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रिव्यू-कुछ अलग-सी शौर्य कथा है ‘इक्कीस’

Deepak Dua by Deepak Dua
2026/01/01
in CineYatra, फिल्म/वेब रिव्यू
0
रिव्यू-कुछ अलग-सी शौर्य कथा है ‘इक्कीस’
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-दीपक दुआ…

1971 में जब भारत पूर्वी मोर्चे पर पाकिस्तान से जूझ रहा था तब पाकिस्तान ने भारत को उलझाने के लिए पश्चिमी सरहद पर भी मोर्चा खोल दिया था। उस दौरान लड़ी गई कई लड़ाइयों में से एक थी ‘बसंतर की लड़ाई’ जिसमें हमारे टैंक सवार वीरों ने पाकिस्तानी टैंकों को नेस्तनाबूद करते हुए असीम शौर्य का प्रदर्शन किया था। उन वीरों में से एक थे सैकिंड लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल जिन्होंने महज़ 21 साल की उम्र में अद्भुत वीरता दिखाते हुए अपने टैंक में आग लगने के बावजूद पीछे हटने से इंकार करते हुए पाकिस्तानी फौज को भारी नुकसान पहुंचाया था और देश के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया था। इस वीरता के लिए उन्हें मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया था। इस सर्वोच्च सम्मान को पाने वाले वह सबसे युवा सैनिक थे। श्रीराम राघवन की यह फिल्म ‘इक्कीस’ (Ikkis) उसी 21 वर्षीय वीर अरुण खेत्रपाल की कहानी दिखाती है, थोड़े अलग ढंग से।

किसी वॉर-हीरो पर बनने वाली फिल्में आमतौर पर उस इंसान के एक आम शख्स से हीरो बनने तक की कहानी दिखाते हुए दर्शकों में जोश और भावनाओं का संचार करती हैं। यह फिल्म ‘इक्कीस’ (Ikkis) भी अरुण खेत्रपाल की कहानी को इसी तरह से दिखाती है जिसमें एक नौजवान अपने परिवार की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए सेना में जा रहा है, वहां मेहनत कर रहा है, अनुशासन सीख रहा है, युवा उम्र में एक लड़की की तरफ आकर्षित हो रहा है लेकिन अपने लक्ष्य से ध्यान नहीं हटने दे रहा है, युद्ध के मैदान में वह खुद से ज़्यादा देश के बारे में सोचता है और अपनी जान न्योछावर करते हुए अमर हो जाता है।

इस कहानी को 2001 के साल से शुरू किया गया है जब अरुण के पिता रिटायर्ड ब्रिगेडियर मदन लाल खेत्रपाल अपने कॉलेज की रीयूनियन के लिए पाकिस्तान पहुंचे हैं। वह पाकिस्तानी फौज के ब्रिगेडियर निसार के घर में ठहरे हैं। निसार उन्हें उनके पुराने कॉलेज की पार्टी में ले जाता है, उनके उस घर में भी ले जाता है जहां बंटवारे से पहले वे लोग रहते थे। फिर निसार उन्हें वहां भी ले जाता है जहां बसंतर की लड़ाई हुई थी और जिस जगह उनके बेटे ने अपना शरीर त्यागा था। सोचिए, कितना मुश्किल रहा होगा एक पिता के लिए उस जगह को देखना, उस मिट्टी को छूना, उस अहसास से गुज़रना। लेकिन इससे भी ज़्यादा मुश्किल रहा होगा निसार के लिए उन्हें बसंतर की लड़ाई का आंखों देखा हाल बताना और इस सच को ज़ाहिर करना कि वह निसार ही था जिसकी वजह से अरुण को शहादत मिली।

लेखकों ने इस फिल्म ‘इक्कीस’ (Ikkis) की पटकथा को थोड़ा रूखा, थोड़ा सूखा, थोड़ा ठंडा-सा ट्रीटमैंट दिया है। इस अलग किस्म के लेखन के चलते इस फिल्म की चाल में सुस्ती आई है और यह उस तरह का जोशीला मज़ा नहीं दे पाती है जिसे हम लोग अक्सर इस किस्म की फिल्मों में देखते, महसूस करते आए हैं। यही बात इस फिल्म को अलग बनाती है जिसमें युद्ध की निरर्थकता की बात है, हिन्दुस्तान-पाकिस्तान की साझा संस्कृति की बात है, शांति की बात है। अब यह अलग बात है कि पाकिस्तान के साथ शांति की बात सुनना कितने लोग चाहते हैं?

दरअसल सिर्फ लेखन ही नहीं, श्रीराम राघवन का मेकिंग स्टाइल भी जुदा है। उन्होंने लीक से हट कर कहानी कहने की जो शैली चुनी और उस शैली को भी उतार-चढ़ाव की बजाय सपाट रखा, उससे यह कहीं-कहीं ही गहरा असर छोड़ पाई है। फिल्म में ऐसी कई घटनाएं जोड़ी गई हैं जो न तो फिल्म की मूल कहानी से और न ही दर्शकों से नाता जोड़ पाती हैं। इस फिल्म को देखते हुए अधिकांश समय एक अजीब-सी बोरियत का अहसास मन पर छाया रहता है। अलग और रियल बनने के फेर में यह फिल्म न तो भावनाओं का उबाल पैदा कर पाती है और न ही देखने वालों में जोश ला पाती है। कुछ रोचक घटनाएं, कुछ दिलचस्प मोड़ इस फिल्म को अधिक पैना बना सकते थे।

टुकड़ों-टुकड़ों में यह फिल्म ‘इक्कीस’ (Ikkis) अपना असर छोड़ती है। अंत में टैंकों के युद्ध-दृश्य रियल लगते हैं। अरुण के पिता और ब्रिगेडियर निसार के बीच के दृश्य बहुत गहरे हैं। सच तो यही है कि फिल्म का यही हिस्सा सबसे प्रभावी भी है। ब्रिगेडियर खेत्रपाल बने धर्मेंद्र और ब्रिगेडियर निसार बने जयदीप अहलावत ने अपने-अपने किरदारों में जम कर असर छोड़ा है। जाते-जाते धरम जी एक बार फिर अपना चरम दिखा गए हैं। जयदीप की तो आंखें ही काफी हैं अभिनय के लिए। अरुण खेत्रपाल की भूमिका में अमिताभ बच्चन के नाती अगस्त्य नंदा के काम में संजीदगी है। कुछ और निखार, कुछ और अच्छे किरदार, कुछ और सधे हुए निर्देशक उनका भविष्य संवार सकते हैं। नायिका के तौर पर अक्षय कुमार की भानजी सिमर भाटिया का काम भी ठीक रहा है। सिकंदर खेर, राहुल देव, एकावली खन्ना और विवान शाह खूब जमे। कुछ पल को आए असरानी और दीपक डोबरियाल कमाल रहे। बाकी कलाकारों में सुहासिनी मुले, श्री विश्नाई, मामिक, ज़ाकिर हुसैन आदि ने बढ़िया काम किया। गीत-संगीत साधारण रहा। कैमरा युद्ध के मैदान में उन चीज़ों को भी पकड़ता है जिन्हें आमतौर पर दरकिनार कर दिया जाता है।

जोशीला मज़ा न दे पाने के बावजूद भारत के एक अमर बलिदानी की यह शौर्य कथा देखी जानी चाहिए।

(रेटिंग की ज़रूरत ही क्या है? रिव्यू पढ़िए और फैसला कीजिए कि यह कितनी अच्छी या खराब है। और हां, इस पोस्ट के नीचे कमेंट कर के इस रिव्यू पर अपने विचार ज़रूर बताएं।)

Release Date-1 January, 2026 in theaters

(दीपक दुआ राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त फिल्म समीक्षक हैं। 1993 से फिल्म–पत्रकारिता में सक्रिय। ‘सिनेयात्रा डॉट कॉम’ (www.cineyatra.com) के साथ–साथ विभिन्न समाचार पत्रों, पत्रिकाओं, वेब–पोर्टल, रेडियो, टी.वी. आदि पर सक्रिय दीपक ‘फिल्म क्रिटिक्स गिल्ड’ के सदस्य भी हैं।)

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