-दीपक दुआ… (This review is featured in IMDb Critics Reviews)
कर पाओगी…? हर उस लड़की से, जिसने कुछ नया, कुछ अनोखा, कुछ बड़ा करने का सोचा तो उसके परिवार का, समाज का, दुनिया का, हमारा, आपका पहला सवाल यही तो होता है-कर पाओगी…? हेतल दवे से भी यही पूछा गया था। हेतल दवे को तो जानते हैं न आप? नहीं…! अच्छा, सुमो कुश्ती तो आपको पता ही होगी। वही जापानी कुश्ती जिसमें बहुत मोटे-मोटे पहलवान आपस में भिड़ते हैं। भारत में तो यह लोकप्रिय ही नहीं है। लेकिन यह जान कर आप हैरान हो सकते हैं कि भारत की पहली और इकलौती महिला सुमो प्लेयर का नाम है हेतल दवे जिन्होंने बरसों पहले इस खेल में भारत का नाम चमकाया था। यह फिल्म ‘सुमो दीदी’ (Sumo Didi) उन्हीं हेतल दवे की कहानी दिखाती है।
हेतल को उसके मोटापे के चलते बहुत कुछ सहना, सुनना पड़ता है। खुद उसके अपने परिवार के लोग भी उसे जताते-सुनाते रहते हैं। हेतल जूडो खेलती है। एक दिन जापान से आए एक नामी सुमो खिलाड़ी से मिलने के बाद वह भी सुमो प्लेयर बनने का ठान लेती है। पिता उसके साथ हैं लेकिन मां नहीं। आखिर मां कहती हैं-एक साल ले लो, कामयाब नहीं हुईं तो उसके बाद शादी। हेतल जुट जाती है, लड़ती है, भिड़ती है, पहले दूसरों से, फिर खुद से और आखिर…!
अपनी मिट्टी से उठ कर आसमान छूने वाले खिलाड़ियों की इस किस्म की बायोपिक नुमा कहानियां हमें पसंद आती रही हैं। लेकिन इस तरह की कहानियों के साथ जोखिम यह रहता है कि यह हर किसी को स्वादिष्ट नहीं लगतीं क्योंकि अधिकांश दर्शक या तो उस खेल से या उस खिलाड़ी से खुद को जोड़ नहीं पाते। यहां भी यही हुआ है। भारत में सुमो कुश्ती और उसे खेलने वाली एक लड़की-इन दोनों ही बातों से अनजान दर्शक इस फिल्म से खुद को जोड़ भी ले लेकिन इस फिल्म (Sumo Didi) की लिखाई का रूखा और काफी हद तक सूखा फ्लेवर आड़े आ जाता है। कहानी का वही पुराना, तय ढर्रा, नाटकीयता की कमी, भावुक क्षणों की कमी और रोचक व घुमावदार मोड़ों की कमी इस कथा को ज़्यादातर समय सपाट और कहीं-कहीं तो डॉक्यूमैंट्री जैसी बनाती रही।
जहां लिखाई का पक्ष बहुत ज़्यादा ज़ोरदार नहीं रहा तो वहीं जयंत रोहतगी का निर्देशन भी हल्का दिखा। बहुत सारे सीन उन्होंने सादे ढंग से बना दिए जबकि ऐसे मिज़ाज की फिल्मों में सीन कसे हुए और नुकीले होने चाहिएं ताकि दर्शक को चुभ सकें, उसे उद्वेलित कर सकें। ज़ी-5 पर आई यह फिल्म (Sumo Didi) कहीं-कहीं ही बांध पाई है। और हां, राइटर व डायरेक्टर साहब, ऐसे मिज़ाज व स्वाद वाली फिल्म के बीच में लिप-किस्स डाल कर आप कचरे की मात्रा बढ़ाते हैं, यह जान लीजिए।
हेतल की भूमिका में श्रीयम भगनानी उम्दा काम करती हैं। अपनी काया में वह सहज लगती हैं और उनकी यह सहजता हेतल के चरित्र में झलकी है। इस किरदार को पकड़ने के लिए की गई उनकी मेहनत भी पर्दे पर उभर कर दिखती है। उनके गर्व करते पिता बने नितेश पांडेय और चिंता करती मां बनीं अनुभा फतेहपुरिया खूब जंचे हैं। राघव धीर और चैतन्य शर्मा का काम भी अच्छा रहा लेकिन इन किरदारों को थोड़ा और विस्तार व गहराई मिलती तो बेहतर होता। लोकेशन, कैमरा आदि अच्छा रहा। गीत-संगीत बहुत दमदार न होने पर भी फिल्म में फिट रहे।
हेतल की कहानी के बहाने से यह फिल्म (Sumo Didi) हमारी बेटियों के आगे बढ़ने, कुछ हासिल करने की ललक को तो दिखाती ही है, यह भी बताती है कि एक मददगार परिवार, दोस्त और समाज साथ दें तो कोई भी ऊंचाइयां पा सकता है। फिल्म कुछ क्षणों में खूब भावुक भी करती है। खासकर वहां, जहां हेतल कुछ बड़ा करती है, कुछ हासिल करती है। ऐसे दृश्यों को देखते समय, मुमकिन है आपकी आंखों से कुछ बह निकले। गौर कीजिएगा, वह सिर्फ पानी नहीं होगा, उसके साथ वह शक भी बहता दिखेगा जो अक्सर हमारी बेटियों से पूछ बैठता है-कर पाओगी…?
(रेटिंग की ज़रूरत ही क्या है? रिव्यू पढ़िए और फैसला कीजिए कि यह कितनी अच्छी या खराब है। और हां, इस पोस्ट के नीचे कमेंट कर के इस रिव्यू पर अपने विचार ज़रूर बताएं।)
Release Date-23 October, 2026 on ZEE5
(दीपक दु
आ राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त फिल्म समीक्षक हैं। 1993 से फिल्म–पत्रकारिता में सक्रिय। ‘सिनेयात्रा डॉट कॉम’ (www.cineyatra.com) के साथ–साथ विभिन्न समाचार पत्रों, पत्रिकाओं, वेब–पोर्टल, रेडियो, टी.वी. आदि पर सक्रिय दीपक ‘फिल्म क्रिटिक्स गिल्ड’ के सदस्य भी हैं।)


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