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वेब-रिव्यू: शौर्य और दुस्साहस की गाथा ‘ऑपरेशन सफेद सागर’

Deepak Dua by Deepak Dua
2026/08/07
in CineYatra, फिल्म/वेब रिव्यू
0
वेब-रिव्यू: शौर्य और दुस्साहस की गाथा ‘ऑपरेशन सफेद सागर’
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-दीपक दुआ… (This review is featured in IMDb Critics Reviews)

कारगिल वॉर के दौरान उड़ान भरने को आतुर एक फाइटर पायलट को उसका कमांडर यह कह कर रोकने की कोशिश करता है कि उसकी पत्नी प्रेग्नेंट है। वह युवा पायलट, जिसे यह खबर अभी-अभी मिली, पल भर को रुकता है और कहता है, ‘यह मेरा पर्सनल मैटर है सर, यह मुझे उड़ने से रोकने का कारण नहीं हो सकता।’ सोचिए, क्या तो जज़्बा रहता है हमारे जवानों में। मालूम है कि दुनिया की सबसे ऊंची और खतरनाक पहाड़ियों पर आ जमे शत्रुओं पर रात के अंधेरे में घने बादलों से गुज़रते हुए बम बरसाते समय उनकी जान भी जा सकती है लेकिन वे रुके नहीं, थके नहीं। यही बात हमारी सेना को अलग बनाती है। इस बात का यथार्थ चित्रण इस वेब-सीरिज़ ‘ऑपरेशन सफेद सागर’ (Operation Safed Sagar) को उन फिल्मों से अलग बनाता है जिनमें एयरफोर्स वाले ‘फिल्मी’ कारनामे करते दिखाई देते हैं।

यह सच है कि 1999 में जब भारतीय प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी अमन की आशा लेकर पाकिस्तान गए थे ठीक उसी समय पाकिस्तानी आर्मी चीफ जनरल परवेज़ मुशर्रफ की शह पर पाकिस्तानी सैनिक आतंकियों के भेस में हिन्दुस्तानी चौकियों पर कब्जे कर रहे थे। उन्होंने ऊंचाई पर होने का फायदा उठाते हुए हमारे सैंकड़ों जवानों को मारा। तब भारतीय वायुसेना ने आसमान से आग बरसा कर उन्हें शांत किया। कारगिल युद्ध के अलग-अलग पहलुओं पर बहुत कुछ बन कर सामने आया है। इंडियन एयरफोर्स के उस ऑपरेशन ‘सफेद सागर’ को नेटफ्लिक्स पर आई यह वेब-सीरिज़ (Operation Safed Sagar) विस्तार से दिखाती है।

तकरीबन एक-एक घंटे के छह एपिसोड में फैली इस सीरिज़ की कहानी को लिखने वालों ने बहुत कायदे से फैलाया है। भटिंडा एयरफोर्स स्टेशन में ट्रेनिंग ले रहे पायलटों, उधर पाकिस्तान में मिल रहे दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों और वहीं कारगिल की चोटियों पर कब्जे की जुगत में आगे बढ़े रहे पाकिस्तानियों को दिखाती यह कहानी जब आगे बढ़ती है तो कभी भारतीय सेना के पलटवार को दिखाती है तो कभी पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ और उनके सेना प्रमुख परवेज़ मुशर्रफ की रस्साकशी को। कभी यह हमें पाकिस्तान और चीन के बीच ले जाती है तो कभी उस समय की अमेरिका की सोच और कारनामों तक। सच तो यह है कि इस कहानी में उस वक्त के किसी भी ज़रूरी पहलू को अनदेखा नहीं किया गया है। यही कारण है कि अधिकांश तथयों और थोड़ी-सी कल्पना से मिल कर जो पटकथा पर्दे पर नज़र आई है वह इक्का-दुक्का मौकों को छोड़ कर लगातार बांधे रखती है। सिनेमा का सधापन इसी पर निर्भर करता है कि दर्शक बिना थमे, बिना रुके उसे लगातार देख जाए। यह वेब-सीरिज़ (Operation Safed Sagar) यहां आकर सफल हो जाती है।

निर्देशक ओनि सेन का काम बेहद प्रभावी रहा है। उनके बनाए कई दृश्य मन छूते हैं। कलाकारों से सधा हुआ काम निकलवाना हो या दृश्यों को वास्तविक बनाना, हर जगह उन्होंने अपनी छाप छोड़ी है। उड़ान के सीन, उनके स्पेशल इफैक्ट, लोकेशन आदि इतने प्रभावी हैं कि लगता ही नहीं हम कोई सिनेमा देख रहे हैं। ऐसा लगता है कि हम इन किरदारों के साथ चल रहे हैं, उनके साथ कॉकपिट में उड़ रहे हैं, उनकी तरह महसूस कर रहे हैं। यह लेखकों, निर्देशक और पूरी टीम की सफलता है। बैकग्राउंड म्यूज़िक हो या सिनेमैटोग्राफी, सब शानदार रहा है। बहुत गहराई से यह सीरिज़ इस बात को भी रेखांकित करती है कि हमारे फाइटर पायलट कितनी बारीकी से एक-एक चीज़ पर गौर करते हुए सटीक काम कर जाते हैं। बड़ी बात यह कि इस सीरिज़ (Operation Safed Sagar) में ‘बॉलिवुडिया’ फिल्मों जैसी वे खुराफातें भी नहीं हैं जिन्हें अक्सर फिल्मी पर्दे पर दिखा कर हमारे जवानों का मज़ाक उड़ाया जाता है। यही कारण है कि इसे देखने बैठिए तो फिर इसे खत्म करके ही उठेंगे, कदाचित नम आंखों के साथ।

(रिव्यू : हवाई-वीरों की हवा-हवाई कहानी ‘फाईटर’)

हर कलाकार ने शानदार काम किया है। सिद्धार्थ, अंजन श्रीवास्तव, विनय पाठक, जिम्मी शेरगिल, अभय वर्मा, मिहिर आहूजा, तारुक रैना, अर्णव भसीन, आदिल हुसैन, मनु ऋषि चड्ढा, वरुण सोबती, एस.एम. ज़हीर, ललित पारिमू, अनंत महादेवन व अन्य सभी कलाकारों ने अपने किरदारों की सीमाओं को समझते हुए उन्हें अपने भीतर उतारा है। कुछ कलाकारों ने अंडरप्ले करते हुए असर छोड़ा है तो वहीं मनु ऋषि, विनय पाठक, आदिल हुसैन, जिम्मी शेरगिल आदि का काम देर तक याद रहने लायक बन पड़ा है। अभिनेत्रियों को इस कहानी में ज़्यादा जगह नहीं मिली लेकिन दीया मिर्ज़ा, अमृता बागची, प्राजक्ता कोली जैसी अभिनेत्रियों ने भरपूर साथ निभाया।

इस सीरिज़ (Operation Safed Sagar) को देखते हुए न जाने कितनी बार आंखें नम होती हैं, कितने ही दृश्यों और संवादों पर हाथ सैल्यूट की मुद्रा में उठता है, सिर श्रद्धा से झुकने लगता है। अंदर कहीं यह महसूस होता है कि ऐसी कहानियां बार-बार कही जानी चाहिएं, सुनी, सुनाई, देखी और दिखाई जानी चाहिएं ताकि हमें यह अहसास हो कि सरहद के भीतर कुछ भी करने की आज़ादी हमें इसलिए मिल पा रही है क्योंकि सरहद पर कई छातियां हमारे लिए तनी रहती हैं। और हां, आखिरी एपिसोड के अंत में कुछ नाम आएंगे, उन्हें पढ़ना मत भूलिएगा।

(रेटिंग की ज़रूरत ही क्या है? रिव्यू पढ़िए और फैसला कीजिए कि यह कितनी अच्छी या खराब है। और हां, इस पोस्ट के नीचे कमेंट कर के इस रिव्यू पर अपने विचार ज़रूर बताएं।)

Release Date-07 August, 2026 on Netflix

(दीपक दुआ राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त फिल्म समीक्षक हैं। 1993 से फिल्म–पत्रकारिता में सक्रिय। ‘सिनेयात्रा डॉट कॉम’ (www.cineyatra.com) के साथ–साथ विभिन्न समाचार पत्रों, पत्रिकाओं, वेब–पोर्टल, रेडियो, टी.वी. आदि पर सक्रिय दीपक ‘फिल्म क्रिटिक्स गिल्ड’ के सदस्य भी हैं।)

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