-दीपक दुआ… (This review is featured in IMDb Critics Reviews)
50 के दशक में मुंबई की कपड़ा मिलों के इलाके में काम करने वाले रतन खत्री ने देखा कि कल्याणजी भगत नाम का एक आदमी न्यूयॉर्क कॉटन एक्सचैंज में कपास के चढ़ते-गिरते भावों पर लोगों से सट्टा लगवाता है। तब रतन खत्री ने एक नया खेल शुरू किया। जुए के इस खेल को रोचक बनाते हुए वह एक मटके में ताश के पत्ते डाल कर सबके सामने निकालता और जीतने वालों को तुरंत पैसे देता। कुछ ही सालों में उसका यह खेल ‘मटका’ पूरे देश में फैल गया। एक दिन में एक करोड़ रुपए तक का सट्टा लगने लगा और लोग उसे ‘मटका किंग’ तक कहने लगे। बाद में वह फिल्म निर्माण में भी घुसा। 1975 में इमरजैंसी लगी तो उसे जेल में भी डाला गया। वहां से छूट कर उसने फिर यह काम शुरू कर दिया और 90 के दशक तक सक्रिय रहा। 2020 में रतन खत्री की मृत्यु हुई।
अमेज़न प्राइम वीडियो पर आई इस वेब-सीरिज़ में अपने सेठ की नौकरी छोड़ कर ब्रिज भट्टी के ‘मटका’ शुरू करने और ‘मटका किंग’ बनने से लेकर इमरजेंसी लगने तक की कहानी दिखाई गई है, कुछ फिल्मी अंदाज़ में। साफ है कि बाकी की कथा अगले सीज़न में दिखेगी।
अभय कोराणे और नागराज मंजुले की लिखाई और बुनाई इस वेब-सीरिज़ के ज़रिए हमें 60-70 के दशक की उस मुंबई में ले जाती है जब यह शहर सपने देखने और उन्हें सच करने में जुटे लोगों का सहारा बना हुआ था। किस्म-किस्म के सही-गलत धंधे करने वाले अपने-अपने तरीके से इस शहर को और खुद को समृद्ध बनाने में लगे हुए थे।
यह कहानी दिखाती है कि कैसे उस समय के आम लोग ही नहीं बल्कि बेहद अमीर लोग भी गैरकानूनी जुए के इस रोचक खेल के ज़रिए खुद को मालामाल कर रहे थे। पुलिस वाले अपनी जेबें भर रहे थे, नेता अपने उल्लू सीधे कर रहे थे। पूरे मुंबई मीडिया में सिर्फ एक पत्रकार था जो इस मटके के खिलाफ लिखना चाहता था लेकिन उसे रोका जा रहा था। पर जब राजनीतिक समीकरण बदले तो उसकी कलम को भी इस्तेमाल किया गया। एक बात और यह सीरिज़ दिखाती है कि उस समय की कांग्रेस सरकार इस मटके में खासी दिलचस्पी ले रही थी। एक केंद्रीय मंत्री ने मटका किंग को दिल्ली बुला कर एक कुख्यात गैंग्स्टर से हाथ मिलाने को कहा था ताकि वह क्रिकेट का सट्टा देश भर में फैला सके। यानी जाने-अनजाने यह सीरिज़ उस दौर की राजनीतिक सच्चाइयों को भी सामने ला रही है।
लेकिन इस सीरिज़ की पटकथा कई जगह काफी सुस्त है। कई बार मन में आता है कि ये फालतू के लंबे-लंबे सीन क्यों? बनाने वालों को लंबे-लंबे आठ एपिसोड ही क्यों बनाने हैं? हर सीरिज़ बनाते समय एक से अधिक सीज़न का मोह क्यों पाला जाता है। जुए से लोगों की बर्बादी का ज़िक्र है लेकिन इसे दिखाया नहीं गया है। पटकथा में कई जगह गड़बड़ियां हैं और संवादों में भी लोचा है। सीरिज़ की सबसे बड़ी ‘खासियत’ (या कमी) यह है कि यह मटका किंग ब्रिज भट्टी के किए हर काम को जायज़ ठहराती है। इसे देखने के बाद साफ महसूस होता है कि यह उस शख्स की छवि चमकाने के लिए बनाई गई है जो एक गैरकानूनी धंधा (बहुत ही ईमानदारी से) चला रहा था। जो सरकार को बार-बार कह रहा था कि मेरे धंधे को कानूनी बना दो, मैं सरकार को कमा कर दूंगा। जो एक गैर औरत से रिश्ता रखे हुए है लेकिन पूरे हक के साथ। जिसने अपने साथियों, करीबियों की कभी कद्र नहीं की, लेकिन था बहुत अच्छा इंसान। यह सीरिज़ बार-बार ब्रिज भट्टी को संत, मददगार और जीवट वाला इंसान साबित करती है। और हां, बार-बार मटका-मटका करती इस सीरिज़ में ‘मटका’ काफी कम समय दिखता है।
उस दौर की मुंबई के माहौल और किरदारों को विश्वसनीय ढंग से चित्रित करने में कामयाब रही है यह सीरिज़। सैट्स, प्रोडक्शन, कॉस्ट्यूम आदि का पूरा साथ मिला है इसे। कैमरा वर्क बढ़िया है। गाने और बैकग्राउंड म्यूज़िक भी।
विजय वर्मा ने बढ़िया अभिनय किया है, एकदम सटीक। सई तम्हाणकर, कृतिका कामरा और जैमी लीवर ने उम्दा अभिनय दिखाया। गुलशन ग्रोवर, गिरीश कुलकर्णी, भरत जाधव, सायरस साहूकार, कॉलेज प्रोफेसर बने आकाश सिन्हा आदि भी जंचे। ब्रिज के भाई लच्छू बने भूपेंद्र जड़ावत हल्के रहे। लेकिन सबसे ऊपर नाम लिया जाना चाहिए सिद्धार्थ जाधव का। कॉमेडी शोज़ में हंसाता रहा यह शख्स कमाल का अभिनेता है। अगले सीज़न में वह और खुल कर आएंगे।
इस सीरिज़ में बहुत अधिक पैनापन भले ही न हो लेकिन तगड़े पैसे कमाने की अंधी दौड़ में आपसी रिश्तों को खोखला करने में जुटे लोगों की इस कहानी को टाइम पास के लिए देखा जा सकता है।
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Release Date-17 April, 2026 on Amazon Prime Video
(दीपक दुआ राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त फिल्म समीक्षक हैं। 1993 से फिल्म-पत्रकारिता में सक्रिय। ‘सिनेयात्रा डॉट कॉम’ (www.cineyatra.com) के साथ-साथ विभिन्न समाचार पत्रों, पत्रिकाओं, वेब-पोर्टल, रेडियो, टी.वी. आदि पर सक्रिय दीपक ‘फिल्म क्रिटिक्स गिल्ड’ के सदस्य भी हैं।)

