-दीपक दुआ… (This review is featured in IMDb Critics Reviews)
कहानी-1-असम में एक किशोर अपू का कुत्ता मोमो अचानक गायब हो गया है। पुलिस अंकल का कहना है कि कुछ लोगों को कुत्तों का मांस पसंद है इसलिए इस इलाके से कुत्तों की स्मगलिंग हो रही है। लेकिन तेज दिमाग वाला अपू हार नहीं मानता और आधुनिक तकनीक के सहारे मोमो को तलाशने निकल पड़ता है। कहानी-2-बिहार में एक किशोर श्रमिक प्रिंस अचानक गायब हो गया है। पुलिस का कहना है कि होगा यहीं कहीं, कल तक आ जाएगा। लेकिन तेज दिमाग वाला उसका कुत्ता ऑस्कर हार नहीं मानता और अपने साहस व बुद्धि के सहारे प्रिंस को तलाशने निकल पड़ता है।
कहिए है न दिलचस्प कहानियां? और इससे भी दिलचस्प यह है कि दो अलग-अलग जगहों पर चल रहीं ये कहानियां न तो आपस में टकराती हैं और न ही इनके बीच किसी किस्म का कोई नाता है। इसके बावजूद ऐसा नहीं लगता कि हम दो जुदा चीज़ें देख रहे हैं। एक दर्शक के तौर पर आप इन दोनों कहानियों को देखना शुरू करते हैं और पता ही नहीं चलता कि कब आप इनके संग चलने लगते हैं। यह लेखक अमित राय की लेखनी का कमाल है। अपने खो चुके कुत्ते को तलाशने की कहानी तो फिर भी अजीब नहीं लगती लेकिन अपने खो चुके मालिक को तलाशने के एक कुत्ते के प्रयासों की कहानी पर हैरान हुआ जा सकता है कि कोई लेखक इस तरह से भी सोच सकता है। अमित राय की कलम को सलाम है।
इंसान के सबसे पुराने और वफादार साथी-कुत्ते के इर्दगिर्द घूमती इन कहानियों के किरदार भी अमित ने बहुत सध कर गढ़े हैं। किशोर अपू पूरी फिल्म में कहीं भी वैसी पकी हुई बातें नहीं करता जो अक्सर लेखक-निर्देशक अपने बाल-कलाकारों के मुंह से निकलवा देते हैं। अपू की मां हो, ट्यूशन वाली दीदी, दीदी का अफसर मामा या पुलिस वाले, सभी के किरदार बेहद विश्वसनीय ढंग से लिखे गए हैं। उधर बिहार में किशोर श्रमिकों, उन्हें पढ़ाने वाले टीचर, पुलिस के लोग आदि भी हमें अपने आसपास के ही लोग लगते हैं। एक बड़ी बात इन कहानियों में यह भी है कि दोनों गायब हुए प्राणी-कुत्ता और किशोर श्रमिक, समाज के हाशिए पर बैठे उस वंचित वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं जिनके लिए समाज अक्सर चिंतित नहीं होता और सिस्टम उनकी परवाह नहीं करता। बावजूद इसके, मोमो को तलाशते अपू और प्रिंस को तलाशते ऑस्कर भी इसी समाज के उस वर्ग को दर्शाते हैं जो अपने साथ-साथ दूसरों की भी परवाह करता है, उनके लिए फिक्रमंद होता है। न जाने क्यों इस फिल्म (Ohh My Dog) को देखते हुए मुझे ‘गुलाल’ में पीयूष मिश्रा के लिखे गीत ‘आरंभ है प्रचंड…’ की पंक्ति ‘यह भागवत का सार है कि युद्ध ही तो वीर का प्रमाण है…’ याद आती रही। अपू और ऑस्कर के प्रयास किसी वीर के युद्ध से कम नहीं दिखते। निर्देशक इस फिल्म में हमारे आसपास फैली बुराइयों और बेईमानियों के अलावा अच्छाइयों और ईमानदारियों का सफल चित्रण कर पाए हैं जहां कुछ इंसान पैसों के लिए अपना ईमान और दूसरों की जान बेचने पर तुले हैं तो कुछ स्वार्थ छोड़ कर दूसरों की मदद में लगे हैं।
दो बेहद सधी हुई फिल्में ‘रोड टू संगम’ (2009) और ‘ओएमजी 2’ (2023) लिख व निर्देशित कर चुके अमित राय को कलम और कैमरे पर बराबर पकड़ बनानी आती है। इस फिल्म (Ohh My Dog) को देखते हुए बतौर निर्देशक उनके काम पर हैरान हुआ जा सकता है। किस तरह से तो उन्होंने दृश्यों की कल्पना की होगी, किस तरह से उन्हें फिल्माया होगा, खासतौर से कुत्तों से काम निकलवाना उनके लिए कितना मुश्किल रहा होगा। जिस तरह से अमित ने दोनों कहानियों को आपस में टच न करते हुए भी एक-दूसरे में गूंथा है, वह भी उनके उम्दा निर्देशक होने का परिचय देता है।
(रिव्यू-रख विश्वास, यह फिल्म है खास)
ऑस्कर बने ब्रूनो का काम बेहतरीन रहा है। पंकज त्रिपाठी, गीता अग्रवाल शर्मा, बुल्लू कुमार, पवन मल्होत्रा, राजेश कुमार, सुलख्यना बरुआ, पल भर को आए शशि वर्मा आदि तमाम कलाकारों का काम बेहद विश्वसनीय व प्रभावी रहा है। अपू बने माही राय अपने असरदार अभिनय से लुभाते हैं। उन्हें सर्वश्रेष्ठ बाल-कलाकार का राष्ट्रीय पुरस्कार मिलना चाहिए। राष्ट्रीय पुरस्कार तो इस फिल्म (Ohh My Dog) को अन्य कई वजहों से भी मिलने चाहिएं। गीत-संगीत लुभावना नहीं है लेकिन वह कहानी में घुल-मिल गया है। कहीं भोजपुरी तो कहीं असमिया गीत आकर कहानी को गाढ़ा करते हैं। बैकग्राउंड म्यूज़िक दृश्यों का असर बढ़ाता है और कैमरा बहुत सधे हुए तरीके से अपना काम कर जाता है।
इमोशनल थ्रिलर का स्वाद लिए इस फिल्म की शुरुआत ‘धर्मो रक्षति रक्षितः’ से होती है। यानी जो ‘धर्म’ (सत्य, न्याय, नैतिकता) की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है। इस फिल्म को देखने के बाद लगता है कि ‘सिनेमा रक्षति रक्षितः’। इस किस्म की फिल्में आकर सिनेमा की रक्षा करती है, लोगों में अच्छे सिनेमा के प्रति विश्वास जगाती, बढ़ाती हैं। जब ऐसे प्रयास होते हैं तो सिनेमा भी इन्हें बनाने वालों की रक्षा करता है, उनकी प्रतिष्ठा बढ़ाता है। इस फिल्म (Ohh My Dog) को देखिए, अपने साथ, अपनों के साथ, बच्चों, बड़ों, परिवार, दोस्तों के साथ।
(रेटिंग की ज़रूरत ही क्या है? रिव्यू पढ़िए और फैसला कीजिए कि यह कितनी अच्छी या खराब है। और हां, इस पोस्ट के नीचे कमेंट कर के इस रिव्यू पर अपने विचार ज़रूर बताएं।)
Release Date-07 August, 2026 in theaters
(दीपक दुआ राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त फिल्म समीक्षक हैं। 1993 से फिल्म–पत्रकारिता में सक्रिय। ‘सिनेयात्रा डॉट कॉम’ (www.cineyatra.com) के साथ–साथ विभिन्न समाचार पत्रों, पत्रिकाओं, वेब–पोर्टल, रेडियो, टी.वी. आदि पर सक्रिय दीपक ‘फिल्म क्रिटिक्स गिल्ड’ के सदस्य भी हैं।)

