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Home यादें

यादें-1998 की वह पहली मुंबई यात्रा (भाग-7)

Deepak Dua by Deepak Dua
1998/08/22
in यादें
0
यादें-1998 की वह पहली मुंबई यात्रा (भाग-1)
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-दीपक दुआ…

आज 27 अगस्त, 1998 का दिन हमारे लिए खास था। हम लोग तैयार होकर अपने फ्लैट से पैदल ही टहलते हुए दिंडोशी नगर में फिल्म सिटी रोड पर स्थित पारिजात नाम की उस बिल्डिंग में जा पहुंचे जहां सौरभ शुक्ला नाम के वह अभिनेता रहते थे जिन्हें कुछ ही हफ्ते पहले आई रामगोपाल वर्मा की फिल्म ‘सत्या’ के सह-लेखक और इसमें निभाए अपने किरदार कल्लू मामा से खासी लोकप्रियता मिल चुकी थी।

(पिछला भाग पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें)

मिलना कल्लू मामा से  

सौरभ शुक्ला से बीती शाम फोन पर बात हो चुकी थी। असल में दिल्ली से चलते समय ‘चित्रलेखा’ के संपादक दीपक केसरी जी ने बताया था कि सौरभ दिल्ली के उसी नामी सरकारी स्कूल से पढ़े हैं जहां से उन्होंने भी पढ़ाई की है। (संयोग से मैं भी कुछ बरस बाद उसी स्कूल से पढ़ कर निकला) उन्होंने मुझे सौरभ के घर का फोन नंबर देते हुए अपने एक अन्य दोस्त का नाम लेने को कहा था। वह नाम सुनते ही सौरभ ने अगले दिन अपने घर आने का न्यौता दे दिया और अब हम उनके साथ मौजूद थे।

कई घंटे सौरभ शुक्ला के साथ

सौरभ शुक्ला के घर में हमें काफी समय बिताना पड़ा। ‘बिताना पड़ा’ इसलिए कह रहा हूं क्योंकि जब भी हमने यह सोचा कि अब यहां से चला जाए, बाहर तेज़ बारिश शुरू हो गई और सौरभ जी इसरार करने लगे कि थोड़ा रुक कर चले जाइए। ऐसे करते-करते करीब ढाई घंटे तक हम लोग उनके यहां थे जिस दौरान उनकी पत्नी बरनाली रे शुक्ला ने कभी चाय तो कभी शर्बत आदि से हमारी खातिरदारी की। सौरभ ने बड़े चाव से हमें अपनी किताबों व फिल्मी-कैसेटों का संग्रह दिखाया, दिल्ली में थिएटर के ज़माने की ढेरों तस्वीरें दिखाईं और बहुत सारी बातें कीं। उनसे हुई बातचीत बाद में ‘चित्रलेखा’ में प्रकाशित हुई थी जिसे नीचे दिए लिंक पर क्लिक कर के पढ़ा जा सकता है।

ओल्ड इंटरव्यू : ‘सत्या’ का कल्लू मामा सौरभ शुक्ला

सौरभ शुक्ला के घर से निकल कर हम लोग बस द्वारा गोरेगांव स्टेशन पहुंचे और सबसे पहले एक रेस्टोरैंट में लंच किया। फिर लोकल ट्रेन से महालक्ष्मी स्टेशन और वहां से एक बस लेकर पॉलीग्राम म्यूज़िक कंपनी के ऑफिस गए। यहां से टहलते हुए हम लोग दूरदर्शन केंद्र के पास मौजूद ज़ी टी.वी. के दफ्तर जा पहुंचे। ज़ी की प्रचार टीम में हमारे काफी मित्र थे जिनके साथ खूब बातें हुईं। वहां से निकले तो शाम हो चली थी। विद्युत जी को किसी से मिलने जाना था सो मैं अकेला ही बस पकड़ कर ताड़देव में एम.टी.वी. के ऑफिस चला गया। वहां से मुंबई सैंट्रल पहुंचा और लोकल ट्रेन पकड़ कर मलाड लौट आया।

(आगे पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें)

(दीपक दुआ फिल्म समीक्षक व पत्रकार हैं। 1993 से फिल्म–पत्रकारिता में सक्रिय। ‘सिनेयात्रा डॉट कॉम’ (www.cineyatra.com) के अलावा विभिन्न समाचार पत्रों, पत्रिकाओं, न्यूज पोर्टल आदि के लिए सिनेमा व पर्यटन पर नियमित लिखने वाले दीपक ‘फिल्म क्रिटिक्स गिल्ड’ के सदस्य हैं और रेडियो व टी.वी. से भी जुड़े हुए हैं।)

Tags: M TVmumbaimumbai 1998satyasaurabh shuklazee tv
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