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रिव्यू: प्रेम-रस से सराबोर ‘कृष्णावतारम’

Deepak Dua by Deepak Dua
2026/05/11
in CineYatra, फिल्म/वेब रिव्यू
2
रिव्यू: प्रेम-रस से सराबोर ‘कृष्णावतारम’
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-दीपक दुआ… (This review is featured in IMDb Critics Reviews)

‘तो जाऊं राधे…?’ वृंदावन छोड़ते समय कृष्ण ने पूछा।

‘जाओ, अब हम तुम्हारे साथ-साथ तुम्हारी प्रतीक्षा से भी प्रेम करेंगे।’ राधा का जवाब था।

कहिए, वह कौन-सा हृदय होगा जो प्रेम से पगे ऐसे मीठे संवाद सुन कर भर न आएगा…!

यह फिल्म ‘कृष्णावतारम’ (Krishnavataram Part 1) देखिए तो ऐसे अनेक संवाद, ऐसे अनेक दृश्य मिलेंगे जो आपके अंतस में गहरे उतरते हुए आपको भावुक करेंगे। कृष्ण और राधा को मानने वाले तो न जाने कितने ही दृश्यों पर अपनी आंखों में भर आए प्रेमाश्रुओं को भी महसूस करेंगे। यह इस कहानी की सफलता है। यह राधा और कृष्ण के हमारे दिलों में बसे होने का प्रमाण है।

इधर कुछ समय से भारतीय सिनेमा में धार्मिक, पौराणिक कथाओं की जो आवक बढ़ी है उस पंक्ति में यह फिल्म मजबूती से आ खड़ी हुई है। इसके पूरे नाम ‘कृष्णावतारम पार्ट 1-द हार्ट (हृदयम)’ [Krishnavataram Part 1-The Heart (Hridayam)] से स्पष्ट होता है कि यह तो अभी शुरुआत है, आगे इस कथा के और भी अध्याय आने वाले हैं।

मान्यता है कि जगन्नाथ पुरी के मंदिर में मौजूद मूर्ति में श्रीकृष्ण का हृदय आज भी धड़कता है जिसे ‘ब्रह्म पदार्थ’ कहा जाता है। फिल्म (Krishnavataram Part 1) में आज के समय के पुरी शहर में एक आचार्य भक्तों को कृष्ण-कथा सुना रहे हैं। एक जिज्ञासु युवक के प्रश्नों का जवाब देते-देते यह कथा हमें कृष्ण के गोकुल छोड़ने, राधा से मिलने, वृंदावन छोड़ कर द्वारका नगरी बसाने, द्रौपदी के स्वयंवर, रुक्मिणी से विवाह, खुद पर लगे स्यमंतक मणि की चोरी के आरोप से मुक्ति पाने, सत्यभामा से विवाह, नरकासुर के वध के बाद 16 हजार स्त्रियों को अपनाने, महाभारत के बाद यादवों के विनाश और द्वापर युग के अंत में एक शिकारी के बाण से घायल होकर कृष्ण के मृत्यु को प्राप्त होने के बाद द्वारका के समुद्र में समाने तक के वर्णन को दिखाती है।

कृष्ण की पत्नी सत्यभामा के बारे में हमें कम जानकारी है। राम मोरी की पुस्तक ‘सत्यभामा’ और अन्य ग्रंथों, लोक-कथाओं को आधार बना कर हार्दिक गज्जर और प्रकाश कपाड़िया ने जो स्क्रिप्ट लिखी है उसमें प्रेम का भाव सबसे ऊपर रहा है। कृष्ण के प्रति भामा के प्रेम में अधिकार है वहीं रुक्मिणी के प्रेम में समर्पण। उधर राधा का प्रेम तो अनोखा है जिसमें त्याग है, करुणा भी। अपने मूल में यह कथा जहां हमें प्रेम की शक्ति का अहसास कराती है वहीं कर्म की प्रधानता को भी बार-बार रेखांकित करती है। कृष्ण कहते भी हैं, ‘सब कर्म के अधीन हैं। चाहे वो मनुष्य हों या मनुष्य के रूप में स्वयं अवतार।’ वह यह भी कहते हैं कि, ‘नियति मेरे बस में नहीं है।’ एक संवाद बहुत गहरा है कि कर्म पानी की तरह होते हैं, दीवार बना दो तो भी अपना रास्ता खोज लेते हैं। काश, कि आज के मनुष्य इससे कुछ सीख ले पाते।

फिल्म (Krishnavataram Part 1) बताती है कि कृष्ण ने धर्म की स्थापना के लिए जब अवतार लिया तो इसके लिए हर वह कार्य किया जो आवश्यक था। फिल्म संदेश देती है कि यदि ‘एक ओर प्रेम है, दूसरी ओर कर्तव्य’ तो मनुष्य को किसे चुनना चाहिए। वहीं कृष्ण और राधा के अलौकिक प्रेम के वर्णन से यह फिल्म स्पष्ट बताती है कि कृष्ण और राधा अलग नहीं हैं बल्कि कृष्ण के जीवन का सार है राधा।

हार्दिक गज्जर का निर्देशन बेहद सधा हुआ और परिपक्व है। पहले ही दृश्य से फिल्म (Krishnavataram Part 1) मन को छूने लगती है। कहीं-कहीं थोड़ी धीमी पड़ने के बावजूद इसकी दिशा नहीं बदलती। अंत आते-आते तो यह अचंभित करने लगती है। कुछ एक जगह शब्द गड़बड़ाए हैं और इंटरवल से पहले वाला हिस्सा कुछ ज्यादा ही संगीतमय है।

लगभग सभी कलाकारों का अभिनय संतुलित है। कृष्ण बने सिद्धार्थ गुप्ता, राधा बनी सुष्मिता भट, सत्यभामा बनी संस्कृति जयना, रुक्मिणी बनी निवाशियनी कृष्णन आदि तो मन को खूब भाते हैं। आचार्य बने जैकी श्रॉफ प्रभावी रहे। उनका नैरेशन भी असरदार रहा। अन्य कलाकारों का काम भी अच्छा रहा।

फिल्म (Krishnavataram Part 1) के तमाम तकनीकी पक्ष भव्य हैं। कम्प्यूटर ग्राफिक्स, सैट, रंगों, पोशाकों आदि का इस्तेमाल, सभी मनभावन हैं। एक्शन आदि दृश्य अनूठे हैं। बैकग्राउंड म्यूज़िक तो कमाल का है। फिल्म में ढेरों गीत हैं जो इसे सुरीला आवरण देते हैं। इरशाद कामिल के शब्द गहरे हैं और प्रसाद साश्टे का संगीत लुभावना। इन गीतों में ही कहीं लोकप्रिय ठुमरी ‘मोरे कान्हा जो आए पलट के, अब के होली मैं खेलूंगी डट के…’ भी सुनाई दे जाती है। कैमरा इतनी खूबसूरती से सब कुछ समेटता है कि आंखें धन्य हो उठती हैं।

यह फिल्म (Krishnavataram Part 1) बहुत कुछ सिखाती है। इसके कुछ संवाद-‘पुरुष हमेशा अहंकार में जीता है और स्त्री ईर्ष्या में। यदि दोनों इसे त्याग दें तो जीवन स्वर्ग हो जाए’, ‘जो नारी का सम्मान नहीं करता वह संस्कृति वह समाज कभी नहीं टिकता’, ‘युग के साथ अपनी कुंठित मनोदशा को न बदले वह समाज कैसा’ कितना कुछ देते हैं, यदि कोई लेना चाहे तो। फिल्म बार-बार यह कहती है कि ‘मैं’ का त्याग करो तो जीवन खिल उठेगा।

‘कृष्णावतारम’ (Krishnavataram Part 1) जैसी फिल्में मन को मथने का काम करती है। मथेंगे, तभी तो नवनीत उत्पन्न होगा-कोमल, उज्ज्वल, पौष्टिक। मन में कृष्ण के प्रति भक्ति भाव न भी हो तो भी देखिए इस फिल्म को, बहुत कुछ अच्छा सिखाती-बताती है यह।

(रेटिंग की ज़रूरत ही क्या है? रिव्यू पढ़िए और फैसला कीजिए कि यह कितनी अच्छी या खराब है। और हां, इस पोस्ट के नीचे कमेंट कर के इस रिव्यू पर अपने विचार ज़रूर बताएं।)

Release Date-07 May, 2026 in theaters

(दीपक दुआ राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त फिल्म समीक्षक हैं। 1993 से फिल्म-पत्रकारिता में सक्रिय। ‘सिनेयात्रा डॉट कॉम’ (www.cineyatra.com) के साथ-साथ विभिन्न समाचार पत्रों, पत्रिकाओं, वेब-पोर्टल, रेडियो, टी.वी. आदि पर सक्रिय दीपक ‘फिल्म क्रिटिक्स गिल्ड’ के सदस्य भी हैं।)

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Comments 2

  1. वीरेश सिंह तोमर says:
    20 hours ago

    वैरी गुड रिव्यु… ❤️🙏🏻 जय श्री राधे कृष्ण ❤️🙏🏻

    Reply
    • CineYatra says:
      19 hours ago

      धन्यवाद

      Reply

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