-दीपक दुआ…
1971 के भारत-पाक युद्ध में इतने सारे मोर्चों पर इतनी सारी लड़ाइयां लड़ी गई थीं कि हमारे फिल्मकार चाहें तो हर साल उन पर फिल्में बना सकते हैं। 13 जून, 1997 को आई जे.पी. दत्ता की ‘बॉर्डर’ उस युद्ध की लोंगेवाला की लड़ाई पर थी तो पिछले दिनों आई श्रीराम राघवन की ‘इक्कीस’ बसंतर की लड़ाई पर। अब आई ‘बॉडर 2’ को बसंतर, शक्करगढ़, मनव्वर तवी, पुंछ, ऑपरेशन चंगेज़, आई.एन.एस. खुखरी जैसे कई मोर्चों को मिला-जुला कर मसालेदार बनाने की कोशिश की गई है। यानी ‘बॉर्डर 2’ पिछली वाली ‘बॉर्डर’ का सीक्वेल नहीं है बल्कि यह उसी नाम वाली एक और फिल्म है जिसमें ‘बॉर्डर’ का फ्लेवर, उसकी खुशबू, उसकी झलक डाली गई है।
‘बॉर्डर’ में जे.पी. दत्ता ने युद्ध आधारित फिल्मों को दिखाने का जो ढांचा तैयार किया था, तब से अब तक हर ऐसी फिल्म कमोबेश उसी ढांचे पर ही खड़ी की जा रही है। इन फिल्मों में कुछ फौजी, उनकी बैक-स्टोरी, उनके घर की कहानी, उनका मोर्चे पर जाना, जूझ कर लड़ना, बच जाना या शहीद होना दिखाया जाता है और ‘बॉर्डर 2’ भी उसी पटरी पर चलती है। अलग-अलग लड़ाइयों को एक साथ पिरोते हुए इसमें आर्मी, नेवी और एयर फोर्स के तीन अफसरों-वरुण धवन, अहान शेट्टी, दिलजीत दोसांझ के साथ-साथ सनी देओल को लेकर कहानी का ताना-बाना बुना गया है। इस ताने-बाने में कुछ किरदार असली हैं तो कुछ काल्पनिक, कुछ घटनाएं असली हैं तो बहुत सारी काल्पनिक। लेकिन इनका मकसद एक ही है-इस देश की मिट्टी के बेटों को सलाम करना और इस काम में यह फिल्म कामयाब रही है-थोड़े उतार-चढ़ाव के साथ, थोड़ी कमियों-खूबियों के साथ।
फिल्म की कहानी जे.पी दत्ता की बेटी निधि दत्ता ने लिखी है। बड़ी कुशलता से उन्होंने बहुत सारे किरदारों व लड़ाइयों को एक-दूसरे से बांधा है। लेकिन असल तारीफ स्क्रीनप्ले व संवाद लिखने वाले अनुराग सिंह व सुमित अरोड़ा की होनी चाहिए जिन्होंने अपनी लिखाई से पूरी फिल्म को बांधे रखा है। अलग-अलग जगहों और समय में इधर-उधर जाती कहानी को थामना आसान नहीं होता लेकिन अनुराग और सुमित ने इस काम को बखूबी निभाया है। कई सीन बहुत ही बारीकी से लिखे गए हैं जो दर्शकों को किरदारों से, उनके साथ हो रही घटनाओं से जोड़ते हैं। संवाद बेहतर हैं, कई जगह गहरा असर छोड़ते हैं।
‘केसरी’ दे चुके निर्देशक अनुराग सिंह ने ‘बॉर्डर 2’ को दिलचस्प व असरदार बनाए रखने की अपनी कोशिश में ज़्यादातर जगहों पर सफल रहे हैं। चारों प्रमुख पात्रों की बैक स्टोरी, उनके किरदारों की विशेषताओं को बताते हुए उन्होंने भावुक क्षणों व हल्के-फुल्के पलों का संतुलन बनाए रखा है। कहीं यह फिल्म हंसाती है, कहीं एकदम से भावुक कर देती है तो कभी यह जोश दिलाने लगती है।
फिल्म का एक मज़बूत पक्ष इसकी कास्टिंग है। हरियाणवी व पंजाबी किरदारों में लिए गए कलाकार अपने विश्वसनीय काम से असर छोड़ते हैं। सनी देओल (जिन्हें फिल्म की कास्टिंग में ‘धर्मेंद्र का बेटा’ लिखा गया है) सधे हुए रहे हैं। इस उम्र में भी उनकी पर्सनैलिटी दमदार है। उनके प्रशंसक उनके जोशीले डायलॉग्स और एक्शन दृश्यों पर खुश होंगे। आश्चर्यजनक रूप से वरुण धवन ने बहुत अच्छा काम किया है। दिलजीत दोसांझ तो खैर हैं ही असरदार। अहान शेट्टी अपनी पहली फिल्म के चार साल बाद अब आए हैं। शायद उनकी एक्टिंग का कच्चापन फिल्म इंडस्ट्री वालों को भी पता है। सनी के साथी बने अनुराग अरोड़ा, सनी की पत्नी बनीं मोना सिंह, दिलजीत की पत्नी बनीं सोनम बाजवा, वरुण की पत्नी बनीं मेधा राणा, वरुण के ससुर बने संदीप शर्मा जैसे कलाकारों को अपना दम दिखाने का जब-जब मौका मिला, ये लोग चूके नहीं। बाकी कलाकार सही रहे।
‘बॉर्डर’ के गाने आज भी याद किए जाते हैं। गीत-संगीत ‘बॉर्डर 2’ का भी बुरा नहीं है लेकिन इनमें उस ज़मीनी अहसास की कमी है जो ‘बॉर्डर’ के गीतों में था। फिर भी ‘संदेसे आते हैं…’ के नए वर्ज़न को सुना-देखा जा सकता है। फिल्म का सबसे शानदार गीत ‘जिंद मेरिए…’ खुद निर्देशक अनुराग सिंह ने लिखा है। इस पंजाबी गीत के बोल लाजवाब हैं। मनोज मुंतशिर का ‘मिट्टी के बेटे…’ भी अच्छा है।
लेकिन ‘बॉर्डर 2’ को आप कमियों से परे भी नहीं कह सकते। पहली कमी तो यह कि इसकी तुलना ‘बॉर्डर’ से बिल्कुल न की जाए क्योंकि यह उस जैसी गहरी और सधी हुई नहीं है। 3 घंटे 20 मिनट की इसी लंबाई सचमुच काफी ज़्यादा है और कई जगह बेचैन करने लगती है। इतनी सारी लड़ाइयों को एक साथ लेने से यह गाढ़ी नहीं बन पाई है। अहान शेट्टी का नेवी वाला पूरा हिस्सा बहुत ही हल्का रहा। दिलजीत दोसांझ के फाइटर प्लेन वाले सीन भी अब बहुत बार देखे जा चुके हैं। सच तो यह है कि इस फिल्म के अंत में जब लड़ाई वाले सीन आते हैं तो उन सीन में नएपन की कमी के चलते फिल्म का असर कम होने लगता है। कुछ बहुत ही अनोखेपन के साथ उन्हें फिल्माया गया होता तो कुछ और बात होती। कहानी का कभी इधर, कभी उधर जाना भी कुछ टाइम बाद अखरने लगता है।
बावजूद इन कमियों के यह फिल्म इसलिए देखी जानी चाहिए कि यह संतुलित मनोरंजन देती है। इसे देखते हुए आपका मन और आंखें पर्दे पर ही रहते हैं। यह फिल्म सलाम करती है मिट्टी के उन बेटों को जिन्होंने खुद से पहले देश को रखा, साथ ही उनके परिवार वालों को भी जिन्होंने उन्हें अपने फर्ज़ पर टिके रहने का हौसला दिया। यह फिल्म सलाम करती है हिन्द को, हिन्द की सेना को।
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Release Date-23 January, 2026 in theaters
(दीपक दुआ राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त फिल्म समीक्षक हैं। 1993 से फिल्म–पत्रकारिता में सक्रिय। ‘सिनेयात्रा डॉट कॉम’ (www.cineyatra.com) के साथ–साथ विभिन्न समाचार पत्रों, पत्रिकाओं, वेब–पोर्टल, रेडियो, टी.वी. आदि पर सक्रिय दीपक ‘फिल्म क्रिटिक्स गिल्ड’ के सदस्य भी हैं।)

बिल्कुल सही पहली बॉर्डर का सीक्वल तो बिल्कुल नहीं हे
वैसी जान भी नहीं हे फिर भी एक बार देख सकते हैं
पहली और इस वाली को देखना ही तो पहले वाली फिर से देखी जा सकती हे।
Very nice
Very nice but pehle jaise border ke mukable nahi hai phir bhi sahi h