-दीपक दुआ…
दिसंबर, 2019 में आई मुदस्सर अज़ीज़ की ‘पति पत्नी और वो’ असल में 1978 में आई दिग्गज निर्देशक बी.आर. चोपड़ा की फिल्म ’पति पत्नी और वो’ का रीमेक थी। मूल फिल्म में संजीव कुमार, विद्या सिन्हा और रंजीता थे जबकि 2019 वाली फिल्म में कानपुर में सरकारी नौकरी कर रहा इंजीनियर कार्तिक आर्यन अपनी पत्नी भूमि पेढनेकर से छुपा कर अनन्या पांडेय से अफेयर कर रहा था। यह रीमेक ओरिजनल फिल्म की तरह क्लासिक भले ही नहीं थी लेकिन मसालेदार थी, सो कामयाब भी हुई। उस फिल्म के रिव्यू में मैंने लिखा था कि अब क्लासिक फिल्में किसे चाहिएं? जब दर्शक जंक-फूड से खुश हों तो फिल्म वाले भी क्यों ज़ोर लगाएं।
(रिव्यू-‘पति पत्नी और’ मसालेदार ‘वो’-2019)
अब बात आती है ‘पति पत्नी और वो दो’ (Pati Patni Aur Who Do) की जिसमें जंक ज़्यादा है, फूड कम। यह 2019 वाली फिल्म की कतार में खड़ी दूसरी फिल्म है और नाम के मुताबिक इस बार इसमें पति-पत्नी के अलावा ‘वो’ एक नहीं बल्कि दो हैं। लेकिन हमारे यहां दिक्कत यह है कि जब किसी कामयाब फिल्म की सीक्वेल, पार्ट-2 टाइप की चीज़ें बनाई जाती है तो उसे इतना ठोका-पीटा जाता है कि उसकी हालत पति-पत्नी की लड़ाई में फर्श पर पटके गए उन बर्तनों जैसी हो जाती है जो रहते तो बर्तन ही हैं लेकिन यहां-वहां डैंट पड़ने से पिचक चुके होते हैं। ‘पति पत्नी और वो दो’ भी ऐसी ही फिल्म है-पटकी गई, पिचकी हुई।
प्रयागराज में फॉरेस्ट अफसर आयुष्मान खुराना अपनी जर्नलिस्ट पत्नी वामिका गब्बी के साथ खुश है। ऑफिस में काम करने वाली रकुलप्रीत सिंह इन दोनों की दोस्त है। तभी बनारस से आयुष्मान के साथ पढ़ने वाली सारा अली खान आकर मदद मांगती है कि प्रेमी का पापा मेरे पीछे पड़ा है। आयुष्मान 15 दिन के लिए उसका ब्वॉयफ्रैंड बनने का नाटक करने को तैयार होता है। लेकिन यहां से जो रायता फैलने लगता है उससे रायते की झील बन जाती है।
इस किस्म की कन्फ्यूज़न भरी, ढेर सारे अतरंगी किरदारों वाली भागमभाग दिखाती कहानियां हमें अक्सर लुभाती आई हैं। चटपट संवाद, फटाफट घटनाएं और अंत में सब सही होकर हमें बताता है कि मसालेदार मनोरंजन को यदि कायदे से परोसा जाए तो दर्शक उंगलियां चाटते हुए उसका स्वाद लेते हैं। लेकिन ‘कायदे से’ परोसा जाए, तब न…! अब यहीं देखिए-यहां कन्फ्यूज़न भी है-वामिका को सारा के साथ-साथ रकुल पर भी शक है। ढेरों अतरंगी किरदार भी हैं-प्रेमी का विधायक पिता, उसके दो जासूस, वामिका के पेरेंट्स, आयुष्मान के ऑफिस के लोग, सारा की बुआ, एक करप्ट पुलिस वाला और न जाने कौन-कौन आते-जाते रहते हैं, एक-दूसरे पर शक भी करते रहते हैं। अंत में भागमभाग भी है। लेकिन यह सब सब इतना बनावटी और जबरन ठूंसा हुआ लगता है कि कुछ ही देर में इनसे बोरियत होने लगती है। और सबसे बड़ी बात-इस फिल्म (Pati Patni Aur Who Do) में ‘अफेयर’ नामक चीज़ है ही नहीं। लेयो कल्लो बात…!
यह सही है कि इस किस्म की उलझी हुई घटनाओं वाली स्क्रिप्ट लिखना आसान नहीं होता और मुदस्सर अज़ीज़ की मेहनत इस फिल्म की पटकथा में झलकती है। लेकिन कहीं बेहतर होता कि वह इसकी स्क्रिप्ट किसी अधिक चुटीले बंदे से लिखवाते। 117 मिनट की फिल्म (Pati Patni Aur Who Do) में से 27 मिनट के गाने निकाल दीजिए तो बाकी बचे 90 मिनट को भी अगर राइटर संभाल न पाए तो काहे की राइटरी।
बतौर निर्देशक मुदस्सर अज़ीज़ कभी बढ़िया फिल्म देते हैं तो कभी औसत। इस बार भी उन्होंने भागमभाग तो खूब मचाई लेकिन न तो वह विश्वसनीय माहौल बना सके और न ही अपने कलाकारों को संभाल सके। मसाले उन्होंने सारे डाले लेकिन तीखापन आ ही न सका। सारा अली और उनके प्रेमी वाला एंगल ही कमज़ोर रहा। वह आयुष्मान के पास गई ही क्यों थी? आयुष्मान को प्रेमी का नाटक करने वाला आइडिया न आता तो…? रकुल जैसी तीखी अदाकारा को किरदार क्या मिला? वामिका गब्बी आखिर किस किस्म की पत्रकारिता कर रही थी-विधायक के बेटे की प्रेमिका कौन…? वामिका ने सारा को ऑटो में देख कर पहचाना कैसे?
आयुष्मान खुराना इतना ओवर काहे हो रहे थे? उनके कैरियर की अति खराब परफॉर्मेंस में गिनी जानी चाहिए यह फिल्म। तीनों नायिकाओं को जो सीन मिले, उन्होंने सही से निभा दिए। रकुल थोड़ा ऊपर रहीं बाकी दोनों से। बाकी, पर्दे पर ‘दिखने-दिखाने’ वाला काम तो आज की अभिनेत्रियां अच्छे-से कर ही लेती हैं। तिग्मांशु धूलिया, दुर्गेश कुमार, शशि वर्मा, अलका अमीन आदि ठीक रहे। बुआ बनीं आयशा रज़ा मिश्रा और इंस्पैक्टर बने विजय राज़ प्रभावी लगे। किरदारों की बोली में वही कनपुरिया अंदाज़ रहा जो अब हर ऐसी फिल्म में होता है जो सब्सिडी की लालसा में उत्तर प्रदेश जा पहुंचती हैं। यह अलग बात है कि यह फिल्म उत्तर प्रदेश के विधायक को गुंडा और पुलिस वाले को भ्रष्ट दिखाती है। योगी जी, अब दे दीजिए इसे सब्सिडी।
ऐसी फिल्मों में अब गानों की अहमियत इतनी रह गई है कि पुराने गानों के रीमिक्स डाल दो और नए गानों के टुकड़े। कुछ गानों को रीबूट कर दो, कुछ को रीबॉर्न। अब कोई यह पूछे कि प्रयागराज, बनारस, कानपुर के तमाम लोग पंजाबी गाने काहे गा रहे हैं तो उन्हें बोलो-दुर्र फिट्टे मुंह…!
असल में जब सारी कसरत दो और दो को मिला कर पांच करने की हो तो दर्शकों को ट्रेलर भी ऐसा परोसा जाता है जिसके कई संवाद फिल्म में होते ही नहीं हैं। मकसद सिर्फ भीड़ जुटाना है। दर्शक इनके लिए भेड़ है, हांको और बुला कर घेर लो बाड़े में।
(रेटिंग की ज़रूरत ही क्या है? रिव्यू पढ़िए और फैसला कीजिए कि यह कितनी अच्छी या खराब है। और हां, इस पोस्ट के नीचे कमेंट कर के इस रिव्यू पर अपने विचार ज़रूर बताएं।)
Release Date-15 May, 2026 in theaters
(दीपक दुआ राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त फिल्म समीक्षक हैं। 1993 से फिल्म-पत्रकारिता में सक्रिय। ‘सिनेयात्रा डॉट कॉम’ (www.cineyatra.com) के साथ-साथ विभिन्न समाचार पत्रों, पत्रिकाओं, वेब-पोर्टल, रेडियो, टी.वी. आदि पर सक्रिय दीपक ‘फिल्म क्रिटिक्स गिल्ड’ के सदस्य भी हैं।)
