-दीपक दुआ… (This review is featured in IMDb Critics Reviews)
इस फिल्म ‘हैप्पी पटेल-खतरनाक जासूस’ (Happy Patel-Khatarnak Jasoos) पर रिसर्च की जानी चाहिए। मैं खुद बहुत उत्सुकता से यह जानना चाहूंगा कि इस फिल्म के लेखकों वीर दास और अमोघ रणदिवे में से किस के दिमाग में इस कहानी का आइडिया पहली बार आया होगा? कैसे उन्होंने उस कहानी पर इस तरह की ऐसी स्क्रिप्ट लिखी होगी? कैसे आमिर खान जैसा निर्माता इस पर दांव लगाने को तैयार हो गया होगा? आखिर क्या दिखा होगा आमिर को उस स्क्रिप्ट में, उस स्क्रिप्ट पर बनी फिल्म में?
ऐसा नहीं है कि इस फिल्म ‘हैप्पी पटेल-खतरनाक जासूस’ (Happy Patel-Khatarnak Jasoos) में कहानी नहीं है। बिल्कुल है और ऐसी है कि यदि उसे सलीके से फैलाया जाए तो उस पर तीन-चार घंटे की फिल्म बन सकती है। लेकिन दिक्कत यही है कि इस फिल्म में से वह ‘सलीका’ ही तो गायब है जो किसी कहानी को रोचक बनाता है। यही कारण है कि सिर्फ दो घंटे की यह फिल्म ज़बर्दस्त शोर से शुरू होकर महाबोर करते हुए शोर में ही खत्म हो जाती है।
पहले कहानी सुनिए-1991 में दो ब्रिटिश एजेंट गोआ के डॉन जिम्मी को मार देते हैं और एक अनाथ बच्चे हैप्पी पटेल को अपने साथ लंदन ले जाते हैं। अब जिम्मी की बेटी मामा गोआ की डॉन है जिसने एक ब्रिटिश साईंटिस्ट को किडनैप किया हुआ है। हैप्पी पटेल उसी साईंटिस्ट को बचाने के मिशन पर गोआ आया है।
चार लाइन की यह कहानी सुनने में रोचक लग रही है तो इसलिए कि मैंने इसे कुतर कर लिखा है वरना यह चालीस लाइन में भी पूरी नहीं आती। मैंने आपको यह तो बताया ही नहीं सारे काले धंधे करने वाली मामा उस साईंटिस्ट से एक फेयरनेस क्रीम बनवा रही है, मामा किसी को मारती है तो ज़हरीला कटलेट देती है, ब्रिटेन की एजेंसी ने गोआ में अपना लोकल एजेंट छोड़ रखा है, उस लोकल एजेंट ने भी आगे किसी को एजेंट रखा हुआ है, वगैरह-वगैरह।
दरअसल इस फिल्म ‘हैप्पी पटेल-खतरनाक जासूस’ (Happy Patel-Khatarnak Jasoos) की पहली दिक्कत यही है कि इसकी कहानी में कहीं से भी ईंटें, रोड़ी-बजरी, रेत-सीमेंट तो उठा लिए गए लेकिन उनसे कायदे का कंस्ट्रक्शन करने की बजाय उन्हें यूं ही मलबे की तरह छोड़ दिया गया। कहानी एक सिरे से दूसरे सिरे तक जाती दिख रही है लेकिन इस दौरान वह कहीं भी मुड़ रही है, रुक रही है, झुक रही है, टूट रही है। एक अनोखे किस्म की फिल्म बनाने के फेर में जिस किस्म की पटकथा लिखी गई है वह इस फिल्म को बनाने वालों के अलावा कुछ एक अनोखे ‘बुद्धिजीवी’ किस्म के दर्शकों को ही हजम हो सकती है, अपन ठहरे आम आदमी।
पहली बार कोई फिल्म डायरेक्ट कर रहे वीर दास और कवि (जिन्हें पर्दे पर कवी लिखा गया है) शास्त्री ने इस फिल्म को एक अलग किस्म का लुक देने की भरपूर कोशिश की है और वे इसमें सफल भी रहे हैं लेकिन जब आपका कंटैंट ही दम तोड़ रहा हो तो उसे मुंह से सांस देकर आप कितनी देर बचा लेंगे? सिर्फ विचित्र दिखने के फेर में यह फिल्म कभी सिर के ऊपर से तो कभी टांगों के नीचे से निकलती मालूम होती है।
ऊपर से इसकी भाषा… उफ्फ…! शुरुआती कुछ मिनट इंगलिश में हैं और पर्दे पर हिन्दी-अंग्रेजी के सबटाइटिल चल रहे हैं। जब गोआ पुलिस मराठी बोलती है तो उसके सबटाइटिल अंग्रेज़ी में आने लगते हैं। हिन्दी फिल्मों से भाषा सीख कर लंदन से गोआ आया हैप्पी अपने गलत उच्चारण और उससे निकलते अश्लील अर्थों से पकाता है। हैप्पी को हिन्दी नहीं आती थी लेकिन मराठी समझ आती है। संवादों के नाम पर कुछ भी ऊल-जलूल चल रहा है और अतरंगी दिखने के नाम पर किरदार कुछ भी बेसिर-पैर की हरकतें किए जा रहे हैं। और अंत में कुकिंग का मुकाबला…! सच्ची…! एक्सपेरिमैंट के नाम पर कुछ भी परोस दो, दो-चार लोग तो वाह-वाह कर ही देंगे।
एक्टिंग के नाम पर लाउड और ओवर एक्टिंग की दुकानें सजी हुई हैं। इस बेतरतीब भीड़ में किसी ने कुछ अच्छा काम कर भी दिया तो क्या ही फायदा। एक्शन में उठा-पटक ज़्यादा है, बैकग्राउंड म्यूज़िक में शोर है। गाने साधारण हैं। कॉमेडी के नाम पर खिजाती है यह फिल्म। फिल्म का नाम ‘हैप्पी पटेल-खतरनाक जासूस’ तक इससे मैच नहीं करता। साफ है कि फिल्म के नाम पर चू…रण चटाया गया है।
इस फिल्म ‘हैप्पी पटेल-खतरनाक जासूस’ (Happy Patel-Khatarnak Jasoos) की डॉन अपने कैदियों को टॉर्चर करने के लिए अपने बेसुरे गुंडों से गाने सुनवाती है। कुछ घंटे बाद वे लोग कहते हैं-जो पूछना है, पूछ लो, गाने मत सुनाओ। यह फिल्म देख कर आप भी निर्माता आमिर खान से कह सकते हैं-जितने पैसे लेने हैं, ले लो, ऐसी फिल्म मत बनाओ।
(रेटिंग की ज़रूरत ही क्या है? रिव्यू पढ़िए और फैसला कीजिए कि यह कितनी अच्छी या खराब है। और हां, इस पोस्ट के नीचे कमेंट कर के इस रिव्यू पर अपने विचार ज़रूर बताएं।)
Release Date-16 January, 2026 in theaters
(दीपक दुआ राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त फिल्म समीक्षक हैं। 1993 से फिल्म–पत्रकारिता में सक्रिय। ‘सिनेयात्रा डॉट कॉम’ (www.cineyatra.com) के साथ–साथ विभिन्न समाचार पत्रों, पत्रिकाओं, वेब–पोर्टल, रेडियो, टी.वी. आदि पर सक्रिय दीपक ‘फिल्म क्रिटिक्स गिल्ड’ के सदस्य भी हैं।)


ग्रेट रिव्यू ईमानदारी के साथ पेश किया
धन्यवाद…