-दीपक दुआ…
‘प्रहार’-यह नाम लेते ही सबसे पहले याद आती है नाना पाटेकर के निर्देशन में 1991 में आई फिल्म ‘प्रहार-द फाइनल अटैक’ जिसमें आर्मी के मेजर चव्हाण बने नाना पाटेकर मुंबई शहर के कुछ गुंडों को मारने के बाद अदालत में पूछते हैं-देश का मतलब क्या है? सड़के, इमारतें, खेत, खलिहान, नदियां, पहाड़, बस इतना ही? और लोग, वो कहां हैं?’
अब आई अविनाश अरुण निर्देशित ‘प्रहार-द अनटोल्ड स्टोरी ऑफ उज्ज्वल निकम’ (Prahaar-The Untold Story of Ujjwal Nikam) इन्हीं ‘लोगों’ की बात करती है जिनसे यह देश बना है। अपने नाम से यह भले ही सरकारी वकील उज्ज्वल निकम की कहानी कहती मालूम होती हो लेकिन असल में यह फिल्म भारत के भारत होने का अर्थ बताती है। समझाती है कि एक देश तभी महान होता है जब वहां के लोग अपना ‘धर्म’ निभाते हैं।
(रिव्यू-हम, आप, सब हैं ‘भारत भाग्य विधाता’)
26 नवंबर, 2008 को मुंबई पर हुए आतंकी हमले असल में भारत की छाती पर दिए गए ऐसे ज़ख्म हैं जिन्हें कोई भारतीय चाह कर भी नहीं भूल सकता। इन ज़ख्मों को हमें भूलना भी नहीं चाहिए ताकि यह सनद रहे कि कैसे एक पड़ोसी ने हमारे साथ विश्वासघात किया था फिर भी हमने संयम और न्याय का साथ नहीं छोड़ा। उस हमले पर सिनेमा में बहुत कुछ, बहुत तरह से देखा-दिखाया जा चुका है। कुछ सप्ताह पहले आई मनोज तापड़िया निर्देशित कंगना रानौत वाली ‘भारत भाग्य विधाता’ ने कामा हॉस्पिटल की नर्सों के नज़रिए से उस हादसे को बयान किया था। अब यह फिल्म ‘प्रहार’ (Prahaar-The Untold Story of Ujjwal Nikam) उस रात आए दस हमलावरों में से ज़िंदा पकड़े गए इकलौते आतंकी अजमल कसाब को भारत द्वारा पूरी कानूनी प्रक्रिया अपनाते हुए उसके अंजाम तक पहुंचाने की यात्रा दिखाती है। यह फिल्म इस यात्रा के सारथी रहे सरकारी वकील उज्ज्वल निकम की बायोपिक नहीं है लेकिन यह उनके निजी जीवन में तो झांकती ही है, आतंक को अपना धर्म समझने वालों को भी आइना दिखाती है। इसीलिए, यह एक ज़रूरी फिल्म हो जाती है।
फिल्म की शुरुआत 1993 में मुंबई में हुए सीरियल बम ब्लास्ट के आरोपियों को सज़ा सुनाए जाने के सीन से होती है। 12-13 साल चले इस केस के सरकारी वकील उज्ज्वल निकम ही थे। अजमल के केस को उज्ज्वल जिस तरह से कदम-दर-कदम आगे ले जाते हैं, उससे इस फिल्म को लिखने वाले लोग तारीफ के हकदार हो जाते हैं। आम धारणा है कि जब अजमल ज़िंदा पकड़ा गया था तो उसी समय उसे मार क्यों नहीं दिया गया? यहां तक कि उसकी तरफ से केस लड़ने वालों को भी गद्दार कहा गया। लेकिन यह फिल्म इन बातों के खुल कर जवाब देती है कि इस केस में न्यायिक प्रक्रिया का पालन करना क्यों ज़रूरी था।
इस फिल्म के अदालती दृश्य तो लाजवाब हैं ही, साथ ही यह फिल्म उज्ज्वल की निजी ज़िंदगी में भी सफलता से झांकती है। यह बताती है कि देश, समाज की बड़ी ज़िम्मेदारियां संभालने वाले लोग कैसे अक्सर रिश्तों की बजाय कतर्व्य को महत्व देने लगते हैं। उनके परिवारों की भूमिका पर यह फिल्म बात करती है, मुंबई हमले में लड़े-मरे पुलिस वालों के बारे में बात करती है, आम लोगों के हक की बात करती है और साथ ही यह फिल्म उन नौजवानों की भी बात करती है जिनका ब्रेनवॉश करके उन्हें जन्नत का ख्वाब दिखा कर जिहाद के रास्ते पर भेज दिया गया। सच तो यह है कि यह फिल्म बहुत सारी बातें करती है और इसे पूरी तरह से जज़्ब करना हो तो बहुत तसल्ली से देखना होगा, शायद एक से अधिक बार।
निर्देशक अविनाश अरुण के खाते में ‘थ्री ऑफ अस’ जैसी बढ़िया फिल्म और ‘पाताललोक’ जैसी वेब-सीरिज़ दर्ज है। अब इस फिल्म से उन्होंने अपना कद और ऊंचा ही किया है। हालांकि फिल्म एक-दो जगह ‘फिल्मी’ हुई है, दो-एक सीन भी सहज नहीं बल्कि ‘बनाए गए’ लगते है, लेकिन इससे फिल्म का असर कम नहीं होता। अपने सधे हुए दृश्यों और कसे हुए संवादों से यह फिल्म हमें उद्वेलित करती है वहीं कई जगह तालियां बजाने और कुछ जगह आंखें नम करने का मौका भी देती है। उज्ज्वल निकम की मौजूदा राजनीतिक प्रतिबद्धता के चलते कुछ लोगों को यह फिल्म (Prahaar-The Untold Story of Ujjwal Nikam) अखर-चुभ सकती है लेकिन इससे न तो सच का चेहरा बदलता है और न ही इस फिल्म का प्रभाव।
यह फिल्म (Prahaar-The Untold Story of Ujjwal Nikam) अपने विषय के अलावा अपने कलाकारों के बेहद सधे हुए अभिनय के लिए भी देखी जानी चाहिए। उज्ज्वल निकम बने राजकुमार राव ने इस किरदार को इस कदर विश्वसनीय बनाया है कि उन्हें देख कर सुख मिलता है। इसके लिए उन्हें एक और राष्ट्रीय पुरस्कार मिल जाना चाहिए। उनकी पत्नी के रोल में वामिका गब्बी ने अधेड़ उम्र के ठहराव को अपने भावों, आंखों व संवादों से प्रभावी ढंग से जताया है। इनके बेटे बने ऋत्विक सहोर तो बचपन में ‘फरारी की सवारी’ और ‘दंगल’ से होते हुए अब एक सधे हुए अभिनेता बन चुके हैं। अजमल कसाब बने ललित प्रभाकर कुछ दिन पहले ‘मै वो और फुजी’ में सराहे जाने के बाद अब इस फिल्म में सचमुच कसाब की भूमिका को कस कर पकड़ते हैं। अजमल के वकील बने सिकंदर खेर, जज बने आशीष विद्यार्थी, पाकिस्तानी वकील बने जयदीप अहलावत जम कर जंचे। तमाम दूसरे कलाकार भी विश्वसनीय रहे।
(रिव्यू-सधी, संभली प्रेम कहानी ‘मैं वो और फुजी’)
हालांकि यह फिल्म (Prahaar-The Untold Story of Ujjwal Nikam) अजमल के केस के बहाने से उज्ज्वल निकम के जीवन में झांकती है लेकिन असल में हम दर्शकों को यह भारत पर गर्व करना सिखाती है। इस गर्व के लिए इस फिल्म को देखा जाना चाहिए। पर पता नहीं क्यों, इस फिल्म के नाम में ‘प्रहार’ शब्द कुछ फिट-सा नहीं लगता।
(रेटिंग की ज़रूरत ही क्या है? रिव्यू पढ़िए और फैसला कीजिए कि यह कितनी अच्छी या खराब है। और हां, इस पोस्ट के नीचे कमेंट कर के इस रिव्यू पर अपने विचार ज़रूर बताएं।)
Release Date-16 October, 2026 in theaters
(दीपक दुआ राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त फिल्म समीक्षक हैं। 1993 से फिल्म–पत्रकारिता में सक्रिय। ‘सिनेयात्रा डॉट कॉम’ (www.cineyatra.com) के साथ–साथ विभिन्न समाचार पत्रों, पत्रिकाओं, वेब–पोर्टल, रेडियो, टी.वी. आदि पर सक्रिय दीपक ‘फिल्म क्रिटिक्स गिल्ड’ के सदस्य भी हैं।)


देखने की उत्सुकता जगाता review, काश आपकी शुभकामना सत्य हो और इसे कोई राष्ट्रीय पुरस्कार मिले। शेष देखने के बाद।
धन्यवाद…