-दीपक दुआ…
‘प्रहार’ में मेजर चव्हाण बने नाना पाटेकर मुंबई में हफ्ता वसूलने और आम आदमियों को आतंकित करने वाले गुंडों को मारने के बाद कोर्ट में कहते हैं-‘आर्मी में हमें सिखाया जाता है देश के लिए लड़ना… अगर लड़ाई के मैदान बदल जाते हैं तो इसमें मैं क्या कर सकता हूं…?’
इस फिल्म ‘सूबेदार’ (Subedaar) का सूबेदार अर्जुन मौर्य भी यही कर रहा है। पत्नी की असमय मौत के बाद फौज से रिटायर होकर आए अर्जुन की अपनी जवान बेटी श्यामा से नहीं बन रही है। बन तो असल में उसकी किसी से भी नहीं रही है। फौज की ज़िंदगी से अलग अपने शहर के जंगलराज की अव्यवस्थाओं और मनमानियों को वह चुप्पी से झेले जा रहा है। शहर में बालू माफिया बबली दीदी का राज है। बबली का भाई प्रिंस सूबेदार को उकसाता है तो वह भिड़ जाता है। उधर श्यामा अलग ही उलझी पड़ी है।
यह फिल्म ‘सूबेदार’ (Subedaar) हमें चंबल के इलाके के एक ऐसे शहर में ले जाती है जहां कानून और व्यवस्था, दोनों ही कुछ लोगों ने अपने ठेंगे पर रखे हुए हैं। व्यवस्था मनमाने ढंग से चल रही है और कानून बबली दीदी की मर्ज़ी से। गुंडों की हरकतें दहलाती हैं। आम जनता की हालत देख कर खौफ महसूस होता है। कई बार तो यकीन नहीं होता कि कहीं इतने बुरे हालात में भी लोग रह रहे होंगे। मगर फिर अखबारी खबरें याद आती हैं तो लगता है कि इनमें अतिश्योक्ति भले ही हो, झूठ कहां हैं? ताकतवर लोगों का सिस्टम को हांकना हम रोज़ ही तो देखते हैं।
प्रज्वल चंद्रशेखर और सुरेश त्रिवेणी की कलम फिल्म में दहशत का माहौल रच पाने में कामयाब रही है। लेकिन स्क्रिप्ट और किरदार-रचना बहुत जगह गड़बड़ है। सूबेदार इतना चुप क्यों रहता है, उसकी बेटी उसका पक्ष क्यों नहीं समझती, अपनी बेटी को वह समझा क्यों नहीं पाता, वह बबली दीदी के यहां नौकरी के लिए जाता ही क्यों है, जवान बेटी के साथ ऐसे शहर में रह कर गुंडों से भिड़ने का रिस्क उठाने से पहले वह आगा-पीछा क्यों नहीं सोचता, उस शहर के लोग इतने ‘मुर्दा’ क्यों हैं, बबली और प्रिंस की ताकत के पीछे क्या है, सूबेदार को रिटायरमैंट से पहले अपने शहर के हालात की खबर नहीं थी क्या, कानून और पुलिस इतने निष्क्रिय क्यों हैं जैसे अनेक तार्किक सवाल मन में उठते हैं और यह फिल्म ‘सूबेदार’ (Subedaar) हमें खुल कर उनके जवाब नहीं दे पाती। कहानी के कई सारे मोड़ ‘फिल्मी-से’ लगते हैं। क्लाइमैक्स में तो ज़बर्दस्त ‘फिल्मी’ खेल हुआ है। दरअसल यह वाली दिक्कत हिन्दी सिनेमा के ज़्यादातर लेखकों-निर्देशकों के साथ रहती है कि वे कहानी को फैला तो देते हैं, लेकिन उसे समेटते हुए उनकी कल्पनाशीलता का विस्तार सिमट कर रह जाता है।
(रिव्यू-बिना शोर-शराबे का ‘जलसा’)
‘तुम्हारी सुलु’ और ‘जलसा’ जैसी साधारण फिल्में दे चुके निर्देशक सुरेश त्रिवेणी कई जगह अपनी काबलियत का असरदार परिचय देते हैं। उनके बनाए कई सीन गहरा असर छोड़ते हैं। सभी कलाकारों से बेहद सधा हुआ काम निकलवाया है उन्होंने। अनिल कपूर एंग्री ओल्ड मैन लगे हैं, राधिका मदान, मोना सिंह, सौरभ शुक्ला, आदित्य रावल, फैज़ल मलिक जैसे कलाकारों ने बेहद विश्वसनीय अभिनय किया है। कुछ पल को दिखे नाना पाटेकर, मानव कौल, खुशबू सुंदर, विनोद गोस्वामी आदि भी जंचे हैं। लोकेशन वास्तविक लगती हैं, एक्शन कमाल का है, बैकग्राउंड म्यूज़िक, कैमरा आदि फिल्म ‘सूबेदार’ (Subedaar) को असरदार बनाते हैं। किरदारों की भाषा और गाने फिल्म के माहौल के मुताबिक हैं।
(रिव्यू-डगमगाते हुए मंज़िल पर पहुंची ‘अपूर्वा’)
अमेज़न प्राइम वीडियो पर आई ‘सूबेदार’ (Subedaar) डराती है। ठीक वैसे जैसे अनुष्का शर्मा वाली ‘एन.एच. 10’ या तारा सुतारिया वाली ‘अपूर्वा’ ने डराया था। चंबल की पृष्ठभूमि होने के कारण यह ‘अपूर्वा’ जैसी लुक देती है। लेकिन इसकी यही लुक इसे दशकों पीछे भी ले जाती है। ऐसी फिल्में मनोरंजन कम और दहशत अधिक देती हैं। ऊपर से इसकी एकरसता खलती है। टाइमपास करना चाहें तो देखिए इसे।
(रेटिंग की ज़रूरत ही क्या है? रिव्यू पढ़िए और फैसला कीजिए कि यह कितनी अच्छी या खराब है। और हां, इस पोस्ट के नीचे कमेंट कर के इस रिव्यू पर अपने विचार ज़रूर बताएं।)
Release Date-05 March, 2026 on Amazon Prime Video
(दीपक दुआ राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त फिल्म समीक्षक हैं। 1993 से फिल्म–पत्रकारिता में सक्रिय। ‘सिनेयात्रा डॉट कॉम’ (www.cineyatra.com) के साथ–साथ विभिन्न समाचार पत्रों, पत्रिकाओं, वेब–पोर्टल, रेडियो, टी.वी. आदि पर सक्रिय दीपक ‘फिल्म क्रिटिक्स गिल्ड’ के सदस्य भी हैं।)
