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रिव्यू: रूखा-सूखा ‘कर्तव्य’

Deepak Dua by Deepak Dua
2026/05/15
in CineYatra, फिल्म/वेब रिव्यू
0
रिव्यू: रूखा-सूखा ‘कर्तव्य’
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-दीपक दुआ…

एक पुलिस वाला दूसरे पुलिस वाले से कह रहा है-‘धरम करते हैं करम छूटता है, करम करते हैं धरम छूटता है। कर्तव्य तक तो बात ही नहीं पहुंचती।’

गौर करें तो यह संवाद ही अपने-आप में गलत है। कर्तव्य का अर्थ ही होता है ‘धर्मानुकूल कर्म’ यानी अपने धर्म को निभाते हुए किया गया कर्म। लेकिन हमारे फिल्मी लेखकों को तो भारी-भरकम संवाद लिखने हैं, भले ही उनका कुछ अर्थ निकले या न निकले। रही-सही कसर तब पूरी हो जाती है जब ये भारी संवाद एक हल्की कहानी और कमजोर स्क्रिप्ट में जबरन घुसाए जाते है। साफ लगता है कि दो चवन्नियां चिपका कर अठन्नी बनाने की कोशिश हो रही है। इन्हीं चिपकी हुई चवन्नियों को ट्रेलर में देख कर दर्शक फिल्म (Kartavya) देखने बैठता है और जब खुद को ठगा हुआ महसूस करता है तो सोचता है काश, रिव्यू पहले पढ़ लिया होता।

भारत के किसी काल्पनिक प्रदेश के झामली नामक कस्बे (वैसे पुलिस स्टेशन के बोर्ड पर लगा एसटीडी कोड 01398 उत्तर प्रदेश के शामली का है) का थानेदार पवन बाहर से आई एक नामी पत्रकार की सुरक्षा कर रहा है। लेकिन वह गोलीबारी में मारी जाती है। इल्जाम एक बच्चे पर है। शहर में धर्मगुरु आनंद श्री का आतंक है। सब लोग उस बच्चे के पीछे हैं। पवन धर्म और कर्म के बीच झूल रहा है। उधर उसका भाई एक दूसरी जात की लड़की के साथ गायब है। गांव के लोग उन दोनों के पीछे हैं। पवन यहां भी धर्म और कर्म के बीच झूल रहा है।

शाहरुख खान के बैनर से राइटर-डायरेक्टर पुलकित पिछले साल नेटफ्लिक्स पर ‘भक्षक’ नाम से एक वेब-सीरिज लेकर आए थे। नेटफ्लिक्स पर आई यह फिल्म ‘कर्तव्य’ (Kartavya) भी इन्हीं लोगों की है। लेकिन इसकी कहानी इस कदर बासी, सूखी और ठहरी हुई है कि इसे देखते हुए आप टाइम ट्रैवल कर के बीच-पच्चीस साल पीछे जा सकते हैं। इस फिल्म का सबसे कमज़ोर पक्ष इसकी लिखाई ही है। आनंद श्री है कौन? उसका इतना प्रभाव क्यों है? वह क्या गलत धंधे करता है? क्यों करता है? पुलिस उसके सामने पानी क्यों भरती है? वह रिपोर्टर आनंद श्री के कारनामों की पड़ताल करने आ रही है तो पुलिस किस की तरफ है? हर आदमी या तो आनंद श्री से खौफ खाता है या उसके गुण गाता है, ऐसा क्यों? उधर दो अलग-अलग जात के लड़का-लड़की ने प्यार किया तो हर कोई बस उन्हें मार कर गाड़ने पर आमादा क्यों है? एक भी आवाज न तो उधर उठ रही है, न इधर। फिर मुर्दों की इस बस्ती में अकेला पवन कैसे ज़िंदा रह गया?

स्क्रिप्ट राइटिंग के बेसिक उसूलों को अनदेखा कर के लिखी गई इस फिल्म (Kartavya) की पटकथा पोपली है। ऊपर से पुलकित का डायरेक्शन सुस्त है। यह पता ही नहीं चलता कि इस फिल्म को लिखने-बनाने के पीछे क्या इरादा रहा होगा? आखिर यह दर्शकों से कहना क्या चाहती है? और किस तरह से कहना चाहती है? जिन्हें बचना था, वे बचे नहीं और जो मुख्य कारण था, वह अभी भी मौजूद है, तो ऐसे में कहानी के हीरो की किस हीरोगिरी की तारीफ की जाए? और हां निर्देशक साहब, आपका हीरो इतनी सिगरेट क्यों पीता है? क्या सैफ ने डिमांड की होगी या सिगरेट लॉबी का पैसा आया? क्योंकि यही किरदार बिना धुआं उड़ाए भी उतना ही प्रभावी लगता।

सैफ अली खान का काम अच्छा है। काम तो खैर रसिका दुग्गल, ज़ाकिर हुसैन, मनीष चौधरी, संजय मिश्रा, युद्धवीर अहलावत, दुर्गेश कुमार आदि का भी ठीक ही है। लेकिन दिक्कत इनके किरदारों के साथ है जो कायदे का स्टैंड नहीं ले पाते। ऊपर से इन्हें बोलने के लिए हरियाणवी, राजस्थानी, ब्रज और पश्चिमी यू.पी. की ऐसी खिचड़ी भाषा दे दी गई कि इन बेचारों का आधा एफर्ट तो संवाद बोलने में निकल गया, एक्सप्रैशंस पर ये ध्यान ही नहीं दे पाए। अरे हां, आनंद श्री बने सौरभ द्विवेदी की ‘एक्टिंग’ की बात तो रह ही गई। भैया सौरभ, आप पत्रकार ही ठीक हो, इस काम में कूद कर क्यों छींटे लगवा रहे हो?

सच तो यह है कि इस फिल्म (Kartavya) में ऐसा कुछ भी खास नहीं है, जिसका उल्लेख किया जाए। ऐसी फिल्में बन रही हैं और उन्हें ऐसे नामी लोग बना रहे हैं जिनकी तरफ सिनेमा उम्मीद भरी नज़रों से देखता है, यह और ज़्यादा चिंता का विषय है।

(रेटिंग की ज़रूरत ही क्या है? रिव्यू पढ़िए और फैसला कीजिए कि यह कितनी अच्छी या खराब है। और हां, इस पोस्ट के नीचे कमेंट कर के इस रिव्यू पर अपने विचार ज़रूर बताएं।)

Release Date-15 May, 2026 on Netflix

(दीपक दुआ राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त फिल्म समीक्षक हैं। 1993 से फिल्म-पत्रकारिता में सक्रिय। ‘सिनेयात्रा डॉट कॉम’ (www.cineyatra.com) के साथ-साथ विभिन्न समाचार पत्रों, पत्रिकाओं, वेब-पोर्टल, रेडियो, टी.वी. आदि पर सक्रिय दीपक ‘फिल्म क्रिटिक्स गिल्ड’ के सदस्य भी हैं।)

Tags: durgesh kumargauri khankartavyakartavya reviewmanish chaudharyNetflixpulkitrasika dugalsaif ali khansanjay mishrasaurabh dwivedizakir hussain
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