-दीपक दुआ…
मेरठ शहर। वही जगह जिसे कभी मयराष्ट्र कहा गया-रावण के ससुर मयदानव की नगरी। यहां के अवस्थी परिवार में चार महीने पहले नई नवेली दुल्हन बन कर आई है मोहिनी। उसके आते ही सब सही होने लगा है। लेकिन देवर बंटू अवस्थी को शक है कि भाभी डायन है। उसका कहना है कि कोई साधारण इंसान इतना सर्वगुण संपन्न कैसे हो सकता है बे! वह अपने तर्क रखता है, परिवार अपने। बहू उसे समझाती है, वह नहीं मानता। पंडित जी आते है, मंत्र फूंकते हैं, तंत्र करते हैं और फिर…! तो क्या मोहिनी भाभी सचमुच डायन है? क्यों आई है वह यहां? क्या छुपा है इस घर में?
इधर कुछ समय से हिन्दी फिल्मों ने लोक-कथाओं में कल्पनाओं का छौंक लगा कर जो कहानियां परोसनी शुरू की हैं उन्होंने दर्शकों में उत्सुकता जगाई है। इससे यह शिकायत भी दूर होती है कि हिन्दी वाले कुछ नया नहीं सोचते। इस तरह से सोची गई हर नई कहानी क्या सही दिशा में और सटीक ही होती है? आइए जानते हैं।
अगर आपने इस फिल्म का ट्रेलर देखा हो तो इतना तो समझ में आता ही है कि मोहिनी कोई साधारण इंसान नहीं है। कहानी के सिरे त्रेता युग और रावण तक भी जाते हैं। कोई बुरी शक्ति है, जिसे रावण ने तब पाया था। आज का रावण भी उसी शक्ति को कब्जाने की फिराक में है। तब राम ने उसे रोका था। आज कोई और उसे रोकेगा। बुराई पर अच्छाई की जीत तो हमेशा हुई है न।
एक रहस्यमयी बुरी शक्ति, रावण, राम, मोहिनी, अवस्थी परिवार और मेरठ को मिला कर जो कहानी गढ़ी गई है उसके धागे कसे हुए भले ही न हों, उलझे हुए बिल्कुल नहीं हैं और ज़रा-सा दिमाग लगाते ही समझ में भी आ जाते हैं। लेखक हिमांशु शर्मा के लिए तालियां। महज दो दिन में फैली इस कहानी का प्रवाह भी सहज है। दिव्य निधि शर्मा को इस किस्म की लिखाई का गहरा अनुभव है। जिस तरह से वह टी.वी. सीरियल ‘अनुपमा’ में हल्की-फुल्की बातों में गहरी बात कहते रहे हैं, वह कमाल उन्होंने यहां भी दिखाया है। एक फंतासी के बीच वह बनावटी नारीवाद, परिवार के मिल-जुल कर रहने और अपने भीतर की बुराइयों को खत्म करने जैसी कई गहरी बातें हंसी-हंसी में कह जाते हैं। लेकिन…!
इस फिल्म की स्क्रिप्ट की कसावट में कमी दिखती है। कुछ चीज़ें एकदम से फैलने लगती हैं तो कुछ ज़रा जल्दी ही समेट ली जाती हैं। कहीं-कहीं घटनाओं और संवादों की गति इतनी तेज़ है कि उनका रस आ भी नहीं पाता और वे बीत जाते हैं। संवाद भी कई जगह साधारण रह गए जबकि ऐसी कहानी में संवादों से सीटियां बजवाई जा सकती हैं। दूसरी बड़ी कमी इसके निर्देशन में है। दक्षिण से आए बालाजी मोहन को ही इस फिल्म की कमान क्यों सौंपी गई, यह समझ से परे है। हिन्दी के किसी सधे हुए निर्देशक या खुद निर्माता आनंद एल. राय को यह फिल्म दी जाती तो यह धमाल हो सकती थी। बालाजी मोहन के चलते फिल्म में कुछ-कुछ दक्षिण भारतीय महक भी आई है। गीत-संगीत ठीक-ठाक है, वी.एफ.एक्स. बढ़िया है।
शादी वाले घर में संयुक्त परिवार के अतरंगी किरदारों के ज़रिए कॉमेडी उपजाने में फिल्में अक्सर कामयाब रहती हैं। यह फिल्म भी ऐसा कर पाई है। बड़ी बात यह भी है कि ऐसा करते समय यह फिल्म कहीं फूहड़ नहीं होती वरना कुछ लेखक तो बदतमीज़ी और भौंडेपन को ही हास्य मान कर परोसना जानते हैं। फिर अपने भीतर के रावण को मारने की और अपने परिवार के लिए खड़े होने की जो बात यह फिल्म कहती है, उसे गहराई से समझें और मानें तो हर कोई राममय हो सकता है। एक उदाहरण देखिए-नायिका के परिवार को वरदान है कि यदि कोई इस परिवार की स्त्रियों को बुरी नज़र से देखेगा तो उसके साथ उसी समय कुछ बुरा हो जाएगा। सोचिए, यदि यह वरदान इस धरती की हर बिटिया को मिल जाए तो…! इस फिल्म को देखते हुए आशुतोष गोवारीकर की ‘स्वदेस’ के गीत की वह पंक्ति याद आती है-‘मन से रावण जो निकाले, राम उसके मन में हैं…।’
यामी गौतम का काम बेदाग रहा है। उनके पति के रोल में मराठी अभिनेता आदिनाथ कोठारे भी जंचे। सुष्मिता मुखर्जी, सुनील सिन्हा, सुनीता रजवार, मीता वशिष्ठ, आदित्य कुलश्रेष्ठ, प्रतीक पचौरी, बबिता पांडेय, अक्षत सिंह, पंडित बने अजय पाल जैसे तमाम कलाकारों ने मन भर लुभाया। लेकिन फिल्म में अव्वल नंबर पर रहे देवर बंटू अवस्थी बने अनुराग ठाकुर। क्या अदाएं, क्या संवाद अदायगी, क्या टाइमिंग, भई वाह…!
हाल के बरसों में हॉरर के साथ कॉमेडी का तड़का लगा कर कहानियां परोसने की जो चतुराई फिल्म वालों ने दिखाई है, उससे और कुछ भले ही न हो, दर्शकों का मनोरंजन भरपूर होता है। यह फिल्म ‘नई नवेली’ भी इस परीक्षा में पास हुई है। त्योहारी मौसम में परिवार के साथ कुछ हल्का-फुल्का, मनोरंजक देखना चाहें तो मिल लें इस नई नवेली स्त्री से।
(रेटिंग की ज़रूरत ही क्या है? रिव्यू पढ़िए और फैसला कीजिए कि यह कितनी अच्छी या खराब है। और हां, इस पोस्ट के नीचे कमेंट कर के इस रिव्यू पर अपने विचार ज़रूर बताएं।)
Release Date-02 October, 2026 in theaters
(दीपक दुआ राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त फिल्म समीक्षक हैं। 1993 से फिल्म–पत्रकारिता में सक्रिय। ‘सिनेयात्रा डॉट कॉम’ (www.cineyatra.com) के साथ–साथ विभिन्न समाचार पत्रों, पत्रिकाओं, वेब–पोर्टल, रेडियो, टी.वी. आदि पर सक्रिय दीपक ‘फिल्म क्रिटिक्स गिल्ड’ के सदस्य भी हैं।)
