-दीपक दुआ… (This review is featured in IMDb Critics Reviews)
सभ्य लोगों की कॉलोनी में रहने वाली अकेली विधवा रेखा जी को कॉलोनी की औरतें ‘चालू’ समझती हैं और मर्द प्यासी नज़रों से देखते हैं। खासकर पड़ोसी गुप्ता जी के परिवार की नज़र में तो वह ‘डायन’ हैं। गुप्ता जी के घर में शादी है और एक रात वह रेखा जी के घर में आकर ‘मर’ गए हैं। अब रेखा और उनकी बेटियों जया व सुषमा को यह ‘लाश’ ठिकाने लगानी हैं। लेकिन कभी आ जाती हैं गुप्ताइन जी, कभी आ जाते हैं गुप्ता जी के साले दारोगा जी तो कभी रेखा के दामाद जी। अब भयंकर वाला कांड हुआ है और उसे छुपाना भी है तो खलबली तो मचेगी ही। लेकिन इस खलबली के पीछे का सच क्या है? क्या गुप्ता जी सचमुच ‘मरे’ हैं? गुप्ता जी वहां आए ही क्यों थे? क्या रेखा जी सचमुच ‘डायन’ हैं? क्या रेखा, जया और सुषमा अपने परिवार पर लगे दागों को धोकर सफेदी की चमकार वापस ला पाएंगी?
अब तक तीन अलग-अलग मिज़ाज की फिल्में-‘तुम्हारी सुलु’, ‘जलसा’ और ‘सूबेदार’ दे चुके निर्देशक सुरेश त्रिवेणी ने नेटफ्लिक्स पर आई ‘मां बहन’ (Maa Behen) को ‘सेक्रेड गेम्स’ और ‘लस्ट स्टोरीज 2’ लिख चुकी पूजा तोलानी के साथ मिल कर लिखा है। कहानी का ढांचा रोचक है। रेखा, जया और सुषमा अलग-अलग कारणों से समाज में बदनाम हैं। फिल्म उन्हें ‘चालू’ की इमेज के साथ सामने लाती भी है। लेकिन धीरे-धीरे जब कहानी की परतें खुलने लगती हैं तो कुछ और ही सच सामने आता है। इस सच के पीछे खोखला मर्दवाद भी है और नारीवाद का एक अलग रूप भी। फिल्म यह स्थापित करती है कि सामने दिखाई दे रहा सच सचमुच सच ही हो, यह ज़रूरी नहीं। फिल्म हमारे समाज की उन कुंठाओं और गिरी हुई सोच पर भी कमेंट करती है जो किसी औरत को उसके कपड़ों या काम से जज करने लगती है। फिल्म जताती है कि दूसरों के घरों की औरतों के बारे में कोई राय बनाने से पहले खुद से भी यह सवाल पूछ लेना चाहिए कि अपने घर में मां-बहन नहीं हैं क्या?
(रिव्यू-दिल जीतती ‘तुम्हारी सुलु’)
इस फिल्म (Maa Behen) की कहानी को अनोखे स्टाइल में दिखाया गया है। इसमें एक टी.वी. शो ‘खलबली’ पेश करने वाले एंकर की नैरेशन है और बैकग्राउंड में बजते गाने भी। यह स्टाइल इस कहानी को रोचक बनाता है। साथ ही इसके अतरंगी किरदार, उनकी सतरंगी बातें भी इसे दिलचस्प बनाती हैं। शुरू से ही इस फिल्म (Maa Behen) का फ्लेवर किसी कॉमिक सरीखा रहा है जिसमें चुटीले संवादों, बेवकूफाना हरकतों और कलाकारों की कॉमिक टाइमिंग से हास्य उपजता है। यह हास्य आपको ठहाके नहीं लगवाता लेकिन आपके चेहरे पर एक मुस्कान बनी रहती है। यह मुस्कान फिल्म का अंत आते-आते आपको सोचने पर भी मजबूर करती है।
इस फिल्म (Maa Behen) का स्वाद इसे कॉमेडी से ज्यादा व्यंग्य के खांचे में खड़ा करता है। जवानी में विधवा होकर अपने घर को चलाने के लिए शराब की दुकान में काम करने वाली रेखा को स्लीवलैस ब्लाउज पहनने का शौक है, जया अपने ससुराल में दिन-रात रोटियां बना रही है लेकिन पति यहां-वहां मुंह मार रहा है, वहीं सुषमा को सोशल मीडिया पर छाने का चस्का है। मां और इन दोनों बहनों के बीच अविश्वास की दीवार खड़ी हो चुकी है। लेकिन धीरे-धीरे यह दीवार दरकती है, कुछ सच सामने आते हैं और हमें पता चलता है कि जिसे हम कॉमेडी समझ रहे थे वह दरअसल हमारे समाज की सोच पर करारा व्यंग्य था। सुरेश त्रिवेणी ने बड़े कायदे के साथ किरदारों और घटनाओं की संरचना की है जिसमें ‘आदर्श कॉलोनी’ का नाम तक चोट करता है। सुषमा और उसके पिता से जुड़ा ट्रैक गैरजरूरी लगा।
माधुरी दीक्षित अपने प्रबल रूप में हैं-सुंदर, मोहिनी और सशक्त। तृप्ति डिमरी ने भी जोरदार काम किया है। धारणा दुर्गा आश्चर्यजनक रूप से शानदार रही हैं। रवि किशन, गीतांजलि कुलकर्णी, अरुणोदय सिंह, शार्दूल भारद्वाज, श्रीवर्द्धन त्रिवेदी, रमा शर्मा आदि ने भरपूर साथ निभाया। कुछ देर को आए जतिन सरना व परेश रावल ठीक रहे। गीत-संगीत फिल्म में रचा-बसा है।
इस फिल्म (Maa Behen) को कॉमिक नजरिए से देखिए या व्यंग्य की तरह, यह अच्छी ही लगती है। ऐसी फिल्में हड़बड़ी में समझ नहीं आतीं। समाज की जिस खलबली की बात ये करती हैं उसके लिए इन्हें ठहर कर, समझ कर देखना पड़ता है। यह फिल्म जो कहना चाहती है, कह पाती है। किसी भी कहानी की कामयाबी के लिए इतना काफी है।
(रेटिंग की ज़रूरत ही क्या है? रिव्यू पढ़िए और फैसला कीजिए कि यह कितनी अच्छी या खराब है। और हां, इस पोस्ट के नीचे कमेंट कर के इस रिव्यू पर अपने विचार ज़रूर बताएं।)
Release Date-04 June, 2026 on Netflix
(दीपक दुआ राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त फिल्म समीक्षक हैं। 1993 से फिल्म–पत्रकारिता में सक्रिय। ‘सिनेयात्रा डॉट कॉम’ (www.cineyatra.com) के साथ–साथ विभिन्न समाचार पत्रों, पत्रिकाओं, वेब–पोर्टल, रेडियो, टी.वी. आदि पर सक्रिय दीपक ‘फिल्म क्रिटिक्स गिल्ड’ के सदस्य भी हैं।)

