-दीपक दुआ… (This review is featured in IMDb Critics Reviews)
1998 में जब करण जौहर ‘कुछ कुछ होता है’ लेकर आए थे तो दर्शक सोचते थे कि अपने देश में कहां पर होते हैं ऐसे कॉलेज जिनमें इतनी रंगीनी हो, इतनी चमक-दमक हो, जहां पढ़ाई के अलावा सब कुछ होता हो…? लेकिन वह फिल्म सुहानी हवा के झोंके की तरह आई थी। आर्चीज़ कॉमिक्स से निकली कहानी, कसी हुई स्क्रिप्ट, सधा हुआ निर्देशन, बड़े सितारे, शानदार म्यूज़िक और… फिल्म सुपरहिट।
इसके 14 बरस बाद एक बार फिर करण जौहर ‘स्टूडैंट ऑफ द ईयर’ लेकर आए तो हम दर्शक फिर हैरान हुए कि यार, कहां होते हैं ऐसे स्कूल-कॉलेज जिनमें इस तरह की भौंडी हरकतें होती हों, इस तरह के चमकीले जीव ‘पढ़ाई’ के नाम पर फूहड़ता करते हों। लेकिन यह फिल्म भी अपनी चमक-दमक और रसीले एंटरटेनमैंट के चलते युवा दर्शकों को ही सही, पसंद आ गई थी।
और अब उसके 14 साल बाद आई है यह फिल्म ‘डोन्ट बी शाई’ (Don’t Be Shy), जिसे देख कर एक बार फिर सिर पकड़ कर पूछा जा सकता है कि हे बॉलीवुड नामक ग्रह के एलियनों, आखिर तुम ज़मीन पर क्यों नहीं उतरते हो? क्यों हर बार हमें एक ऐसी अनदेखी, अनजानी दुनिया में ले जाना चाहते हो जहां सब कुछ नकली हो, बनावटी हो, थोथला हो, उथला हो, खोखला हो और भौंडा तो हो ही।
मुंबई (में बनाए एक मौहल्ले के नकली सैट) में श्यामली दास रहती है जो खुद को शाई कहती है। कॉलेज नाम की जिस जगह पर वह जाती है वह हमें ‘कुछ कुछ होता है’, ‘स्टूडैंट ऑफ द ईयर’, ‘मोहब्बतें, ‘मैं हूं ना’ जैसी फिल्मों की याद दिलाती है। एक अमीर लड़के के साथ सगाई, शादी, बच्चे और फिर उसकी कंपनी की मालकिन बनने जैसे परफैक्ट प्लान हैं उसके। लेकिन ज़िंदगी के सभी प्लान कामयाब हो ही जाएं, यह ज़रूरी तो नहीं।
इस फिल्म (Don’t Be Shy) को लिखने-बनाने वाली श्रीति मुखर्जी ‘यह जवानी है दीवानी’, ‘ऐ दिल है मुश्किल’ और ‘ब्रह्मास्त्र’ जैसी चमकीली फिल्मों से जुड़ी रही हैं तो स्वाभाविक तौर पर उन्हें लगा होगा कि ऐसी फिल्म बनाई जाए जिसमें अल्ट्रा मॉर्डन युवा पीढ़ी की सोच, समस्याओं, मुश्किलों, सपनों की बात की जाए ताकि जेन-ज़ी को लुभाया जा सके। कोई दिक्कत नहीं, कीजिए बात। लेकिन पहले यह बताइए कि यह बात करते समय आप अतीत में क्यों चली गईं? क्या कारण है कि 2026 में रिलीज हुई इस फिल्म की कहानी आज से डेढ़-दो दशक पहले के समय में चल रही है? जेन-ज़ी की फिल्म, जेन-ज़ी के लिए फिल्म और फिल्म में जेन-ज़ी ही नहीं? यानी बासा माल आप खुद परोस रहे हो और चाहते हो कि दर्शक उसे ताज़ा समझ कर लपक लें? कहानी के नाम पर आप प्लास्टिक के फूल पर इत्र छिड़क कर लाएंगे और सोचेंगे कि दर्शक बेवकूफ बन जाएंगे तो माफ कीजिएगा, दर्शकों से बड़े बेवकूफ तो आप हैं।
और स्क्रिप्ट के नाम पर आप क्या दे रहे हैं? बातें-बातें, बकर-बकर…! देश के कई शहरों के कॉलेजों की टीमें पता नहीं कौन से हिल-स्टेशन पर पता नहीं किस किस्म के फेस्ट में पहुंची हैं जहां ऊल-जलूल किस्म की प्रतियोगिताएं हो रही हैं और इन सबके बीच में कुछ युवाओं के आपसी रिश्ते बन-बिगड़ रहे हैं। ऐसी थकी हुई स्क्रिप्ट और बेमतलब के संवाद कि देखने-सुनने वाला माथा पकड़ ले… उड़ी बाबा…!
श्रीति मुखर्जी ने अपने डायरेक्शन में खूब नए तेवर डालने की कोशिश की है। ‘अलग हट के’ वाले स्टाइल में सीन बनाए हैं, कैमरे, रंगों और वी.एफ.एक्स. के करतब भी दिखाए हैं। लेकिन जब आपके माल में ही दम न हो तो ऊपर से कितना भी चमकीला रैपर लपेट लो, उसका खोखलापन सामने आ ही जाता है। इतने ज़्यादा बोर करने वाले ढंग से बनी यह फिल्म (Don’t Be Shy) इतनी लंबी है कि इसके ढाई घंटे ढाई पहर से लगने लगते हैं। आप चाहें तो इस फिल्म का ट्रेलर इस लिंक पर क्लिक करके देख सकते हैं, समझ में आ जाए तो खुद को शाबाशी दे दीजिएगा।
न तो किरदारों को कायदे से खड़ा किया गया है और न ही उनकी खूबियों-खामियों को सलीके से बताया गया है। इन किरदारों को निभाने के लिए जिन कलाकारों को लिया गया है, वे भी सारे के सारे बेहद कच्चे हैं। शाई बनीं आरुषि बजाज खुद पूरी फिल्म में खीजती रही हैं और उन्हें देख कर दर्शकों को भी खीज होती है। फिल्म में उन्हें कब्ज़ रहती है। इस फिल्म को देख कर लगता है कि इसे बनाने वाले भी दिमागी कब्ज़ के शिकार हैं। और आरुषि की आवाज़…! चीखते समय वह फरहान अख्तर हो जाती हैं। ले-देकर एक अनुराग बसु ही हैं जो अच्छे लगते हैं वरना बाकी सब तो बस कैमरे में घुसपैठ करते ही नज़र आए। गाने-वाने भी यूं ही हैं इस फिल्म के। दरअसल यह पूरी फिल्म ही ‘यूं ही’ है। इसके बनाने वालों में आलिया भट्ट भी हैं। आप पूछेंगे कि क्यों हैं? तो जवाब होगा-यूं ही।
अमेज़न प्राइम पर आई इस फिल्म (Don’t Be Shy) में बातें बहुत हैं। जेनरेशन गैप की बातें, पुरानी पीढ़ी की सीख की बातें, नई पीढ़ी के तनाव की बातें, रिश्तों, कैरियर, सपनों, उम्मीदों, छल, दोस्ती की बातें। लेकिन सिर्फ बातें ही बातें हैं, उन बातों में गहराई नहीं है। कह सकते हैं कि यह फिल्म ‘बोलती’ बहुत ज़्यादा है लेकिन ‘कहती’ बहुत कम है। कोई बहुत ही सब्र वाला बुद्धिजीवी दर्शक हो तो मुमकिन है वह इसमें से अपने लिए कुछ निकाल ले वरना तो यह फिल्म रिजेक्ट की जा सकती है, बिना किसी शर्म के।
(रेटिंग की ज़रूरत ही क्या है? रिव्यू पढ़िए और फैसला कीजिए कि यह कितनी अच्छी या खराब है। और हां, इस पोस्ट के नीचे कमेंट कर के इस रिव्यू पर अपने विचार ज़रूर बताएं।)
Release Date-25 September, 2026 on Amazon Prime Video
(दीपक दुआ राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त फिल्म समीक्षक हैं। 1993 से फिल्म–पत्रकारिता में सक्रिय। ‘सिनेयात्रा डॉट कॉम’ (www.cineyatra.com) के साथ–साथ विभिन्न समाचार पत्रों, पत्रिकाओं, वेब–पोर्टल, रेडियो, टी.वी. आदि पर सक्रिय दीपक ‘फिल्म क्रिटिक्स गिल्ड’ के सदस्य भी हैं।)
