Thursday, 17 October 2019

रिव्यू-या रब, यह कैसी फिल्म बना दी ’#यारम’...!

-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
सिद्धांत कपूर--पप्पा, मेरे लिए कोई पिक्चर बनाओ न। देखो , श्रद्धा कितनी बड़ी स्टार बन गई जबकि मुझे कोई जानता तक नहीं।
शक्ति कपूर--अबे ढाक की चिकी, पिच्चर तो मैंने श्रद्धा के लिए भी नहीं बनाई, वो भी तो खुद ही चली है, तू भी चल ले।
सिद्धांत--पप्पा, मुझे कुछ नहीं पता। या तो आप मेरे लिए पिक्चर बनाओ वरना मैं मम्मी को बता दूंगा कि आप कहां-कहां आं-ऊं करते रहते हो।
शक्ति--धमकी दे रा है, तेरी तो...*@#$... चल बनवाते हैं किसी से। पकड़ते हैं किसी ऐसे को जिसे तेरे एक्टिंग के टेलेंटके बारे में पता हो वरना तुझे लेकर कौन फिल्म बनाएगा। शूटिंग भी पूरी बाहर जाकर करेंगे और इसी बहाने थोड़ा-बौत आं-ऊं भी कर आएंगे।

Thursday, 10 October 2019

रिव्यू-हल्की गुलाबी ‘द स्काइ इज़ पिंक’

-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
एक अजीब जेनेटिक बीमारी लेकर 1996 में जन्मी आयशा का छह महीने की उम्र में बोन-मैरो बदला गया। वह ज़िंदा तो रही लेकिन उसके फेफड़े बहुत कमज़ोर हो गए। इतने ज़्यादा कि जीने के लिए उसे रोज़ संघर्ष करना पड़ता था। अपने इन्हीं संघर्षों को उसने 15 बरस की उम्र से दुनिया को बताना शुरू किया। वह एक नामी मोटिवेशनल स्पीकर बनी और एक किताब भी लिख डाली। लेकिन इस किताब के छप कर आने के अगले ही दिन 18-19 उम्र में वह चल बसी।

Wednesday, 2 October 2019

रिव्यू-यह ‘वॉर’ है मज़ेदार

-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
अय्यारीफिल्म याद है आपको? सिद्धार्थ मल्होत्रा-मनोज वाजपेयी वाली उस फिल्म में आर्मी एजेंटों में से चेला अचानक से गद्दार हो गया था और उसका गुरु उसे तलाशने और खत्म करने निकल पड़ा था। लेकिन वो फिल्म इस कदर घिसी-पकी हुई थी कि मुझे रिव्यू-बिना तैयारी कैसी ‘अय्यारी’ लिखना पड़ा था। लगता है अपने कलपने का असर हुआ है क्योंकि इस फिल्म में अय्यारीसरीखी ही कहानी को बहुत ही कायदे से, निखार के, संवार के, चमका के, इस कदर स्टाइलिश तरीके से परोसा गया है कि आप इसकी चकाचौंध में खोए बिना नहीं रह पाते। बस फर्क इतना है कि इस फिल्म में गुरु (हृतिक रोशन) गद्दार हो गया है और चेला (टाइगर श्रॉफ) उसकी तलाश में है।

Friday, 20 September 2019

रिव्यू-एंटरटेनमैंट की पिच पर चला ट्रैक्टर-‘द ज़ोया फैक्टर’

-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
25 जून, 1983-इंडियन टीम ने क्रिकेट वर्ल्ड कप जीता और ठीक उसी दिन सोलंकी परिवार में एक लड़की ज़ोया जन्मी। क्रिकेट के दीवाने पिता ने उसे लकी-चार्म मान लिया। बड़ी होकर काम के सिलसिले में यह लड़की इंडियन क्रिकेटर्स से मिली और हारती हुई टीम जीतने लगी। सबने मान लिया कि ज़ोया का लक-फैक्टर ही टीम को जिता रहा है। पर क्या सचमुच ऐसा है...?

कहानी दिलचस्प है, हट कर है, और शायद इसीलिए 2008 में आया अनुजा चौहान का लिखा अंग्रेज़ी उपन्यास ज़ोया फैक्टर’ (अंग्रेज़ीदां पाठकों ने) काफी पसंद किया था। बरसों तक विज्ञापनों की दुनिया में काम करने और क्रिकेटर्स के अजीबोगरीब अंधविश्वासों को करीब से देखने वाली अनुजा ने इस उपन्यास में यह सवाल उठाया था कि क्या महज़ किसी एक शख्स के लक-फैक्टर से टीम इंडिया की परफॉर्मेंस बदली जा सकती है? साथ ही हर चमत्कार को नमस्कार करने की आम लोगों की प्रवृत्ति को भी उन्होंने कटघरे में खड़ा किया था। पर क्या यह ज़रूरी है कि किसी बेस्टसेलर उपन्यास पर बनी फिल्म भी उतनी ही उम्दा और बेस्ट हो...?