अरविंद अरोड़ा… (This review is featured in IMDb Critics Reviews)
भारतीय सिनेमा के इतिहास में अब तक बनी फिल्मों में हमारे समाज से जुड़े बहुत से मुद्दों पर बातें कीं गई हैं। लेकिन जिस रंगमंच से हमारी लगभग सभी भाषाओं के सिनेमा उद्योगों को बहुत से शानदार कलाकार मिले हैं, उस विधा को केंद्र में रख कर बनी फिल्में गिनी-चुनी ही रही हैं। उस पर भी रंगमंच के एक व्यापक लोक-रूप यानी ‘रामलीला मंचन’ पर आधारित फिल्में तो शायद ही बनी हों। इसी निर्वात को भरने का प्रयास करती है निर्देशक राकेश चतुर्वेदी ओम की यह फिल्म ’मंडली’ (Mandali) जो अपने शीर्षक के ही अनुरूप उत्तर प्रदेश के ब्रज क्षेत्र के एक कस्बे की रामलीला मंचन मंडली से जुड़े लोगों की ज़िंदगियों पर एक करीबी निगाह डालती है।
‘मंडली’ (Mandali) एक ऐसी कहानी है जो भारतीय परंपरा के भीतर छुपे सामाजिक और नैतिक प्रश्नों को सहज, मानवीय, और सजीव ढंग से पर्दे पर लाती है। स्थानीय रामलीला मंचनों में सालों से अपने चाचा की मंडली में लक्ष्मण की भूमिका निभाते आ रहे एक किरदार पुरुषोत्तम चौबे के नज़रिए से कही गई यह कहानी न केवल रामलीला मंचन की सांस्कृतिक आत्मा को पुनर्स्थापित करती है, बल्कि उन कलाकारों के अंदरूनी संघर्षों, आशाओं और कठिनाइयों को भी बारीकी से प्रतिबिंबित करती है जो इस कला को अपनी पहचान जैसा मानते हैं और जिस संस्कृति का वे अभिभावक हैं, उसके संरक्षण की लड़ाई लड़ते हैं।
हमारी दुनिया के ही एक हिस्से यानी रामलीला की मंडलियों में भी बाक़ी दुनिया की ही तरह किस तरह सब कुछ परफेक्ट नहीं होता है, और इन मंडलियों के मंचनों को देखने जाने वाली हमारे देश और समाज की जनता के एक हिस्से के अंदर छुपे पाखंडी रवैये के साथ तालमेल बैठाने के लिए उन मंडलियों को उसी मंच पर फ़ूहड़ और घटिया मनोरंजन का घालमेल करने पर किस तरह मजबूर होना पड़ता है, इस विषय पर मुंशी प्रेमचंद ने ’रामलीला’ नाम से एक कहानी लिखी थी जिसकी प्रासंगिकता आज और भी ज़्यादा बढ़ चुकी है। बेहद सहज तरीके से कई असहज प्रश्नों को उठाने वाली वह कहानी ’रामलीला’ एक तरह से ’मंडली’ की आत्मा है। लेकिन लेखक-निर्देशक राकेश चतुर्वेंदी ओम की ख़ूबी इस बात में है कि उस कहानी से बिल्कुल अलग आज के कालखंड और कलेवर में पेश की गई यह फिल्म ’मंडली’ (Mandali) देखते समय आप रामलीला मंचनों पर हावी होते दबावों से वही तकलीफ और दर्द अपने अंदर महसूस करते हैं जिससे ’रामलीला’ कहानी को कहने वाला टीनएजर किरदार गुज़रता है।
यह फिल्म ‘मंडली’ (Mandali) अपनी अहम डिटेलिंग और बारीकियों को लेकर कितनी चौकस और सजग है, इसका खुशनुमा अहसास आपको तब होता है जब आप इसके कई दृश्यों में पुरुषोत्तम के हाथों में बरेली के सुविख्यात नाटककार पंडित राधेश्याम कथावाचक की लिखी हुई ’राधेश्याम रामायण’ देखते हैं। तारीख़ गवाह है कि पूरे ब्रज क्षेत्र में रामलीला मंचनों को एक पुख्ता बुनियाद मुहैया करवाने में जितनी बड़ी भूमिका सिर्फ इस एक किताब ने निभाई है, उसका एक अंश भी भगवान राम के नाम को सिक्के की तरह सियासत के बाज़ार में बेच कर अपनी तिजोरियां भरने वाले न कभी कर सके हैं और न कभी कर पाएंगे। और यह सिर्फ एक इत्तेफाक नहीं है कि ’मंडली’ एक सरसरी ही सही लेकिन तीखी निगाह उन सियासी ताकतों के ऊपर भी डालती है जिनका मंतव्य रामलीला मंचनों को भी सिर्फ अपने राजनैतिक हित साधने के लिए इस्तेमाल करना भर होता है।
साथ ही यह फिल्म ‘मंडली’ (Mandali) मौजूदा वक्त की दुनिया को लेकर भी जितनी बेफिक्री रखती है वह भी इसे सच की ज़मीन से जोड़े रखता है। फिल्म की फीमेल लीड यानी पुरुषोत्तम की मंडली में मेकअप आर्टिस्ट का काम करने वाली लड़की न सिर्फ “राधे-राधे ब्रो“ कह कर अपने दोस्तों से विदा लेती है, बल्कि अपने टूटे हुए दिल का गम भुलाने के लिए सहेलियों के साथ सिगरेट का गहरा कश खींचते हुए हवा में धुएं के छल्ले भी क्या ख़ूब छोड़ती है।
लीड पेयर के तौर पर अभिषेक दुहान और आंचल मुंजाल ने अपनी भूमिकाओं को अच्छी तरह निभाया है और वे साथ में ख़ूबसूरत भी लगते हैं। हालांकि तेज़ रफ्तार क़िस्सागोई के चलते कहीं-कहीं फिल्म ’मंडली’ (Mandali) के सिरे छूटते से महसूस होते हैं लेकिन विनीत कुमार, कंवलजीत, अलका अमीन, बृजेंद्र काला, अश्वत्थ भट्ट, सहर्ष कुमार शुक्ला और रजनीश दुग्गल जैसे मंजे हुए कलाकार अपने अनुभव से इसे संभाले रखते हैं। इसके साथ ही चंद्रशेखर यादव का प्रोडक्शन डिज़ाइन ब्रज क्षेत्र की एक कस्बाई रामलीला मंचन मंडली के परिवेश को जिस तरह से पर्दे पर उतार कर लाता है, वह भी इसे नैसर्गिकता का एक अच्छा पुट देता है।
अमेज़न प्राइम वीडियो के साथ ही दूरदर्शन के निःशुल्क वेव्स ओटीटी ऐप पर भी स्ट्रीम हो रही ’मंडली’ (Mandali) को मौजूदा वक्त के हिंसा के प्यासे दर्शक वर्ग का बेशक एक खास हिस्सा ही देखे, लेकिन लंबे समय में यह फिल्म कायदे के कद्रदानों द्वारा देखी और सराही जाती रहेगी, इसमें कोई शक नहीं है।
(फिल्म ‘मंडली’ थिएटरों में अक्टूबर, 2023 में रिलीज़ हुई थी। उसी साल यह गोआ में होने वाले इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल ऑफ इंडिया यानी ‘इफ्फी’ के प्रतिष्ठित ‘इंडियन पैनोरमा’ खंड में भी चुनी गई थी। अब यह फिल्म ओ.टी.टी. पर आई है।)
(सिनेमा पर पैनी व गहरी दृष्टि रखने वाले अरविंद अरोड़ा कई मीडिया संस्थानों के लिए काम कर चुके हैं।)

