-दीपक दुआ… (This review is featured in IMDb Critics Reviews)
हैदराबाद का एक नामी इंजीनियरिंग कॉलेज। आरव को अपनी ही क्लास की चांदनी भा गई। दोनों करीब आए, प्यार हुआ और उन्होंने साथ-साथ चलने का फैसला कर लिया। तभी कुछ ऐसा हुआ कि दोनों के बीच दूरियां आने लगीं। उन्हें महसूस हुआ कि लिखने-पढ़ने की कच्ची उम्र में उनका लिया एक बड़ा फैसला असल में उतना मैच्योर था नहीं, जितना उन्हें लग रहा था। तो अब क्या करें…!
फिल्मी पर्दे पर आने वाली अधिकांश प्रेम-कहानियों से ‘चांद मेरा दिल’ इस मायने में थोड़ी अलग है कि यह अपने भीतर कई सारे फ्लेवर कुछ-कुछ मात्रा में लिए बैठी है। इसमें प्यार के रंग हैं, इश्क की गुनगुनाहट है तो रोज़मर्रा की ज़िंदगी की का सच भी है, नून-तेल-रोटी की जुगत करने की मशक्कत भी है। अब इस थोड़े-थोड़े में से किस दर्शक को क्या पसंद आ जाए और किसे क्या पसंद नहीं आए, यह जोखिम इस फिल्म के साथ बना रहेगा।
फिल्म ‘चांद मेरा दिल’ की कहानी अच्छी है। ऐसी कहानियां समाज में खूब मिलती हैं कि पढ़ाई करने के लिए भेजे गए बच्चे वहां प्यार, शादी जैसी बातों में उलझ गए। कभी उनके घरवालों ने साथ दिया तो कभी नहीं। इस फिल्म में एक तरफ लड़का-लड़की का एक-दूसरे की ओर खिंचना, उन्हें रिझाना, प्यार की पींगें बढ़ाना जैसी चमकीली बातें हैं तो वहीं कम उम्र में बड़ी ज़िम्मेदारी उठाना, उसे निभाने के लिए जूझना और कभी एक-दूसरे से तो कभी खुद से भिड़ जाना जैसी ज़मीनी सच्चाइयां भी। लेखकों ने बेहतर सीन गढ़ने की भरसक कोशिशें की हैं और इसमें वे कई दफा कामयाब भी हुए हैं मगर हर दफा नहीं। यही कारण है कि कुछ सीन बहुत बेहतर लगते हैं तो कई बार पर्दे से बचकानापन टपकने लगता है। दर्शक के मन में ‘कुछ कुछ होता है’, ‘मैं हूं ना’, ‘मोहब्बतें’, ‘धड़क 2’, ‘सैयारा’ जैसी कई सारी फिल्मों की यादें आती-जाती रहती हैं और ‘चांद मेरा दिल’ कभी उसे छू जाती है तो कभी दाएं-बाएं से होकर निकल जाती है।
डायरेक्टर विवेक सोनी को सिनेमा का क्राफ्ट पकड़ना आता है। कैमरा एंगल, रंगों और लाइट्स के सटीक इस्तेमाल के अलावा सिनेमाई रूपकों को अपने दृश्यों में बखूबी पिरोते हुए वह हमें अपने साथ लिए चलते हैं। हालांकि कहीं-कहीं स्क्रिप्ट की खामियां और सीन बुनने में हुई चूकें भी झलकती हैं लेकिन विवेक के काम से निराशा नहीं होती। मगर दिक्कत तब आती है जब कहानी रोमांस के ज़ोन से निकल कर टकराव के मोड़ पर पहुंचती है और फिल्म ‘चांद मेरा दिल’ की लिखाई-बुनाई एकदम से साधारण हो जाती है। यही कारण है कि सरपट चल रही फिल्म इंटरवल के बाद ऊठक-बैठक करने लगती है। लगता है जैसे दिल में जगह बनाते-बनाते कोई खुद ही मकान खाली करके चला गया हो।
‘किल’ और ‘बैड्स ऑफ बॉलीवुड’ में पसंद किए जा चुके लक्ष्य अपने काम को प्रभावी ढंग से अंजाम देते हैं। उनकी आवाज असरदार है। लुक और अदाओं से वह आदित्य रॉय कपूर जैसे लगने लगते हैं। अनन्या पांडेय के किरदार में ज़्यादा उतार-चढ़ाव थे जिसे संभालने की उन्होंने भरसक कोशिश भी की। थोड़ी और मैच्योरिटी आएगी तो वह और बेहतर लगने लगेंगी। आस्था सिंह, परेश पाहूजा, मनीष चौधरी, इरावती हर्षे, चारू शंकर व अन्य कलाकारों ने भरपूर सहयोग दिया।
(रिव्यू-हिंसक प्रहार करती ‘किल’)
अमिताभ भट्टाचार्य के गीत और सचिन-जिगर का संगीत फिल्म ‘चांद मेरा दिल’ में रंग भरता है। कभी ये गीत खुशबुएं बिखेरते हैं तो कभी टीस जगाते हैं। इस फिल्म का स्तर उठाने में इनका बड़ा हाथ रहा है।
फिल्म ‘चांद मेरा दिल’ देखी जा सकती है। इस फिल्म की चांदनी पूरी तरह से भले ही न बिखर पाई हो लेकिन टाइमपास मनोरंजन से ज़्यादा है इस फिल्म में। यह ज़िंदगी की सच्चाइयों को समझा पाने में कामयाब रही है। आपसी रिश्ते चाहे कैसे भी हों, टिके तो इन सच्चाइयों पर ही होते हैं न।
(रेटिंग की ज़रूरत ही क्या है? रिव्यू पढ़िए और फैसला कीजिए कि यह कितनी अच्छी या खराब है। और हां, इस पोस्ट के नीचे कमेंट कर के इस रिव्यू पर अपने विचार ज़रूर बताएं।)
Release Date-22 May, 2026 in theaters
(दीपक दुआ राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त फिल्म समीक्षक हैं। 1993 से फिल्म–पत्रकारिता में सक्रिय। ‘सिनेयात्रा डॉट कॉम’ (www.cineyatra.com) के साथ–साथ विभिन्न समाचार पत्रों, पत्रिकाओं, वेब–पोर्टल, रेडियो, टी.वी. आदि पर सक्रिय दीपक ‘फिल्म क्रिटिक्स गिल्ड’ के सदस्य भी हैं।)

love story, वो भी Bollywood की, तौबा…
इसे तो देखना ही नहीं।