-दीपक दुआ… (This review is featured in IMDb Critics Reviews)
श्रीराम राघवन की फिल्म ‘अंधाधुन’ में एक अंधा पियानो प्लेयर एक खून होते हुए ‘देख’ लेता है। अब अंधा आदमी ‘देख’ कैसे सकता है? और यहीं से शुरू होती है छल, कपट और धोखे की एक अंधी दौड़ जिसमें कोई भी पाक-साफ नहीं है।
(रिव्यू-रहस्य और रोमांच में लिपटी संगीतमय ‘अंधाधुन’)
प्रियदर्शन की इस फिल्म ‘हैवान’ में एक बिल्डिंग के अंधे मैंटेनेंस मैनेजर की जज साहब को मारने वाले एक खूनी से हाथापाई हुई है। वह उसे सूंघ कर पहचान लेता है लेकिन पुलिस उस अंधे को ही खूनी माने बैठी है। कैसे निकलेगा वह इस आरोप से? कैसे पकड़ा जाएगा वह खूनी? वह खून कर ही क्यों रहा है? क्यों वह ऐसा हैवान बना हुआ है जो अपने बदले की आग में मासूमों की जान लिए जा रहा है? सवाल कई हैं, जवाब यह फिल्म देती है। मगर क्या ये जवाब हज़म होने लायक हैं? आइए देखते हैं।
उस अंधे को ऑटो रिक्शा वाले का फोन आता है कि उसने खूनी को यहां पर देखा है, आ जाओ। वह अंधा भी अपनी ए.सी.पी. दोस्त (जो उसे बड़ा भाई मानती है) को बिना फोन किए चल पड़ता है। (इतना कॉन्फिडेंस…?) वह ए.सी.पी. बिना किसी मतलब, बिना किसी आदेश के, बस यूं ही पिछले कुछ सालों में महाराष्ट्र के अलग-अलग इलाकों में हुए कुछ हादसों की फाइल बनाए बैठी है। (भई लेखक ने कहा होगा न, आगे कहानी में काम आएगी)। उसका पुलिस डिपार्टमैंट उस ए.सी.पी. की बात सुन कर ही राज़ी नहीं है। उस काबिल मगर बेचारी अफसर की अपने डिपार्टमैंट में चलती ही नहीं है, वरना उसके बड़े भाई जैसे अंधे को पुलिस उलटा लटका कर थोड़े ही पीटती। जज साहब (चीफ जस्टिस) रिटायर होकर बिना किसी सिक्योरिटी, नौकर, ड्राईवर के यूं ही अकेले रह रहे हैं, घूम रहे हैं, लाचारों की तरह (सरकार इतनी भी निष्ठुर नहीं होती साहब)। और वह जब चाहते हैं, उस अंधे मैनेजर को अपने पर्सनल काम से मुंबई से दूर भेज देते हैं (मैंटेनेंस कौन संभालेगा भाई)।
दरअसल ये तो कुछ एक उदाहरण है इस फिल्म की स्क्रिप्ट के छेदों के। वैसे ढूंढने बैठेंगे तो इस फिल्म की लिखाई इतनी जालीदार मिलेगी कि उससे मच्छरदानी बनाई जा सकती है। पहले तो यही बता दिया जाए कि यह फिल्म निर्देशक प्रियदर्शन की ही 2016 में आई मलयालम फिल्म ‘ओप्पम’ का रीमेक है जिसकी कहानी का मूल विचार गोविंद विजयम का था और जिसे लिखा प्रियदर्शन ने ही था। बीते दस साल में जो तकनीकी उन्नति हुई है, उसके चलते अब हिन्दी में बन कर आई इस फिल्म की कहानी बासी-सी लगती है। हिन्दी में इसे लिखने वालों ने हालांकि अपनी तरफ से सारे टुकड़े सही जगह फिट करने की पूरी कोशिश की है लेकिन उनकी यह ‘कोशिश’ बनावटी और उथली लगती है जो सहज प्रवाह की कमी के चलते साफ पकड़ी जाती है। चर्च को गिरजाघर कहते आपने आखिरी बार किसे सुना था? ईसाइयों का मिशनरी स्कूल दिवाली की छुट्टियों में ऐसा खाली हुआ कि सिवाय प्रिंसीपल के कोई बचा ही नहीं?
फिल्म में ऐसा बहुत कुछ है जो अखरता है। जब फिल्म का फ्लेवर मर्डर, सस्पैंस, थ्रिलर का हो तो आप लॉजिक जैसी चीज़ से खिलवाड़ नहीं कर सकते। आप की मेकिंग भले ही ‘फिल्मी’ हो जाए, आपकी लिखाई ‘फिल्मी’ हुई नहीं कि दर्शक आपको च्यूंटी काट लेगा। यही कारण है कि फिल्म में रिटायर्ड चीफ जस्टिस के जिस मर्डर को ‘इतना बड़ा केस’ बताया गया, जिसके बारे में कहा गया कि ‘ऊपर से बहुत प्रैशर’ है, उसे सुलझाने के लिए इतने चूरण किस्म के पुलिसियों को ज़िम्मा दिया गया कि उन पर तरस आने लगता है। और उन पुलिस वालों का डी.सी.पी. इस कदर लुल्ल होगा, यह सोच कर शर्म आने लगती है। थाने में आई ए.सी.पी. (आई.पी.एस. अफसर होती है वह) को पुलिस वाले इतने हल्के से ट्रीट करते हैं कि खीज होने लगती है। इतनी बड़ी सोसायटी के लिए जिस तरह के टेढ़े-बांके सिक्योरिटी गार्ड रखे गए हैं, उन्हें देख कर सोसायटी वालों की अक्ल पर तरस आता है, सो अलग। इनमें से एक गार्ड हुसैन (स्वर्गीय असरानी) दादाजी की उम्र का है, वह हर हिन्दू को मुस्लिम नाम से पुकारता है और प्रियन सर को लगता है कि इससे कॉमेडी हो रही है। धत्त तेरे की…!
फिल्म में बताई गई टाइमलाइन गड़बड़ है। कातिल के जेल जाने, पागलखाने जाने, छूटने, बाहर आकर पूरी प्लानिंग के साथ ढेरों कत्ल करने जैसी चीज़ों की अवधि पर गौर करें तो पाएंगे कि लिखने वाले आपको कमतर समझे बैठे हैं। और उसकी कहानी का नाम ‘हैवान’ क्यों? ‘हैवानियत’ नाम से तो कुछ और ही इमेज बनती है। ऊपर से इसकी पौने तीन घंटे की लंबाई… उफ्फ…! कई सीन तो इतने पकाऊ हैं कि बगल में बैठे दर्शक को पीटने का मन करता है।
और सिर्फ लिखाई ही नहीं, इस फिल्म की मेकिंग भी बहुत बासी है। मसाला फिल्में बनाते हुए प्रिर्यदर्शन अभी भी बीते युग में जी रहे हैं। कुछ महीने पहले आई उनकी ‘भूत बंगला’ भी खोखली ईंटों से बनी हुई थी जिसके रिव्यू में मैंने लिखा था-‘प्रियदर्शन जी, बेहतर होगा कि आप अपनी मलयालम फिल्मों के रीमेक ही लाया करें, हिन्दी में कुछ ‘ओरिजनल’ करना आपको ‘अप्रियदर्शन’ साबित कर सकता है।’ अब ‘हैवान’ जैसी रीमेक फिल्म में उन्होंने जिस बासेपन, धीमेपन और दोहराव के साथ सीन बनाए हैं, उससे उनका मान दर्शकों की नज़र में कम ही हुआ है। ऐसे निर्देशक, जिन्होंने कभी भरपूर प्रतिष्ठा और सफलता पाई हो, उन्हें अपना रंग छूटने से पहले इज़्ज़त के साथ रिटायरमैंट लेने के बारे में गंभीरता से सोचना शुरू कर देना चाहिए।
(रिव्यू-खोखली ईंटों से बना ‘भूत बंगला’)
एक्टिंग-वैक्टिंग तो कलाकार लोग ठीक से कर ही लेते हैं। लेकिन सैफ अली खान और अक्षय कुमार की ‘फिल्मी छवि’ उनके किरदारों पर हावी होती दिखाई देती रही। शारिब हाशमी को बढ़िया किरदार मिला जिसका उन्होंने फायदा भी उठाया। बोमन ईरानी, श्रिया पिलगांवकर, राजपाल यादव, असरानी, राजेश शर्मा, मनोज जोशी और यहां तक कि सैयामी खेर जैसी अदाकारा भी लाचार लगी। कैमरा कई जगह अच्छे सीन दिखा गया। लोकेशन प्रभावी रहीं। यतींद्र मिश्र के लिखे एक गाने ‘रंगियारा रंगियारा…’ को छोड़ कर बाकी का गीत-संगीत बेहद कमज़ोर रहा।
इस फिल्म के आखिरी के कुछ मिनट ही बांध पाते हैं। बाकी तो इसे देखते हुए ऐसा लगता है जैसे परसों बनाए रायते में ऊपर से ताज़ा धनिया छिड़क कर परोस दिया गया हो। लेकिन इसे चखिए तो पता चलता है कि अंदर से यह खट्टा हो चुका है। ऐसे खट्टे स्वाद वाले सिनेमा की खुराक आपको कुछ देती नहीं है, याद रहे।
(रेटिंग की ज़रूरत ही क्या है? रिव्यू पढ़िए और फैसला कीजिए कि यह कितनी अच्छी या खराब है। और हां, इस पोस्ट के नीचे कमेंट कर के इस रिव्यू पर अपने विचार ज़रूर बताएं।)
Release Date-11 September, 2026 in theaters
(दीपक दुआ राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त फिल्म समीक्षक हैं। 1993 से फिल्म–पत्रकारिता में सक्रिय। ‘सिनेयात्रा डॉट कॉम’ (www.cineyatra.com) के साथ–साथ विभिन्न समाचार पत्रों, पत्रिकाओं, वेब–पोर्टल, रेडियो, टी.वी. आदि पर सक्रिय दीपक ‘फिल्म क्रिटिक्स गिल्ड’ के सदस्य भी हैं।)
