… भगवान आते हैं, सचमुच आते हैं। लेकिन वह साफ कहते हैं कि यह तुम्हारा युद्ध है, मैं राह दिखाऊंगा मगर कर्म तो तुम्हें ही करना होगा।
अपनी शुरुआत में यह एक सर्वाइवल थ्रिलर सरीखी लगती है। हिन्दी में 2017 में आई राजकुमार राव वाली ‘ट्रैप्ड’ सरीखी लगती है। उसमें भी नायक 35वीं मंज़िल के एक फ्लैट में अकेला फंस गया था। ‘लालो’ इस मायने में अलग है कि इसका नायक उस मकान में फंसने के बाद ईश्वर को पुकारता है, विनती करता है कि हे प्रभु, निकालो न, घर पर पत्नी और बेटी राह देख रही होंगी। वहां उसे याद आता है कि पहले वह कैसा था, कैसे वह बुरी संगत में पड़ा। उसकी पुकार पर जब प्रभु आते हैं तो भी वह वहां से निकल नहीं पाता क्योंकि उसके मन में अभी भी पाप है। लेकिन जब वह प्रयत्न करने के साथ-साथ प्रायश्चित करता है तो रास्ते आसान होते चले जाते हैं।
(रिव्यू-अलग है, उम्दा है ‘ट्रैप्ड’)
यह कहानी सिर्फ एक लालो की नहीं है जो एक घर में फंसा है बल्कि यह हम सब की कहानी है जो अपने-अपने दायरों में, बुरी आदतों में, व्यसनों में फंसे हुए हैं और मौका मिलने पर भी निकलना नहीं चाह रहे हैं। यह फिल्म ‘लालो’ सिखाती है कि केवल कर्म ही नहीं बल्कि मन और वचन की शुद्धि एक अच्छा इंसान बनाती है, उसे बाहर से ही नहीं बल्कि भीतर से भी आलोकित करती है। यह फिल्म देखते समय महसूस होता है कि प्रभु-कृपा भी तभी बरसती है जब इंसान स्वयं प्रयत्न करता है। अंत आते-आते यह फिल्म आपको आध्यात्मिक तौर पर छू चुकी होती है, यह इसकी सफलता है।
हालांकि इस फिल्म ‘लालो’ की स्क्रिप्ट में अपेक्षित कसावट की कमी है। कई जगह पर पटकथा सुस्त है और इसमें दोहराव भी है। फिल्म की गति भी बीच-बीच में धीमी हो जाती है। लेकिन फिर लगता है कि शायद यही इस फिल्म के लिए सही भी है। हौले-हौले, लंबी श्वास लेकर जैसे इंसान शांत होता है, यह फिल्म भी उसी तरह से देखी जानी चाहिए। एक और संदेश भी यह फिल्म देती है कि ईश्वर सिर्फ अच्छे लोगों की राह प्रशस्त करने ही नहीं, गलत राह पर चल रहे अपने भक्तों को सही राह पर लाने के लिए भी आते हैं। अब ‘आते हैं’ को आप चाहें तो मनोस्थिति कह लीजिए या फिर प्रभु-कृपा।
निर्देशक अंकित सखिया के काम में परिपक्वता है। बहुत सारे सीन उन्होंने काफी सधे हुए ढंग से दर्शाए हैं। अपने कलाकारों से भी उन्हें भरपूर सहयोग मिला है। शृहद गोस्वामी, करण जोशी, रीवा राछ व अन्य सभी कलाकारों ने उम्दा काम किया है। फिल्म की लोकेशन प्रभावी हैं। इसे देखने के बाद जूनागढ़ जाने का मन कर सकता है। कैमरा अपना काम बखूबी करता है। गीत-संगीत उल्लेखनीय है। गुजराती से हिन्दी में लाते हुए गीतों के शब्द भले ही बदले हों, उनके भावों की प्रगाढ़ता बनी रही है। ‘श्वास तू, शब्द तू, अग्नि तू, वायु तू, नीर तू, आभ तू, पृथ्वी तू, सृजन तू, सृष्टि तू…’ जैसे भाव आपकी आस्था को स्थिर करते हैं।
राजश्री की वेब-सीरिज़ ‘बड़ा नाम करेंगे’ के रिव्यू में मैंने लिखा था, ‘‘जब किसी कहानी को देख कर मन सरल हो उठे, तरल हो उठे और भीतर का गरल नष्ट होने लगे तो यकीन मानिए वहां पर सिनेमा अपने सार्थकतम रूप में मौजूद होता है।’’ यह फिल्म भी सिनेमा के उसी सार्थक रूप को सामने लाती है।
(वेब-रिव्यू : दिल के छज्जे पे चढ़ेंगे, ‘बड़ा नाम करेंगे’)
इस फिल्म ‘लालो’ को देखा जाना चाहिए, महसूस किया जाना चाहिए, इससे उपजने वाली सीख पर अमल किया जाना चाहिए। इसे देखते हुए मन होता है कि चलिए, थोड़ा और सुधर जाएं, थोड़ा और निर्मल हो जाएं, थोड़ा और संवर जाएं, मुमकिन है तब हमें भी कोई राह दिखाने, उंगली थामने वाला ‘प्रभु’ मिल जाए।
Release Date-9 January, 2026 in theaters
(दीपक दुआ राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त फिल्म समीक्षक हैं। 1993 से फिल्म–पत्रकारिता में सक्रिय। ‘सिनेयात्रा डॉट कॉम’ (www.cineyatra.com) के साथ–साथ विभिन्न समाचार पत्रों, पत्रिकाओं, वेब–पोर्टल, रेडियो, टी.वी. आदि पर सक्रिय दीपक ‘फिल्म क्रिटिक्स गिल्ड’ के सदस्य भी हैं।)
