-कुमार नयन सिंह… (This review is featured in IMDb Critics Reviews)
चंदर और प्रीति मसूरी की वादियों में ‘मुसाफिर कैफे’ चलाते हैं। चंदर को ‘मुसाफिर कैफे’ का नाम किसी से गिफ्ट में मिला है। दरअसल कभी चंदर और सुधा ऐसे ही एक कैफे में मिले थे। धीरे-धीरे वे एक-दूसरे के करीब आए और फिर लिव-इन में भी रहने लगे थे। मगर फिर एक दिन ये एक-दूसरे से अलग हो गए और चंदर-प्रीति की कहानी हमें दिखने लगती है। चंदर की सुधा के साथ बिताई पुरानी ज़िंदगी और अब प्रीति के साथ बीत रही वर्तमान ज़िंदगी, दोनों साथ-साथ चलते हैं और हम भी चलते रहते हैं इन मुसाफिरों की यात्रा पर उनके साथ ही। पर अगर किसी दिन चंदर को अचानक से सुधा मिल गई तो…?
नेटफ्लिक्स पर आई यह वेब सीरिज़ नई वाली हिन्दी के लोकप्रिय लेखक दिव्य प्रकाश दुबे की 2016 में आई किताब ‘मुसाफिर कैफे’ पर आधारित है जो पहले ही युवाओं में काफी चर्चित है। किताब पर आधारित होने के कारण इसमें किताबी भाषा, किताबों का दर्शन और किताबों की बातें जमकर की गई हैं। एक दृश्य में तो स्वयं लेखक दिव्य प्रकाश दुबे अपनी कहानी को नैरेट करते नज़र आते हैं। हालांकि शरण्या राजगोपाल ने किताब को सीरिज़ के मुताबिक ढालते समय अच्छा काम किया है। लेकिन इस क्रम में दार्शनिकता का तड़का थोड़ा ज़्यादा ही लग गया और कहीं-कहीं ज़रुरत से ज़्यादा लंबे दार्शनिक संवाद आकर बोर करने लगे। ऐसा भी लगता है कि 8 एपिसोड की इस सीरिज़ को एडिटिंग चुस्त करके 6 एपिसोड में भी निपटाया जा सकता था।
रुचिर अरुण के निर्देशन में परिपक्वता है। सीरिज़ का छायांकन बहुत सुंदर है। दृश्य मनमोहक हैं। पहाड़ों के दृश्य बेहद खूबसूरती से फिल्माए गए हैं जिन्हें देखना मन को सुकून देता है। हीरो-हीरोइन की चुलबुली हरकतें मन को भाती हैं। बैकग्राउंड म्यूज़िक इस फ़िल्म की खासियत है, खासकर तब, जब चंदर और सुधा साथ दिखते हैं। गीतों के बोल सुंदर हैं और धीरे-धीरे जुबान पर चढ़ने वाले हैं।
विक्रांत मैसी को इस तरह की भूमिकाओं में अपने-आपको ढालना बहुत अच्छे से आता है और उन्होंने यहां भी बेहतरीन काम किया है। वेदिका पिंटो और महिमा मकवाना फ्रैश और सचमुच पहाड़ों वाली ठंडी हवा जैसी लगती हैं। इन दोनों ने ही अपनी भूमिकाओं को खुलकर जिया है। इन्हें देखना अच्छा लगता है। थोड़ी देर के लिए आए आदिल हुसैन और सादिया सिद्दिकी अपनी छाप छोड़ते हैं। खासकर आदिल इतनी सहजता से काम करते हैं कि उनका जाना अखरता है। राजीव सिद्धार्थ का काम भी प्रभावशाली है। अन्य कलाकारों ने भी अपना-अपना काम बखूबी किया है।
साफ-सुथरी, बिना फूहड़ता के और परिवार के साथ बैठकर देखने लायक इस वेब-सीरिज़ में एक-आध बोल्ड दृश्य कहानी की मांग के मुताबिक आया है। लंबे-लंबे दार्शनिक संवादों की अधिकता को छोड़ दिया जाए इस वेब-सीरिज़ में कुछ भी ऐसा नहीं है जिसे खराब कहा जा सके। खासतौर से किताबों को पसंद करने वालों को यह ज़रूर भाएगी। अगर यह वेब-सीरिज़ देखते समय कुछ पुरानी यादें ज़ेहन में आएं तो उन्हें आने दीजिएगा, वे यादें अगर आंखों में नमी लाएं तो लाने दीजिएगा, यही इस कहानी की जीत है।
(रेटिंग की ज़रूरत ही क्या है? रिव्यू पढ़िए और फैसला कीजिए कि यह कितनी अच्छी या खराब है। और हां, इस पोस्ट के नीचे कमेंट कर के इस रिव्यू पर अपने विचार ज़रूर बताएं।)
Release Date-24 July, 2026 on Netflix
(कुमार नयन सिंह झारखंड के कोडरमा जिले के झुमरी तिलैया के निवासी हैं। फिल्मों, गीतों व किताबों के दीवाने नयन वर्तमान में भारतीय रेलवे में बिहार के दानापुर, पटना में कार्यरत हैं।)
