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रिव्यू-मादकता थोड़ी कम है इस ‘कॉकटेल 2’ में

Deepak Dua by Deepak Dua
2026/06/19
in CineYatra, फिल्म/वेब रिव्यू
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रिव्यू-मादकता थोड़ी कम है इस ‘कॉकटेल 2’ में
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-दीपक दुआ…

पहली बात-यह फिल्म ‘कॉकटेल 2’ 2012 में आई सैफ अली खान, डायना पेंटी, दीपिका पादुकोण (गौतम, मीरा, वेरोनिका) वाली फिल्म ‘कॉकटेल’ का सीक्वेल नहीं है। उस फिल्म में भी दो लड़कियों और एक लड़के के बीच के रिश्तों का कॉकटेल था, इसमें भी है, सो इस फिल्म का नाम वैसा ही रख दिया गया। हालांकि कुछ और भी रखा जा सकता था लेकिन फिर ‘कॉकटेल’ के ब्रांड-नेम का फायदा नहीं मिल पाता न। अपने फ्लेवर में यह फिल्म उसी के जैसी है-रंगीन, बोल्ड, दिल-दिमाग से ज़्यादा आंखों को भाने वाली।

दीया और कुणाल कई साल से एक साथ रह रहे हैं। ‘शादी कब करोगे’ के सवाल पर तंग आकर वे खुद कहते हैं कि शादी के बाद किए जाने वाले सारे काम वे कर चुके हैं, बस रस्में बाकी हैं। वे छुट्टी मनाने इटली जाते हैं जहां मिलती है दीया की सहेली जिसका नाम है ऐली, रहती है अकेली और है जैसे कोई पहेली। दीया के कहने पर ऐली कुणाल पर लाइन मारती है ताकि उसकी वफादारी चैक की जा सके। कुणाल फिसलता है या नहीं लेकिन ऐली ज़रूर फिसल जाती है। अब भसड़ यह मची है कि कुणाल किस से शादी करेगा या कौन कुणाल से शादी करेगी या कुणाल शादी करेगा भी या नहीं।

रिश्तों को लेकर कन्फ्यूज़ रहने वाले युवाओं पर अपने यहां ढेरों फिल्में बनी हैं, बनती रहती हैं। यह कन्फ्यूज़न कभी कैरियर के चलते आती है तो कभी रिश्तों में कमिटमैंट के चलते। यहां कैरियर वाली बात नहीं है। यहां कारण दूसरे वाला है। या यह भी कह सकते हैं कि यहां दूसरे वाला कारण (नैरेटिव पढ़िए) सैट किया जा रहा है कि लड़का-लड़की अच्छे-खासे सैटल हैं, कभी भी शादी कर सकते हैं लेकिन करेंगे नहीं क्योंकि आज के ये अच्छे-खासे पढ़े-लिखे, तगड़े रईस इंडिपेंडेंट युवा असल में मूर्ख होते हैं जो हर रिश्ते में कमिटमैंट नहीं बल्कि कम्फर्ट तलाशते हैं। इन्हें असल में पता ही नहीं होता कि ये ज़िंदगी से चाहते क्या हैं और इसीलिए किसी भी रिश्ते को ये लोग ‘जब तक चलेगा, चलाएंगे, नहीं चला तो दोनों अपने-अपने रस्ते बढ़ जाएंगे’ वाले मोड में रखते हैं। ‘बॉलीवुड’ यही तो दिखा और सिखा रहा है हमें।

वैसे भी इस फिल्म के किरदार हैं ही नहीं इस दुनिया के जिसमें हम और आप रहते हैं। फिल्म के पहले सीन के बाद ये लोग पैसे कमाने की नहीं, उसे उड़ाने की फिक्र करते दिखते हैं। ये उन घरों में रहते हैं जिनकी छत पर भी दारू की टंकी लगी होती है। जहां बाप अपने बेटे को पैग लबालब भरने पर शाबाशी देता है और कहता है दो पैग मार कर सो जा, कल तेरी शादी है। ये लोग कपड़ों के नाम पर कुछ भी पहन और कहीं भी उतार सकते हैं। ये हमारे देश के रईस लोग हैं। आप नहीं हैं न ऐसे? तो आइए, इनकी दुनिया में चलते हैं।

पिछली वाली ‘कॉकटेल’ का कोई भी नाम रिपीट नहीं किया गया है लेकिन इस बार वाले हीरो (शाहिद कपूर) का नाम पिछली वाली के विलेननुमा किरदार कुणाल (रणदीप हुड्डा) से लिया गया है जबकि यह बंदा विलेन तो बिल्कुल नहीं है। यह तो खुशी-खुशी अपने रिश्ते को एन्जॉय कर रहा था जब तक कि उसकी बंदी दीया (रश्मिका मंदाना) के दिमाग में शक का कीड़ा नहीं उपजा। रश्मिका का किरदार इन तीनों में है भी सबसे कमज़ोर। शाहिद के किरदार में जहां मैच्योरिटी है वहीं ऐली का खिलंदड़ा किरदार पिछली वाली फिल्म की वेरोनिका सरीखा है। फिल्म रिश्तों की कन्फ्यूज़न पर है तो ज़ाहिर है कि इसमें बातें खूब हैं और लगातार हैं। इंटरवल तक भूमिका बनाने के चक्कर में लव रंजन और तरुण जैन की लिखी ये बातें जंचती भी हैं लेकिन उसके बाद फिल्म सपाट होने लगती है। यह भी महसूस होता है कि 15-20 मिनट की कटाई कर दी जाती तो यह कुछ निखर आती। अंत में शादी वाले घर का ड्रामा घिसा-पिटा है। और इस किस्म का ड्रामा होने पर हीरो (या हीरोइन) कार लेकर लॉन्ग ड्राईव पर क्यों निकल जाते हैं?

होमी अदजानिया का डायरेक्शन सटीक रहा है। उन्होंने फिल्म का मूड लगातार बनाए रखा है। इटली की रंगीनियां तो आंखभाऊ हैं ही, इंडिया वाला हिस्सा भी उन्होंने चमकदार ही दिखाया है। लोग पता नहीं क्यों, गरीबी-गरीबी चिल्लाते रहते हैं।

शाहिद का काम सधा हुआ रहा है। उन्होंने अलग-अलग मूड के सीन्स को सलीके से संभाला है। रश्मिका की हिन्दी गड़बड़ाई है लेकिन वह प्यारी लगी हैं और कहीं-कहीं हल्की रहने के बावजूद अच्छी भी। कृति सैनन उभर कर आईं। उन्हें देखने को मन करता है। वैसे पूरी फिल्म में ‘देखने’ के लिए इतना कुछ है कि सैंसर ने इसे ‘ए’ सर्टिफिकेट दिया हुआ है। और हां, कहने को फिल्म में पुलकित सम्राट, टिक्कू तल्सानिया और कई सारे जाने-पहचाने चेहरे हैं लेकिन उन्हें किरदार ही नहीं दिए गए, एक्टिंग वे क्या करते। पिछली वाली फिल्म से आए ‘तुम्ही हो बंधु सखा तुम्ही…’ वाले शानदार गाने के अलावा एक-दो गाने ही हैं जो जंचते हैं।

इस किस्म की फिल्मों में घटनाओं से ज़्यादा बातों, संवादों पर ध्यान दिया जाता है। पर्दे पर किरदारों की लगातार हो रही इन बातों में हर उम्र, हर सोच का दर्शक अपने-अपने मतलब की बात पकड़ लेता है। इसीलिए इस किस्म की फिल्में बहुत बेहतर भले ही न बनें, बहुत बेकार नहीं बनती हैं। कह सकते हैं कि इन्हें टिकाऊ और पकाऊ के बीच में जगह मिल ही जाती है। पिछली वाली ‘कॉकटेल’ भी ऐसी थी जिसे समय के साथ-साथ और अपने गानों की लोकप्रियता के चलते पसंदगी मिलती चली गई। इस वाली के साथ भी यह हो सकता है लेकिन मादकता की कम खुराक इसे ज़्यादा नशीला नहीं बनने दे रही है। वैसे भी कॉकटेल हर किसी को हज़म हो ही जाए, कोई ज़रूरी नहीं। सो, बेहतर होगा कि फिल्म देखने से पहले यहां क्लिक करके इसका ट्रेलर देख लें, अपने टेस्ट का लगे तो ही पैसे और समय खर्च करें।

(रेटिंग की ज़रूरत ही क्या है? रिव्यू पढ़िए और फैसला कीजिए कि यह कितनी अच्छी या खराब है। और हां, इस पोस्ट के नीचे कमेंट कर के इस रिव्यू पर अपने विचार ज़रूर बताएं।)

Release Date-19 June, 2026 in theaters

(दीपक दुआ राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त फिल्म समीक्षक हैं। 1993 से फिल्म–पत्रकारिता में सक्रिय। ‘सिनेयात्रा डॉट कॉम’ (www.cineyatra.com) के साथ–साथ विभिन्न समाचार पत्रों, पत्रिकाओं, वेब–पोर्टल, रेडियो, टी.वी. आदि पर सक्रिय दीपक ‘फिल्म क्रिटिक्स गिल्ड’ के सदस्य भी हैं।)

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