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रिव्यू-इंसानियत की बात ‘बंटवारा 1947’ में

Deepak Dua by Deepak Dua
2026/08/15
in CineYatra, फिल्म/वेब रिव्यू
2
रिव्यू-इंसानियत की बात ‘बंटवारा 1947’ में
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-दीपक दुआ… (This review is featured in IMDb Critics Reviews)

1947 में हुए देश के बंटवारे के समय हर तरफ मची मारकाट के बीच मेरठ का सिकंदर मिर्ज़ा किसी तरह बच-बचाकर अपने परिवार के साथ लाहौर पहुंचा। कुछ दिन बाद उसे किसी हिन्दू की छोड़ी एक हवेली भी अलॉट हो गई। पर उस हवेली में तो उस हिन्दू की मां छुपकर बैठी थी, अपने बेटे के इंतज़ार में। शुरुआती ना-नुकर के बाद सिकंदर के परिवार ने तो उस औरत से तालमेल बिठा लिया लेकिन मज़हब और सियासत के कुछ ठेकेदारों को यह मंज़ूर नहीं हुआ। और फिर एक दिन…!

यह कहानी दरअसल हिन्दी के मशहूर लेखक असगर वजाहत के 1989 में लिखे गए एक नाटक ‘जिस लाहौर नइ देख्या ओ जम्याइ नइ’ (जिसने लाहौर नहीं देखा वह पैदा ही नहीं हुआ) की है जो देश-दुनिया में काफी लोकप्रिय हुआ। किसी ज़माने में पंजाबी में यह कहावत कही जाती थी क्योंकि उस समय का लाहौर शहर अपनी समृद्ध संस्कृति, इतिहास, भव्यता, मेल-जोल वाली जीवन शैली आदि के लिए जाना जाता था और यह माना जाता था कि जिसने यह शहर नहीं देखा, उसका कोई वजूद ही नहीं है। लेकिन इसी शहर में बंटवारे के दिनों में कुछ लोगों ने इतिहास पर पानी फेरा था, संस्कृति का कत्ल किया था, भव्यता को उजाड़ा था और मेल-जोल की भावना को मिट्टी में मिलाया था। उसी लाहौर का चित्रण असगर वजाहत ने अपने इस नाटक में किया था जिसका नाम अपने-आप में एक व्यंग्य था। उसी कहानी को राजकुमार संतोषी अपनी इस फिल्म में लेकर आए हैं।

अपने तेवर में यह कहानी दिखाती है कि बंटवारे के तुरंत बाद पूरे शहर में बची रह गई एक अकेली हिन्दू बूढ़ी औरत कैसे कुछ लोगों की नज़र में खटक रही है। दरअसल यह अकेली औरत फिल्म में ‘दूसरी कौम’ का एक रूपक है और उसका घर ‘दुर्गा निवास’ एक देश का, कि दो अलग-अलग धर्मो के लोग एक साथ एक जगह पर मिल-जुलकर क्यों नहीं रह सकते? सिकंदर की बेटी एक जगह यह सवाल पूछती भी है कि मुल्क के दो टुकड़े आखिर करने ही क्यों पड़े? उसकी मां जवाब देती है कि मर्दों ने ऐसा करते हुए हमसे तो पूछा ही नहीं। यहां ‘मर्द’ रूपक हैं उन लोगों का जो देश चलाने, बनाने का दावा करते हुए कर्णधार बने हुए थे। ‘गांधी जी बंटवारा नहीं होने देंगे’ से लेकर ‘कुछ दिन का बवाल है, फिर हम यहीं लौट आएंगे’ और ‘कल 15 अगस्त है, हमारी सरकार होगी और सब ठीक हो जाएगा’ जैसी बातों से यह फिल्म आम लोगों के विश्वास को टूटते हुए भी दिखाती है। बड़ी बात यह रही कि फिल्म ने किसी एक का पक्ष लेने की बजाय हर किसी को कटघरे में खड़ा करते हुए संतुलन बनाए रखा है।

लेकिन अपने कलेवर में यह फिल्म बहुत ही औसत ढंग से बनी हुई है। इसकी पटकथा बहुत कमज़ोर अंदाज़ में लिखी गई है जिससे इसका बनावटीपन साफ झलकता है। अधिकांश संवाद बहुत हल्के हैं। अधिकांश किरदार बहुत ही नकली-से लगते हैं। उनकी हरकतें कई जगह बचकानी और मैलोड्रामाई हैं। स्क्रिप्ट में समय और मौसम का ध्यान ही नहीं रखा गया। लोकेशन, सैट्स, कॉस्ट्यूम, मेकअप इस कदर हल्के और बनावटी हैं कि लगता है कि हम कोई फिल्म नहीं बल्कि रंगमंच पर कोई नाटक देख रहे हैं। बैकग्राउंड म्यूज़िक औसत रहा। जावेद अख्तर और ए.आर. रहमान की जोड़ी इस कदर थके हुए गाने भी रच सकती है, यकीन नहीं होता। कैमरा वर्क साधारण रहा और एक्शन भी। वैसे भी एक्शन ‘फिल्मी’ किस्म का रहा और बिना ज़रूरत घुसेड़ा गया। सनी पर्दे पर हों तो ऐसा होना स्वाभाविक भी है।

किरदारों की भीड़ है लेकिन उम्दा कलाकारों का फिल्म में अकाल है। सनी देओल ठीक लगे हैं। बरसों बाद दिखीं प्रीति ज़िंटा सुंदर भी लगीं और जंची भी। करण देओल को ठोक-पीट कर एक्टर बनाने की बजाय कोई और दुकान खोल कर देना उनके सही रहेगा। अली फज़ल बहुत हल्के रहे, अभिमन्यु सिंह बहुत ही लाउड। सनी की बेटी बनीं खुशी हजारे ने अच्छा काम किया। बाकी सब लोग बहुत ही औसत रहे। एक्टिंग देखना चाहें तो शबाना आज़मी की देखिए। बेहद प्रभावी ढंग से उन्होंने अपने किरदार को जिया है। उन्हें कोई बड़ा पुरस्कार मिलना चाहिए।

राजकुमार संतोषी का निर्देशन बासी शैली का लगा। किसी समय के स्टार फिल्मकार रहे और बदलते समय के साथ खुद को अपग्रेड न करने वाले निर्देशकों में अब वह भी शामिल हो गए हैं। हैरानी इस बात की भी है कि यह फिल्म आमिर खान के प्रोडक्शन से आई है जहां से ऐसी औसत चीज़ें आमतौर पर नहीं आती हैं। आमिर ने दखल देना बंद कर दिया है क्या…!

अंत के कुछ मिनटों में भावुक करती यह फिल्म बताती है कि इंसानियत हर धर्म, मज़हब से ऊपर होती है। इस फिल्म को इसके इस उम्दा मैसेज के लिए देखा जा सकता है। लेकिन बड़ी उम्मीदें लेकर इसे देखना आपको निराश कर सकता है। फिल्म की गति बहुत जगह पर धीमी है। बेहतर होगा कि ओ.टी.टी. पर आने के बाद इसे 1.5 की स्पीड पर देखा जाए।

(रेटिंग की ज़रूरत ही क्या है? रिव्यू पढ़िए और फैसला कीजिए कि यह कितनी अच्छी या खराब है। और हां, इस पोस्ट के नीचे कमेंट कर के इस रिव्यू पर अपने विचार ज़रूर बताएं।)

Release Date-14 August, 2026 in theaters

(दीपक दुआ राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त फिल्म समीक्षक हैं। 1993 से फिल्म–पत्रकारिता में सक्रिय। ‘सिनेयात्रा डॉट कॉम’ (www.cineyatra.com) के साथ–साथ विभिन्न समाचार पत्रों, पत्रिकाओं, वेब–पोर्टल, रेडियो, टी.वी. आदि पर सक्रिय दीपक ‘फिल्म क्रिटिक्स गिल्ड’ के सदस्य भी हैं।)

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Comments 2

  1. Praveen Lohchab says:
    18 hours ago

    Very Nice Review

    Reply
    • CineYatra says:
      18 hours ago

      many thanks…

      Reply

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