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रिव्यू-सिस्टम के छेद दिखाती ‘सिस्टम’ में छेद

Deepak Dua by Deepak Dua
2026/05/22
in CineYatra, फिल्म/वेब रिव्यू
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रिव्यू-सिस्टम के छेद दिखाती ‘सिस्टम’ में छेद
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-दीपक दुआ… (This review is featured in IMDb Critics Reviews)

‘किसी ने जुर्म किया है या नहीं, इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता। अगर वह जुर्म साबित किया जा सकता है तो वह दोषी है, वरना नहीं।’

इस संवाद के इर्दगिर्द बुनी गई इस फिल्म की कहानी दरअसल हमारे कानूनी सिस्टम के उन छेदों को दिखाने का काम करती है जिसमें कभी कोई बेकसूर शख्स इसलिए सज़ा पा लेता है क्योंकि सबूत उसके खिलाफ होते हैं, तो कभी कोई कसूरवार इसलिए छूट जाता है क्योंकि गवाह और सबूत उसके खिलाफ होते हैं।

दिल्ली के नामी वकील रवि राजवंश बड़े-बड़े केस चुटकी बजाते जीत जाते हैं। उनकी बेटी नेहा राजवंश सरकारी वकील है और अक्सर हारती रहती है। पिता-बेटी में डील होती है कि नेहा लगातार दस केस जीते तो रवि उसे अपना पार्टनर बना लेगा। नेहा एक-एक कर नौ केस जीत भी लेती है। तभी आता है एक ऐसा हाई प्रोफाइल केस जिसमें उसे अपने पिता के खिलाफ ही खड़े होना है। क्या जीत पाएगी वह यह केस? और इससे भी बड़ा सवाल-जीतना ज़्यादा ज़रूरी है या इंसाफ दिलवाना?

कभी प्रियंका चोपड़ा के साथ ‘लव स्टोरी 2050’ से हीरो बन कर आए हरमन बवेजा अब प्रोड्यूसर के साथ-साथ राइटर भी बन चुके हैं। इस फिल्म की उनकी लिखी कथा-पटकथा को उनके साथ कुछ और लोगों ने भी हाथ लगाया है। कहानी बुरी नहीं है। अदालतों में होने वाली जीत-हार के पीछे इंसाफ मिलने-न मिलने की विडंबनाओं की बात करती इस कहानी में दो वकीलों की टक्कर के बहाने से कानूनी सिस्टम के छेदों को दिखाने की कोशिश की गई है।

लेकिन इस कहानी पर बुनी गई स्क्रिप्ट में कई छेद हैं। नेहा के नौ केसों को जिस रफ्तार से दिखाया गया है उनमें से कुछ ‘निकल’ कर नहीं आता है। बहुत कुछ अधूरा लगता है, घटनाओं के तार आपस में कटे हुए लगते हैं। महसूस होता है कि लिखने वालों को दसवें केस तक पहुंचने की बहुत जल्दी थी ताकि पिता-पुत्री को आमने-सामने खड़ा कर सके। इस दसवें केस के बहाने से जो सच सामने आता है और पता चलता है कि सारी खुराफात कौन कर रहा था तो उस मामूली शख्स की इतनी तगड़ी और बारीक प्लानिंग पर दिमाग सवाल उठाने लगता है। कह सकते हैं कि यह कोई थ्रिलर फिल्म नहीं है जिस पर तर्कों की उंगलियां उठाई जाएं लेकिन यह बात तो लेखक-निर्देशक को समझनी चाहिए कि जब आप हमें थ्रिलर स्टाइल में कहानी परोस रहे हो तो उसमें लॉजिक का तड़का तो लगेगा ही न! नेहा के जीते हुए नौ में से दो केस ही विस्तार से दिखाए गए और वह भी आधे-अधूरे स्टाइल में। बेहतर होता कि राजवंश साहब तीन ही केस जीतने की शर्त रखते। इससे नेहा का भी मान रह जाता और फिल्म का भी। और हां, यू.पी.आई. से रिश्वत भला कौन लेता है?

अक्षत घिल्डियाल के संवाद वजनी हैं जो कमज़ोर पटकथा को सहारा देते हैं। ‘इंसाफ भगवान की तरह है, बहुत मुश्किल से मिलता है’ जैसे ये संवाद ही इस फिल्म को वन टाइम वॉच बनाते हैं वरना स्क्रिप्ट के बार-बार नज़र आते छेदों में से कहानी का रिसाव होने के बाद जो बचता है, वह काफी नहीं है। ‘निल बटे सन्नाटा’ और ‘बरेली की बर्फी’ जैसी फिल्में बना चुकीं अश्विनी अय्यर तिवारी के निर्देशन में इस बार एक अजीब-सा बनावटीपन है। हालांकि वह वकीलों और उनके क्लाईंट्स के जुदा संसारों में झांकने का प्रयास करती हैं लेकिन इस बार वह कुछ खास गहरे और चोट करने वाले सीन नहीं बना सकीं हैं।

सोनाक्षी सिन्हा ऐसे किरदारों में जंचती रही हैं। यहां भी उन्होंने अच्छा काम किया है। उनकी मदद करने वाली स्टेनो बनीं ज्योतिका प्रभावी रहीं। हालांकि उनके किरदार के कई करतबों पर आप उंगली उठा सकते हैं। आशुतोष गोवारीकर ओवर होते हुए भी जंचे। फिल्म जब इस किस्म की नायिका प्रधान हो तो उसके साथ एक दिक्कत यह भी रहती है कि बड़े नाम वाले पुरुष कलाकार या तो उसमें लिए नहीं जाते या वे खुद ही नहीं आते। यहां भी यही हुआ है। अधिकांश पुरुष किरदार साधारण हैं और उन्हें निभाया भी साधारण तरीके से गया है।

लोकेशन, कैमरा आदि साधारण रहा है। बैकग्राउंड म्यूज़िक से दृश्यों में जान डालने की कोशिश की गई है। गाने-वाने ठीक-ठाक हैं। एक गीत के शब्द गहरे हैं। लेकिन जब स्क्रिप्ट में हल्कापन हो तो फिल्म भी हल्की ही लगती है। अमेज़न प्राइम वीडियो पर रिलीज़ हुई इस फिल्म को टाइम पास के लिए देखा जा सकता है।

(रेटिंग की ज़रूरत ही क्या है? रिव्यू पढ़िए और फैसला कीजिए कि यह कितनी अच्छी या खराब है। और हां, इस पोस्ट के नीचे कमेंट कर के इस रिव्यू पर अपने विचार ज़रूर बताएं।)

Release Date-22 May, 2026 on Amazon Prime

(दीपक दुआ राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त फिल्म समीक्षक हैं। 1993 से फिल्म–पत्रकारिता में सक्रिय। ‘सिनेयात्रा डॉट कॉम’ (www.cineyatra.com) के साथ–साथ विभिन्न समाचार पत्रों, पत्रिकाओं, वेब–पोर्टल, रेडियो, टी.वी. आदि पर सक्रिय दीपक ‘फिल्म क्रिटिक्स गिल्ड’ के सदस्य भी हैं।)

Tags: akshat ghildialamazonamazon primeamazon prime videoAshutosh GowarikarAshwiny Iyer Tiwariharman bawejajyothikanishant singhsonakshi sinhasystemsystem reviewvijyant kohli
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