Friday, 10 August 2018

रिव्यू-फीकी जलेबी ‘विश्वरूप 2’

-दीपक दुआ...
डियर कमल हासन,
2013 में जब आप विश्वरूपलेकर आए थे तो अपन ने उसे साढ़े तीन स्टार से नवाज़ा भी था। यह रहा उस फिल्म की समीक्षा का लिंक-
उस फिल्म के अंत में जब आप (मेजर विसाम अहमद काश्मीरी) ने यह साफतौर पर कह दिया था कि जब तक उमर ज़िंदा है या मैं, कुछ खत्म नहीं होगा, यह कहानी चलती ही रहेगी’, तो लगा था कि आपके दिमाग में ज़रूर आगे की कहानी होगी और जल्द ही आप उसे लेकर भी आएंगे। पर जब आपने विश्वरूप 2’ को लाने में साढ़े पांच साल लगा दिए तो शक होने लगा था कि आपके पास कहने-बताने को कुछ है भी या फिर सीक्वेल लाने का वह ऐलान खोखला ही था। और अब आपकी विश्वरूप 2’ को देख कर तो यही लगता है कि आपके पतीले में था कुछ नहीं। बस, आपने ज़ोर-ज़ोर से कड़छी हिलाई है ताकि लोग झांसे में जाएं।

रिव्यू-मसाले और गहराई ‘विश्वरूप’ (पार्ट-1) में

-दीपक दुआ...
सब से पहले तो यही बात साफ हो जाए कि इस फिल्म में ऐसा एक भी सीन या संवाद नहीं है जिस पर कोई भी समझदार आदमी एतराज कर सके। अब आप चाहें तो यह सवाल उठा सकते हैं कि जो लोग ऐसी फिल्मों पर एतराज करते हैं, वे होते ही कितने समझदार हैं?
चलिए, बात आगे बढ़ाई जाए। हॉलीवुड से आने वाली फिल्मों में हमेशा यह दिखाया जाता है कि जब भी दुनिया के किसी भी हिस्से में किसी भी किस्म की-आतंकवादियों से, प्रकृति की तरफ से या यहां तक कि अंतरिक्ष की ओर से भी कोई मुसीबत आती है तो कोई कोई अमेरिकी हीरो ही उससे निबटता है और दुनिया को बचाने का महान काम करता है। कमल हासन ने अपनी इस फिल्म से हॉलीवुड की इस महानता को चुनौती दी है क्योंकि इस फिल्म का हीरो भारतीय है और अमेरिका को बचाने के उसके मिशन में अमेरिकी पुलिस, एफ.बी.आई. वगैरह-वगैरह उसके सहयोगी हैं।

Saturday, 4 August 2018

रिव्यू-हसीन पलों का ‘कारवां’

-दीपक दुआ...
अपने पिता, अपनी नौकरी और अपने-आप से नाखुश बेटे को पता चला कि उसके पिता की एक हादसे में मौत हो गई है। लेकिन पिता की जगह गई किसी औरत की बॉडी और पिता की बॉडी पहुंच गई उस औरत की बेटी के पास। अब बेटा निकला है अपने दोस्त के साथ उस औरत के शहर की तरफ। रास्ते में उस औरत की बेटी को भी उसे लेना है। कई अनुभव, कई पंगे और कई बदलाव होते हैं इस सफर में।

Friday, 3 August 2018

रिव्यू-सपनों के पन्ने पलटता ‘फन्ने खां’

-दीपक दुआ...
फन्ने खां खुद तो बड़ा गायक बन नहीं पाया लेकिन अपनी बेटी लता को बड़ी गायिका बनाने के लिए वह कुछ भी करने को तैयार है। एक दिन उसकी टैक्सी में नामी सिंगर बेबी सिंह बैठती है और वो उसे किडनैप कर लेता है। फिरौती में वह चाहता है कि उसकी बेटी को गाने का मौका दिया जाए। लेकिन पासा पलट जाता है और...!

रिव्यू-इस ‘मुल्क’ में इतनी भी गर्म हवा नहीं

-दीपक दुआ...
एक ऐसा परिवार जिसने 1947 के बंटवारे के वक्त मज़हब और मुल्क में से मुल्क को चुना, उसकी देशभक्ति पर आप कैसे उंगली उठा सकते हैं...?

यह कैसा तर्क हुआ? इसका मतलब सन् 47 में पाकिस्तान जाने वाले सारे मुसलमान ज़बर्दस्त देशभक्त हैं तो फिर पाकिस्तान छोड़ कर आने वाले सारे हिन्दू देशद्रोही ही हुए? भई, वो भी तो अपने (हिन्दू) मज़हब के लिए अपना (पाकिस्तान) मुल्क छोड़ कर आए थे ...!