-दीपक दुआ… (This review is featured in IMDb Critics Reviews)
लड़की हाथ छुड़ा कर मुड़ी तो उसकी चूड़ी का कांच टूट कर लड़के को ज़ख्म दे गया। ऐसा ज़ख्म कि उसने शहर को फूंकना चाहा। लड़की किसी और से शादी करने चली तो वह उसे श्रॉप दे आया कि शंकर करे तुझे बेटा हो, तुझे भी पता चले कि इश्क में जो मर जाते हैं वो भी किसी के बेटे होते हैं।
कहानी की यह झलक बताती है कि यह फिल्म हमें इश्क-मोहब्बत के उन दर्द भरे रास्तों पर ले जाने आई है जिसे देख कर आशिकों के दिल तड़पते हैं और जिन्होंने कभी प्यार न किया हो वे सुकून महसूस करते हैं। फिल्मकार आनंद एल. राय की ‘रांझणा’ भी तो ऐसी ही फिल्म थी जिसमें मुरारी ने कुंदन से कहा था-मर जाओ पंडित। पंडित उस फिल्म में इश्क करते हुए मरा तो इस फिल्म में भी वही रूप धर कर आ गया। वैसे भी सभी दिलजले, बर्बाद आशिकों की सूरत एक जैसी ही हो जाती है।
लेकिन इस फिल्म का शंकर ‘रांझणा’ के कुंदन से अलग है। शंकर के भीतर गुस्सा है, हिंसा है। इसी गुस्से को काबू में लाने निकली है मुक्ति। शंकर को मुक्ति से प्यार हो जाता है लेकिन मुक्ति आसानी से भला कहां मिलती है। शंकर तो अपने गुस्से को दूसरी दिशा में मोड़ लेता है लेकिन मुक्ति…!
हिमांशु शर्मा और नीरज यादव की लिखाई कहीं-कहीं बहुत गहरी है। जब-जब प्यार की कसक, तड़प की बातें हुई हैं तो असरदार रही हैं। लेकिन पटकथा को फैलाते समय जहां ये लोग मनचाही सहूलियतें लेते रहे वहीं अंत में इसे समेटते हुए ये खुद ही बिखर गए। अतार्किक बातों को छोड़ भी दें तो भी घटनाओं का प्रवाह सहज नहीं लगता। काफी कुछ है जो अखरता है और अक्सर यह सवाल भी आता है कि आप कुछ भी दिखाओगे और हम हज़म कर लेंगे? किरदारों की रूपरेखा भी सटीक नहीं है। कभी ये सधे हुए लगते हैं तो कभी फैल जाते हैं।
आनंद एल. राय को सिनेमाई शिल्प की समझ है और यह बात वह बार-बार साबित भी करते हैं। उन्हें सीन बनाने भी आते हैं और असर छोड़ना भी। लेकिन इस बार कहानी के पैंतरों ने उनके हाथ बांध लिए। एयरफोर्स, नेवी, युद्ध वाला पूरा एंगल ही फिज़ूल लगा। बहुत जगहों पर वी.एफ.एक्स. का बनावटीपन साफ महसूस होता रहा। लेकिन कई सीन, कई संवाद प्रभावशाली भी रहे। फिल्म की लंबाई इंटरवल के बाद अखरती रही। थोड़ी और कसावट इसे निखार सकती थी।
यह फिल्म देखने की बड़ी वजह इसके कलाकारों की एक्टिंग हो सकती है। शंकर बने धनुष का पर्दे पर होना पर्दे को जीवंत कर जाता है। उनके दोस्त के किरदार में प्रियांशु पैन्यूली ने पूरा दम दिखाया। कृति सैनन कई जगह खूब जंचीं। अपने किरदार के विविध रंगों को उन्होंने असरदार तरीके से दिखाया। उनके किरदार को बार-बार सिगरेट पीते हुए दिखाए जाने के पीछे क्या वजह हो सकती है? क्या सिगरेट लॉबी के ये अप्रत्यक्ष विज्ञापन हैं? प्रकाश राज बेहद प्रभावशाली रहे। तोता रॉय चौधरी, जया भट्टाचार्य, चित्तरंजन त्रिपाठी आदि ने ठीक काम किया। कुछ पल को आए मौहम्मद ज़ीशान अय्यूब जंचे।
इरशाद कामिल के गीत और ए.आर. रहमान के संगीत में दम है और गहराई भी, लेकिन ‘रांझणा’ के गानों जैसी तुरंत पसंद आने और लंबे समय तक जमे रहने वाली बात नज़र नहीं आई। इस फिल्म को ‘रांझणा’ से भी जोड़ा गया है और इसके अगले भाग की संभावना भी जताई गई है। लेकिन मज़बूत कहानी और मज़बूत फिल्मांकन की कमी इस फिल्म को ‘रांझणा’ नहीं होने देती और यह बस एक टाइमपास किस्म की ‘तेरे इश्क में’ बन कर रह जाती है।
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Release Date-28 November, 2025 in theaters
(दीपक दुआ राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त फिल्म समीक्षक हैं। 1993 से फिल्म–पत्रकारिता में सक्रिय। ‘सिनेयात्रा डॉट कॉम’ (www.cineyatra.com) के साथ–साथ विभिन्न समाचार पत्रों, पत्रिकाओं, वेब–पोर्टल, रेडियो, टी.वी. आदि पर सक्रिय दीपक ‘फिल्म क्रिटिक्स गिल्ड’ के सदस्य भी हैं।)

बेहतरीन। आपके भी शब्द कुछ कम इश्कबाज़ थोड़े ही हैं। फिल्म देखने से पहले आपके शब्दों की चाशनी में बनी यह जलेबी स्वादिष्ट है। बधाई एक अच्छी समीक्षा के लिए।
धन्यवाद, आभार…