Sunday, 24 May 2020

बुक रिव्यू-कलम तोड़ ‘बाग़ी बलिया’

-दीपक दुआ...
बलिया-बिहार को छूता उत्तर प्रदेश का आखिरी जिला। भृगु महाराज की धरती। वामन अवतार में आए विष्णु को तीनों लोक दान में दे देने वाले बलि महाराज की धरती। छात्र राजनीति का अखाड़ा। यहीं के एक कॉलेज में पढ़ते दो जिगरी यार-संजय और रफीक। संजय छात्र संघ का अध्यक्ष बनना चाहता है और रफीक उसे अध्यक्ष बनाना। लेकिन यह इतना आसान भी तो नहीं। राजनीति के चालाक खिलाड़ी कुछ ऐसी साज़िशें रचते हैं कि सब उलट-पुलट हो जाता है। इन हालातों से कैसे निबटते हैं ये दोनों, यही कहानी है सत्य व्यास के इस चौथे उपन्यास बाग़ी बलियाकी।

Saturday, 16 May 2020

ओल्ड रिव्यू-सच के जुदा चेहरे दिखाती ‘तलवार’


-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
15-16 मई, 2008 की उस रात दिल्ली से सटे नोएडा के जलवायु विहार के उस फ्लैट में सचमुच क्या हुआ था, यह या तो मरने वाले जानते थे या मारने वाले जानते हैं। सालों तक चली तहकीकात में कुछ भी सामने नहीं आया। या फिर आने नहीं दिया गया? कहते हैं कि सच के कई चेहरे होते हैं। 14 साल की आरुषि और उसके अधेड़ उम्र नौकर हेमराज के कत्ल के बाद ऐसे कई चेहरे सामने आए और जिस को जो चेहरा माफिक लगा, उसने उसी को अपना लिया। इस फिल्म के आने से पहले क्राइम जर्नलिस्ट अविरूक सेन की किताब आरुषिको पढ़ने के बाद यह उम्मीद जगी थी कि थोड़ी-सी मेहनत और की गई होती तो इस केस का चेहरा कुछ और होता और काफी मुमकिन है कि अपनी ही मासूम बेटी और अधेड़ नौकर के कत्ल का आरोप झेल रहे तलवार दंपती बेदाग होते।

Monday, 27 April 2020

बुक रिव्यू-आधी हकीकत आधा फसाना सुनाती ‘हज़ारों ख्वाहिशें’


-दीपक दुआ... 
कॉलेज लाइफ की कहानियां, होस्टल लाइफ की कहानियां, दिल्ली शहर की कहानियां, आई..एस. बनने वालों की कहानियां... हाल के बरसों में नई वाली हिन्दी में इन विषयों पर इतना कुछ चुका है कि अब ऐसे किसी विषय पर आए उपन्यास को छूने का भी मन करे। हिन्द युग्म से आए इस उपन्यास को भी पढ़ना शुरू किया तो लगा कि सत्य व्यास के बनारस टॉकीज़और नीलोत्पल मृणाल के डार्क हॉर्सको पढ़ने के बाद इसमें नया कुछ नहीं मिलने वाला। लेकिन धीरे-धीरे यह कहानी अपनी एक अलग राह तलाशने लगती है और बहुत जल्द उस राह पर सरपट भी हो जाती है।

Tuesday, 21 April 2020

ओल्ड रिव्यू-अनछुए विषय पर स्वस्थ मनोरंजन ‘विकी डोनर’

-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
किसी संवेदनशील विषय को कैसे उठाया जाता है इसे निर्देशक शुजित सरकार करीब सात साल पहले आई अपनी पिछली और पहली फिल्म यहांमें दिखा चुके हैं। कश्मीर के हालात की पृष्ठभूमि में एक आतंकवादी की बहन और एक फौजी अफसर की प्रेम कहानी दिखाने के बाद अपनी इस फिल्म में शुजित स्पर्म डोनेशन जैसे अनछुए विषय की पृष्ठभूमि में एक पंजाबी लड़के और एक बंगाली लड़की की लव स्टोरी लेकर आए हैं।

Thursday, 16 April 2020

वेब-रिव्यू : बिना कहानी जम गई ‘पंचायत’

-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
अबे गांव में नौकरी मिल रही है। यही उम्र है कर ले एडवेंचर।
सिंपल ज़िंदगी चाहिए यार। नहीं करना मुझे एडवेंचर।
लेकिन पढ़ाई-लिखाई में औसत रहे शहरी बाबू अभिषेक त्रिपाठी अब बेमन से पहुंच गए हैं जिला बलिया के गांव फुलेरा के पंचायत सचिव बन कर। दिन भर पंचायत के सरकारी काम करते हैं और रात में एम.बी.. की तैयारी। कई महीने बाद भी गांव को तो वह नहीं अपना पाए अलबत्ता गांव ने उन्हें ज़रूर अपना लिया है।