-दीपक दुआ… (This review is featured in IMDb Critics Reviews)
‘हम कवि अपनी जवानी की शुरुआत खुशी से करते हैं, लेकिन आखिर में निराशा और पागलपन आ जाता है।’ इंगलिश कवि विलियम वर्ड्सवर्थ की इन पंक्तियों से शुरू होने वाली अनुराग कश्यप की फिल्म ‘कैनेडी’ बहुत जल्द इन पंक्तियों के अर्थ को बयान करने में लग जाती है।
2020-21 की कोरोना महामारी के समय में स्थित इस फिल्म ‘कैनेडी’ (Kennedy) का केंद्रीय पात्र कैनेडी कभी एक पुलिस वाला उदय शैट्टी हुआ करता था जो शहर के भ्रष्ट पुलिस कमिश्नर की टीम में था। अब भी वह कमिश्नर के कहने पर लोगों को मार रहा है, उनसे उगाही कर रहा है। लेकिन जिस काम को कभी वह खुशी से करता था अब उसी को निराशा और पागलपन से कर रहा है।
सिर्फ कुछ रातों की इस कहानी की शुरुआत में ही उदय शैट्टी बता देता है कि पिछले छह सालों में उसने अनगिनत लोगों को मारा है। धीरे-धीरे आगे बढ़ते हुए यह फिल्म बीच-बीच में फ्लैश बैक में भी जाती है और तब समझ आता है कि जिस बहुत उलझे हुए कथानक के बीच हम फंसे पड़े हैं, उसके धागे असल में कहां तक फैले हुए हैं।
सत्तर के दशक में हॉलीवुड में उभरे अपराध और हिंसा से भरे अंधेरे किस्म के ‘न्यू-नॉयर’ सिनेमा वाली शैली को अपने यहां श्रीराम राघवन, अनुराग कश्यप, विशाल भारद्वाज जैसे फिल्मकार अपनाते रहे हैं। यह फिल्म ‘कैनेडी’ (Kennedy) भी उसी सांचे में ढली हुई है। अनुराग इस शैली के उस्ताद रहे हैं। इस फिल्म ‘कैनेडी’ में भी उन्होंने यह उस्तादी जम कर दिखाई है। अंधेरे, परछाइयों, मास्क से ढके चेहरे, सुनसान इलाके, रहस्यमयी किरदार और प्रभावशाली बैकग्राउंड म्यूज़िक से असरदार बनते दृश्यों के बीच बहती कहानी हमें उस दुनिया में ले जाती है जहां भ्रष्टाचार की जड़ में पुलिस के बड़े आका हैं और उन्हीं की वजह से गंदगी मची हुई है। साथ ही यह फिल्म राजनीति के पाले में भी दखल देती है। लेकिन असल में यह हमें कैनेडी की उस निजी यात्रा पर ले जाती है जहां पहले उसे लोगों को मारने में मज़ा आता था और एक दिन वही मज़ा उसके लिए सज़ा बन जाता है। उसके द्वारा मारे गए लोगों की छवियां जब आकर उससे सवाल पूछती हैं तो एक दर्शक के तौर पर हमें भी चुभन होती है।
अनुराग अपने लेखन और निर्देशन की गहराई दिखाते हुए कैनेडी के निजी और प्रोफेशनल जीवन में गहराई तक झांकते हैं। इस काम में वह कई रूपकों का भी जम कर इस्तेमाल करते हैं। यही कारण है कि अपने कलेवर में यह फिल्म ‘कैनेडी’ (Kennedy) उलझी हुई, अंधियारी और रहस्यमयी प्रतीत होती है जिसे समझने के लिए काफी ज़ोर लगाना पड़ता है। सीधी-सहज कहानी की अपेक्षा रखने वाले आम दर्शक वर्ग को इस फिल्म की शैली और सुस्त रफ्तार खटक सकती है। खटकने के लिए फिल्म में और भी बहुत कुछ है। राजनीति वाला पूरा पक्ष मिसफिट लगता है। सिस्टम और मीडिया पर अपनी निजी सोच से भरे कमेंट भी करते हैं अनुराग।
‘कैनेडी’ की सिनेमैटोग्राफी उम्दा है और बैकग्राउंड म्यूज़िक इस फिल्म के असर को बढ़ाता है। राहुल भट अपने अभिनय से गहरा प्रभाव छोड़ पाने में कामयाब हुए हैं। उनकी चुप्पी और आवाज़, दोनों ही असरदार रही हैं। सनी लियोनी, मोहित टकलकर, मेघा बर्मन, श्रीकांत यादव, कुरुष देबू, करिश्मा मोदी आदि भरपूर सहारा देते हैं। बार-बार आते अभिलाष थपलियाल फिल्म की आत्मा बन जाते हैं। ‘बता कितने कत्ल किए तूने, बता कितना मज़ा आया, कितने सिक्कों में बेचे मुर्दे, बता कितना कमा लाया…?’ जैसी कविताएं भी फिल्म को पैना बनाती हैं।
2023 में बनी और देश-दुनिया के कई फिल्मोत्सवों में घूम कर आई ‘कैनेडी’ (Kennedy) अब ज़ी-5 पर रिलीज़ हुई है। इस फिल्म में रोमांचित करने वाला मनोरंजन नहीं है। कई जगह यह खिंची हुई भी लगती है लेकिन एक अलग किस्म का अनुराग कश्यप स्टाइल का सिनेमा दे पाने में यह सफल रहती है।
(रेटिंग की ज़रूरत ही क्या है? रिव्यू पढ़िए और फैसला कीजिए कि यह कितनी अच्छी या खराब है। और हां, इस पोस्ट के नीचे कमेंट कर के इस रिव्यू पर अपने विचार ज़रूर बताएं।)
Release Date-20 Februrary, 2026 on ZEE5
(दीपक दुआ राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त फिल्म समीक्षक हैं। 1993 से फिल्म–पत्रकारिता में सक्रिय। ‘सिनेयात्रा डॉट कॉम’ (www.cineyatra.com) के साथ–साथ विभिन्न समाचार पत्रों, पत्रिकाओं, वेब–पोर्टल, रेडियो, टी.वी. आदि पर सक्रिय दीपक‘फिल्म क्रिटिक्स गिल्ड’ के सदस्य भी हैं।)
