-अरविंद अरोड़ा… (This review is featured in IMDb Critics Reviews)
हिन्दी सिनेमा में कॉमेडी फिल्में हमेशा से लोकप्रिय रही हैं, लेकिन आज के समय में बॉक्स-ऑफिस के मानदंड इतने अनिश्चित और निर्मम हो चुके हैं कि ज़रा-सी चूक होने पर भी फिल्म के डूबने के आसार बढ़ जाते हैं। ऐसे में ज़्यादातर निर्माता-निर्देशकों को बड़े स्टार्स वाली एक्शन फिल्में या साउथ की रीमेक ही ज़्यादा सुरक्षित लगती हैं।
ऐसे वक्त में जब कोई नवोदित निर्देशक एक अनछुए विषय को लेकर मैजिक रियलिज़्म अर्थात जादुई यथार्थवाद जैसी प्रयोगात्मक शैली के साथ मैदान में उतरता है तो यह उसकी हिम्मत का परिचायक है। ’फुकरे’ फ्रैंचाइज़ से नाम कमाने वाले लेखक विपुल विग की बतौर निर्देशक पहली प्रस्तुति ’राहु केतु’ एक ऐसी ही फिल्म है। यह न तो कोई फॉर्मूलाबद्ध मसाला कॉमेडी है और न ही सिर्फ हंसाने की मशीन। यह एक कोशिश है पारंपरिक मान्यताओं को आधुनिक हास्य से जोड़ने की और उसमें भ्रष्टाचार जैसे सामाजिक मुद्दे को भी हल्के-फुल्के अंदाज़ में छूने की।
फिल्म की बुनियाद है ज्योतिष की एक प्राचीन अवधारणा-राहु और केतु नामक दो छाया ग्रह, जो अपशकुन का प्रतीक माने जाते हैं। लेकिन यहां इन्हें दो मासूम, चुलबुले किरदारों के रूप में पेश किया गया है जो एक जादुई किताब से निकल कर असल दुनिया में अफरा-तफरी मचाते हैं। हिमाचल के एक छोटे से कस्बे की पृष्ठभूमि में स्थित यह कहानी दरअसल एक मेटा-स्टोरी या कहानी के अंदर लिखी जा रही कहानी का किस्सा है। एक संघर्षरत लेखक की जादुई कलम से पैदा हुए ये दोनों किरदार जहां जाते हैं वहां भ्रष्ट लोग खुद अपना भांडा फोड़ने लगते हैं। यह मैजिक रियलिज़्म या जादुई यथार्थवाद का बेहतरीन उदाहरण है जिसमें कल्पना और हकीकत की सरहदें धुंधली हो जाती हैं। लैटिन अमेरिकी साहित्य की तरह यहां भी जादुई तत्व रोज़मर्रा की समस्याओं पर टिप्पणी करने का ज़रिया बनते हैं। भ्रष्टाचार पर किए गए व्यंग्य इतने सहज हैं कि आप हंसते-मुस्कुराते सोचने पर मजबूर हो जाते हैं कि क्या वाकई हमारे सिस्टम को साफ करने के लिए अब ऐसे ही किसी ’अपशकुन’ की ज़रूरत है?
आज के समय में यह सामाजिक प्रासंगिकता और भी महत्वपूर्ण हो जाती है जब हम एक ऐसे दौर से गुजर रहे हैं जहां सोशल मीडिया पर तो भ्रष्टाचार की बातें होती हैं लेकिन मुख्यधारा की फिल्में अक्सर इससे किनारा कर लेती हैं, खासकर कॉमेडी में। ’राहु-केतु’ यहां एक अलग रास्ता चुनती है। यह सीधे-सीधे उपदेश नहीं देती, बल्कि पारिस्थितिक हास्य या सिचुएशनल ह्यूमर के ज़रिए अपनी बात कहती है।
पुलकित सम्राट और वरुण शर्मा की जोड़ी इसकी सबसे बड़ी ताकत है। ‘फुकरे’ सीरिज़ से पनपी उनकी कैमिस्ट्री यहां और निखर कर सामने आती है। वरुण का भावजनित हास्य और पुलकित की सहज चुलबुलाहट कई दृश्यों को जीवंत बना देती है। पीयूष मिश्रा फूफाजी के रोल में रहस्य और कविताओं का तड़का लगाते हैं और चंकी पांडेय भी अपनी नकारात्मक भूमिका में रंग जमाते दिखे हैं। अमित स्याल और मनु ऋषि चड्ढा अपने किरदारों में मजबूती से टिके हुए हैं। संवादों से अधिक इस फिल्म का हास्य परिस्थितियों पर आधारित है जो इसे ताज़ा और अलग बनाता है।
’फुकरे-3’ में विपुल विग ने मानवीय दुनिया में तेजी से बढ़ते जा रहे जल संकट की सर्वाधिक भयावह स्थिति ’डे ज़ीरो’ पर बात की थी, और ऐसा करने वाले वह कमर्शियल हिन्दी सिनेमा में संभवतः पहले पटकथा लेखक हैं। उनके इसी साहस की झलक ’राहु-केतु’ में भी दिखाई देती है। ‘फुकरे’ जैसी हिट फ्रेंचाइज़ से जुड़े रहने के बाद वह फैंटेसी कॉमेडी की नई शैली आजमा रहे हैं। आज जब थिएटर्स में कम बजट वाली फिल्मों के दर्शक कम हो रहे हैं और ओटीटी प्लेटफॉर्म्स का दबदबा है, तब एक ऐसी फिल्म बनाना आसान नहीं होता जो पारिवारिक मनोरंजन देती हो और दिमाग को बंद करने को भी न कहे। विपुल की यह फिल्म ‘राहु केतु’ इसीलिए एक साहसिक कदम हो जाती है।
हालांकि फिल्म कहीं-कहीं खिंचती हुई-सी भी लगती है, और इसके कुछ हिस्से थोड़े असमान भी हैं, लेकिन यह शायद इसकी प्रयोगात्मक शैली की कीमत है जो गैर-वाजिब भी नहीं। हिमाचल प्रदेश के खूबसूरत लोकेशंस और बैकग्राउंड स्कोर कहानी को ताज़गी देते हैं।
बेहिसाब नफरत, हिंसा और खून-खराबे भरी फिल्मों के अतिरेक से दब चुके हिन्दी सिनेमा को इस समय ’राहु-केतु’ जैसी और फिल्मों की ज़रूरत है। अगर आप कुछ ऐसा देखना चाहते हैं जिसमें हल्के-फुल्के हास्य के साथ कल्पना की उड़ान और सामाजिक सरोकारों की झलक मिले तो यह फिल्म आपके लिए है।

Release Date-16 January, 2026 in theaters
(सिनेमा पर पैनी व गहरी दृष्टि रखने वाले अरविंद अरोड़ा कई मीडिया संस्थानों के लिए काम कर चुके हैं।)

